जंगल ही नहीं, बेजुबान जानवर भी डूबते हैं बाढ़ में 

अगस्त का महीना अक्सर भारत में मानसून की चरम अवस्था लेकर आता है। नदियां उफान पर होती हैं, खेत-खलिहान पानी से भर जाते हैं और कई शहरों में बाढ़ का संकट पैदा हो जाता है लेकिन इस आपदा का एक ऐसा पक्ष भी है, जिस पर अपेक्षाकृत कम चर्चा होती है-जंगलों और उनमें रहने वाले वन्यजीवों का संघर्ष। जब जंगल ही पानी में डूब जाएं, तब बाघ, गैंडे, हाथी, हिरण, बारहसिंगा, मगरमच्छ और अनगिनत छोटे जीव आखिर कहां जाएं? यह प्रश्न केवल वन्यजीव संरक्षण का नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के भविष्य का है।
भारत में असम का काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान, उत्तर प्रदेश का दुधवा राष्ट्रीय उद्यान और कई अन्य संरक्षित क्षेत्र हर वर्ष बाढ़ का सामना करते हैं। इनमें से कुछ स्थानों पर बाढ़ प्राकृतिक चक्र का हिस्सा है, लेकिन जलवायु परिवर्तन ने इसकी तीव्रता और अनिश्चितता दोनों बढ़ा दी हैं। अब बाढ़ पहले से अधिक अचानक और विनाशकारी होती जा रही है। दरअसल, जंगलों में रहने वाले अधिकांश जानवर बाढ़ आने से पहले ही उसके संकेत महसूस कर लेते हैं। वे ऊंचे स्थानों की ओर बढ़ने लगते हैं। हाथियों के झुंड, हिरणों के समूह और यहां तक कि बाघ भी सुरक्षित स्थानों की तलाश करते हैं लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब जंगल के बाहर उन्हें सड़कें, रेलवे लाइनें, खेत और मानव बस्तियां मिलती हैं। ऐसे में मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ जाता है। लोग घबरा जाते हैं, जबकि जानवर केवल अपनी जान बचाने की कोशिश कर रहे होते हैं।
असम का काजीरंगा इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। ब्रह्मपुत्र नदी में आयी  बाढ़ के दौरान एक सींग वाले गैंडे, जंगली भैंसे, हिरण और अन्य जीव राष्ट्रीय राजमार्गों तथा निकटवर्ती ऊंचे इलाकों की ओर निकलते हैं। कई बार तेज रफ्तार वाहन उनकी जान ले लेते हैं। वन विभाग को ऐसे समय यातायात नियंत्रित करना पड़ता है ताकि जानवर सुरक्षित गुजर सकें। बाढ़ का सबसे अधिक नुकसान छोटे जीवों को होता है। सांप, खरगोश, साही, लोमड़ी, कछुए, पक्षियों के घोंसले और अनेक कीट-पतंगे पानी में बह जाते हैं। इनकी मृत्यु का असर पूरे खाद्य-श्रृंखला (फूड चेन) पर पड़ता है। यदि छोटे जीवों की संख्या घटती है तो उन पर निर्भर शिकारी जीवों के लिए भी भोजन का संकट पैदा हो जाता है।  जंगलों के आसपास अतिक्रमण और अवैज्ञानिक निर्माण ने वन्यजीवों के प्राकृतिक पलायन मार्ग (कॉरिडोर) भी संकरे कर दिए हैं। परिणामस्वरूप जानवरों के पास सुरक्षित स्थानों तक पहुंचने के विकल्प कम होते जा रहे हैं।
हालांकि, भारत में कई सकारात्मक प्रयास भी हो रहे हैं। वन विभाग, राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (एनडीआरएफ), स्थानीय प्रशासन और स्वयंसेवी संस्थाएं मिलकर बाढ़ के दौरान वन्यजीवों की सुरक्षा में जुटती हैं। संवेदनशील क्षेत्रों में स्पीड लिमिट लागू की जाती है, अस्थायी चैकियां बनाई जाती हैं और वनकर्मी लगातार निगरानी रखते हैं। घायल जानवरों का उपचार किया जाता है तथा आवश्यक होने पर उन्हें सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जाता है। आज आधुनिक तकनीक भी संरक्षण का महत्वपूर्ण माध्यम बन रही है। ड्रोन, कैमरा ट्रैप, जीपीएस कॉलर और उपग्रह आधारित निगरानी से वन विभाग को यह जानकारी मिलती रहती है कि कौन-से क्षेत्र पानी में डूब रहे हैं और जानवर किस दिशा में जा रहे हैं। इससे समय रहते बचाव की रणनीति बनाई जा सकती है।
लेकिन केवल सरकारी प्रयास पर्याप्त नहीं हैं। स्थानीय समुदायों की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। जिन गांवों के आसपास जंगल हैं, वहां लोगों को यह समझना होगा कि बाढ़ के दौरान यदि कोई जंगली जानवर गांव में दिखाई दे तो उसे घेरने या नुकसान पहुंचाने के बजाय तुरंत वन विभाग को सूचना दें। अधिकांश मामलों में जानवर हमला नहीं करना चाहता बल्कि केवल सुरक्षित रास्ता खोज रहा होता है। भविष्य की योजना में ऐसे ऊंचे कृत्रिम टीले (हाईलैंड) विकसित करने की आवश्यकता है जहां बाढ़ आने पर वन्यजीव शरण ले सकें। साथ ही वन्यजीव कॉरिडोर को अतिक्रमण से मुक्त रखना, सड़कों पर वन्यजीव पार-पथ (अंडरपास और ओवरपास) बनाना तथा बाढ़ पूर्व चेतावनी प्रणाली को मजबूत करना समय की मांग है।
बाढ़ को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता, क्योंकि यह प्रकृति का हिस्सा है। लेकिन यदि वैज्ञानिक योजना, संवेदनशील प्रशासन और जनसहयोग साथ आएं तो बाढ़ को वन्यजीवों के लिए सामूहिक त्रासदी बनने से काफी हद तक रोका जा सकता है। आखिर जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि करोड़ों जीवों का घर हैं। 
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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