अकेला इन्सान


आज रविवार था और दिनभर आराम करने के बाद मैं देर रात तक अखबार पढ़ता रहा। अखबार पढ़ते-पढ़ते लगभग एक सवा-एक बजे गहरी नींद ने मुझे आ घेरा और मैं अपने बिस्तर पर सोने चला गया। जनवरी के ठंडे दिन और ठंड में रजाई तान कर सोना बड़ा मज़ेदार लगता है। आज सारा दिन रजाई के साथ ही गुज़रा था। अक्सर रात को सोते समय कई तरह के विचार घूमते रहते हैं जो हमारे दिलो-दिमाग में बैठ जाते हैं और पता नहीं आदमी नींद में कितने ब्रह्मांड घूम आता है कितनी सदियां गुज़ार आता है, स्वाभाविक सी बात है। इंसानी-संतुलन तो उसके मन-मस्तिष्क पर ही निर्भर करता है। रात को सोते-सोते मुझे ऐसा लगा जैसे मेरी रजाई में कोई घुस आया हो। मैं जब भी करवट बदलता मुझसे करवट ली न जाती। बड़ी चिड़चिड़ाहट-सी हो रही थी पर नींद इतनी गहरी थी कि मुझसे उठा भी नहीं जा रहा था। मैं बिस्तर पर अचेत पड़ा था। नींद इतनी गहरी थी कि मैं अपने-आप को भूल चुका था। मैं कहां हूं और मेरे साथ कौन सोया पड़ा है मुझे कुछ भी पता न था। अगले ही पल जब मैंने करवट लेनी चाही तो मुझे ऐसे महसूस हुआ जैसे मुझे मेरी रजाई में से कोई बाहर धकेल रहा हो। मैंने थोड़ा-सा अपने-आपको सम्भाला। मुझे लगा जैसे मैं ज़मीन पर सो रहा हूं। मुझे बड़ी बेचैनी महसूस हो रही थी। नींद गहरी हो और मन सोने का कर रहा हो तो फिर आप सब जानते ही हो कि उस समय कैसा महसूस होता है। गहरी नींद के पास यदि कोई सोने के बर्तनों में छप्पन पकवान भी रख दे तो भी वे अच्छी नहीं लगते बल्कि आदमी नींद को ही प्राथमिकता देता है पर मैं अब ऊब चुका था। मैंने एकदम रजाई उठाई तो देखा कि मैं तो सचमुच ही ज़मीन पर सोया पड़ा था और मेरे आश्चर्य की सीमा तब न ही रही जब मैंने उन तीन बंदरों को देखा जो मेरे साथ मेरी रजाई में ही सो रहे थे। उन्हें देखकर मैं गुस्से से लाल हो गया। ‘अरे, उठो यहां से, तुम यहां कैसे और कहां से आए हो’ मैंने गुस्से में उन्हें झिंझोर कर उठाया।  ‘क्या बात है...?’ आगे से एक बंदर मुझ पर चिल्ला कर बोला जो सबसे बड़ा लग रहा था। तीनों दिखने में बड़े अद्भुत लग रहे थे। उन तीनों बंदरों ने ऊन की बुनी हुई बड़ी खूबसूरत टोपियां और एक ही रंग की फतूही जैसा बनियानें पहनी हुई थी। ‘अरे, ये टोपियां कहां से आईं तुम्हारे पास?’ मैंने व्यंग्यपूर्ण ढंग में कहा। ‘तुम्हें क्या, कहीं से भी आई हो?’ तुमने क्या लेना है ?’ सबसे छोटा बंदर बोला। वह बहुत तेज़-तर्रार लग रहा था। 
‘हमारी मां ने बना कर दी हैं’ मंझले लग रहे बंदर ने टका-सा जवाब दिया।
‘अरे, पहले तुम यह बताओ कि तुम मेरी रजाई और मेरे घर में कैसे और कहां से आए हो?’ मैं कड़क कर बोला।  ‘हम कहां से आए हैं? क्या बात कर रहे हो? पहले तुम बताओ कि तुम कहां से आए हो हमारे घर हमारी रजाई में?’ सब से बड़े बंदर ने गुस्से में तमतमाते हुए कहा। ‘हमारी मां हमें यहां सुला कर गई है, तुम्हें दिखता नहीं क्या।’ सबसे छोटा बंदर तपाक से बोला।‘हमारे घर में आकर हमें ही डांटे जा रहे हो, यह तो वही बात हुई उल्टा चोर कोतवाल को डांटे’ उनमें से एक ज़रा डट कर बोला।‘तुम्हारा घर, पागल तो नहीं हो गए तुम’ मुझे उन पर और भी गुस्सा आया। ‘पागल तो तुम हो गए, हमारे घर आकर हमें ही डरा रहे हो।’ ‘ठहरो, तुम्हारी ऐसी की तैसी....’ मैंने उनको कस कर थप्पड़ लगाए और वहां से भगा दिया। एक चूहा भी वहां यह सब देख रहा था। चांटे पड़ते देख वह भी वहां से दुम दबाकर भाग गया। मैं यह सोच-सोच कर परेशान था कि ये बंदर मेरी रजाई में आए कैसे। सोचने वाली बात थी। बंदरों को भगाकर जब मैं दरवाज़ा बंद करने के लिए उठा तो दरवाज़े के बाहर बैठा एक एक कुत्ता भी यह सब देख रहा था। वह मेरी ओर देख कर भौंका जैसे मुझे कुछ कहना चाह रहा हो पर मैं इतना थक चुका था कि मैं किसी की भी बात सुनने की अवस्था में न था। मैंने दरवाज़ा बंद कर दिया। बहुत विचित्र-सी बात थी कि दरवाज़ा भी पुराने जमाने का था। गहरी नींद मुझे बिस्तर की ओर खींच रही थी। छत पर मिट्टी के रोशनदानों में कुछ चिड़ियां बैठीं चूं-चूंच कर रही थीं।