सूझ-बूझ
एक सेठजी था। उसे पटना जाना था। वह बेसब्री से ट्रेन आने की प्रतीक्षा कर रहा था। प्लेटफार्म पर जिस जगह वह बैठा था, वहां और कोई नहीं था।
थोड़ी देर में वहां तीन युवक आए और उसी जगह जा बैठे, जहां पहले से सेठजी बैठा था। कुछ समय तक वे युवक आपस में इधर-उधर की बातें करते रहे। फिर एक ने सेठजी से पूछा, ‘कहां जाना है?’
‘पटना।’ सेठजी ने जवाब दिया।
‘हमें भी पटना ही जाना है।’ युवक बोला।
सेठजी चुप रहा।
करीब पांच मिनट बाद उन युवकों में से एक ने पास की दुकान पर जाकर सबके लिए चाय ली और लौटा। फिर उसने सेठजी से कहा, ‘आप भी चाय पीजिए।’
‘नहीं’, सेठजी साफ इंकार कर गया।
युवकों ने खुद चाय पी ली। आधा घंटा और गुजरा।
एक घंटा गुजरा। दूसरा युवक बोला, ‘लगता है, ट्रेन अभी और लेट है। कुछ पता नहीं चल रहा। ऐसे में एक बार और चाय हो जाए।’
‘क्यों नहीं।’ तीसरे ने हामी भरी।
फिर क्या था, जिसने पहले चाय लाया था, वही फिर पास की दुकान से चाय लाने चला गया। वापसी पर उस युवक ने फिर सेठजी से कहा, ‘आपके लिए भी चाय बनवायी है।’
सेठजी कुछ नहीं बोला। युवक ने झट पहला कप चाय उसकी ओर बढ़ा दिया। सेठजी ने मना किया।
युवक ने आत्मीयता दिखाते हुए कहा, अगर चाय पीते हैं तो पीजिए न! जहर तो है नहीं!’
न जाने क्या हुआ, सेठजी ने चाय का कप अपने हाथ से पकड़ लिया। फिर सभी चाय पीने लगे।
थोड़ी देर बाद टे्रन प्लेटफार्म पर आ धमकी। अपना सामान सेठजी ने तेजी से उठाया और एक डिब्बे में जा घुसा। उसे जगह भी मिल गयी। वह जा बैठा। अपना बैग पास ही रखा।
अब सेठजी का मन कुछ अजीब-सा करने लगा। उसे दिमाग पर नशा सा छा रहा था। वह बेसुध अपनी जगह पर लुढ़क गया।
छवि अपने चाचाजी के साथ उसी डिब्बा में थोड़ी ही दूर पर बैठा था। ज्यों ही टे्रन खुली, वे तीनों युवक सेठजी के करीब आकर बैठ गए। ट्रेन की रफ्तार बढ़ गयी। कुछ देर बाद एक युवक सेठजी का बैग देखने लगा।
युवक की यह हरकत छवि को अच्छी नहीं जान पड़ी। उसे युवकों पर सन्देह हुआ। चाल-ढाल ठीक नहीं लगा। उसने चाचा जी से कहा, ‘लगता है, तीनों युवक सेठजी का बैग लेकर भागने वाले हैं। सेठजी बेसुध हैं और इनकी हरकत सही नहीं है।’
चाचा जी ने छवि की बात अनसुनी कर दी। मगर छवि ने साहस बटोरा और युवकों के करीब आकर बोला, ‘आप लोग कौन हैं? सेठ जी का सामान इस तरह क्यों छू रहे हैं?’
‘अरे बालक, यह मेरा संबंधी है। इसकी तबियत कुछ खराब हो गयी है।’ युवकों में से एक बोला।
‘आप झूठ बोल रहे हैं, जिस समय सेठजी ट्रेन में घुसा और यहां आकर बैठा, आप कहां थे? ज्यों ही यह बेहोश हो लुढ़क पड़ा, फिर आप सब आए हैं।’ छवि ने उसी जोश-खरोश में उनसे पूछा, ‘कहां जाना है आपको ?’
‘पटना।’ दूसरा युवक बोल उठा।
‘आपके पास पटना जाने का टिकट है? दिखाइए!’ छवि ने निडरता दिखाई।
अब तो युवकों को कुछ जवाब देते नहीं पड़ा। छवि ने युवकों के चेहरे पर उड़ते रंग को देखकर उनकी कमजोरी पकड़ ली। फिर उसने डिब्बे में बैठे यात्रियों से कहा, ‘इनके पास कोई टिकट नहीं है। ये यात्रियों के लुटेरे हैं। आप लोग इनसे पटना का टिकट दिखाने कहिए।’
फिर तो डिब्बे के कई यात्री युवकों पर लपक पड़े। उनसे तरह-तरह के सवाल करने लगे, जिनका कोई संतोषजनक जवाब वे नहीं दे सके। सभी यात्रियों ने मिलकर उन युवकों की जमकर पिटाई की और अगला स्टेशन आने पर उन्हें पुलिस के हवाले कर दिया गया।
इसी बीच मौजूद यात्रियों ने सेठजी के चेहरे पर पानी के छीटें दिए। थोड़ी देर में उसे होश आ गया। सेठजी को अपनी बेहोशी की वजह अब समझ में आ गयी। उसने यात्रियों को प्लेटफार्म पर तीन युवकों की मिली भगत से चाय पिलाने का जिक्र किया तो सभी को युवकों की बदनीयती का पता चल गया। अपना सारा सामान सुरक्षित पाकर सेठजी ने यात्रियों को धन्यवाद दिया तो उन्होंने उसके आगे छवि को लाकर खड़ा कर दिया और कहा, ‘सही में इस बालक के साहस और सूझबूझ ने ही कमाल किया है। धन्यवाद का वास्तविक पात्र तो यही है। हम यात्रियों की चेतना को भी इसने जगाया और झकझोरा है।’
अब सेठजी ने छवि की ओर निहारा। फिर प्यार से पूछा, ‘क्या नाम है तुम्हारा बेटा?’
‘छवि, चाचा जी।’
इतना साहस तुमने कैसे कर दिखाया?’
‘मैं साहसिक कहानियां पढ़ता हूं। उसी ने मुझे प्रेरित किया।’
‘जीवन में तुम खूब तरक्की करो।’ सेठजी ने आशीर्वाद दिया। (सुमन सागर)

