देवभूमि के साक्षात्कार की पौड़ी


जून में भी सर्दी अनुभव कराते इस स्थान से नीचे झांकने पर अंदर तक सब सहम जाता है। दूर-दूर तक पर्वतों और उनके बीच छोटे-छोटे गांव, सीढ़ीदार खेत आदि नजर आते हैं। इनके पीछे से उगते सूरज का नजारा अलौकिक लगता है। अगर आसमान साफ हो तो बर्फ से ढकी पहाड़ों की लंबी श्रृंखला नजर आती है। वहां की हरियाली, लम्बे-ऊंचे वृक्ष, घने जंगल आज भी बुलाते हैं लेकिन कहना मुश्किल है कि वहां फिर कब जाना संभव होगा। श्रीनगर, जी हां कश्मीर में ही नहीं, उत्तराखंड में भी है श्रीनगर। इसका नामकरण एक विशाल पत्थर पर खींचे श्रीयंत्र के कारण हुआ। विश्वास किया जाता है कि जब तक श्रीयंत्र की पूजा होती थी, यहां खुशहाली थी। 8वीं सदी में जब आदि शंकराचार्य श्रीनगर आये तो उन्होंने श्रीयंत्र को नीचे घुमा कर अलकनंदा नदी में डाल दिया जो 50 वर्ष पहले तक जल के स्तर से ऊपर दिखाई देता था। इस क्षेत्र को श्रीयंत्र टापू कहा जाता है। श्रीनगर हमेशा ही महत्त्वपूर्ण रहा है क्योंकि यह बद्रीनाथ एवं केदारनाथ के धार्मिक स्थलों के मार्ग में आता है। लगभग सभी तीर्थयात्री यहां अल्पकालीन विश्राम के लिये रुकते हैं। श्रीनगर ब्रिटिश गढ़वाल के रूप में वर्ष 1840 तक मुख्यालय बना रहा। तत्पश्चात इसे 30 किलोमीटर दूर पौड़ी ले जाया गया। वर्ष 1894 में श्रीनगर को विभीषिका का सामना करना पड़ा, जब गोहना झील में उफान के कारण भयंकर बाढ़ आई। श्रीनगर में कुछ भी नहीं बचा। वर्ष 1895 में वर्तमान श्रीनगर बसा। नये श्रीनगर का नक्शा जयपुर के अनुसार बना जो चौपड़-बोर्ड के समान दिखता है जहां एक-दूसरे के ऊपर गुजरते हुए दो रास्ते बने हैं। वापसी में हमने श्रीनगर की एक नर्सरी से चीड़ और देवदार के चार पौधे लिए लेकिन दिल्ली की जलवायु उन्हें अनुकूल न होने के कारण वे यहां अपनी जड़ें नहीं जमा सके। इस क्षेत्र के पुराने महत्व को जानने के बाद कहा जा सकता है कि अंग्रेजों के काल में जो क्षेत्र आवागमन के लिहाज से बेहतर स्थिति में थे, वहां विकास की किरणें पहले पहुंचीं मगर दुर्गम इलाकों के बाशिंदे पीछे रह गए। आजादी के बाद यहां सड़क निर्माण का सिलसिला शुरू हुआ और देश-दुनिया से कटे हुए इसके बड़े भू-भाग को उठने का मौका मिला। हालांकि उत्तराखंड के ज्यादातर इलाके आज सड़क संपर्क में हैं लेकिन रेल यात्रा आज भी बहुत प्रभावी नहीं है। यूरोप में मैं स्वयं देख चुका हूं। वहां दस हजार फीट की ऊंचाई पर बर्फ की ढकी चोटियों पर आज से नहीं, एक शताब्दी पूर्व से रेल चल सकती है तो यहां क्यों नहीं? यदि यहां भी ऐसा हो सके तो क्षेत्र में पर्यटन की संभावनाएं बढ़ेंगी और लोगों का जीवन स्तर बदल सकता है।  तकनीकी उपलब्धियों और कोंकण रेलवे के अनुभव को देखते हुए यह काम मुश्किल भी नहीं है।  दुगड्डा के बारे में बहुत कुछ सुना-पढ़ा था इसलिए कोटद्वार से दुगड्डा जाने का कार्यक्र म कई बार बना लेकिन हर बार जहां भी गए, वहीं के होकर रह गए। अंधेरा हो जाने पर वापस लौट आते। आखिर एक दिन दुगड्डा जाना हुआ लेकिन दुगड्डा  के शेर से हमारी मुलाकात नहीं हो सकी जिसके बारे में पुस्तकों में बार-बार पढ़ते रहे हैं। वैसे यह स्थान भी कम खूबसूरत नहीं है।  यहां के घुमावदार रास्तों पर बनी छोटी सी झाेंपड़ीनुमा दुकान पर गाड़ी रोककर चाय पीने का आनंद कुछ अलग ही है। इन दुकानों पर काले चने की स्वादिष्ट सब्जी खाने की इच्छा बार-बार होती है तो इस सम्पूर्ण क्षेत्र में मिलने वाली बाल मिठाई ने हमें अपना दीवाना बना लिया। हमारे क्षेत्र के कलाकंद के चारों ओर चीनी के साबुदाना जैसे छोटे गोल दाने चिपके हों तो बस समझो यही है बाल मिठाई। इस यात्रा के दौरान ताजे फल, ताजा सब्जियां, लम्बा-चौड़ा खीरा, शुद्ध दूध, दही खूब खाने को मिला तो हर शाम कोटद्वार में छत्त पर बैठे कुदरत का नजारा देखते तो देर तक मोरों की आवाज गूंजा करती। आज भी वे आवाजें कानों में गूंज रही हैं मनोकामना कर रही हों...‘देवभूमि पुकार रही है! देवभूमि पुकार रही है! बाबा सिद्धबली की सीढ़ियां तुम्हारी राह देख रही हैं!’खोह नदी का कलकल कर बहता जल अपनी समस्त शीतलता उड़डेलने को आतुर दिखता है तो टिफिन टॉप बाहें फैलाये स्वागत करने को तैयार है। तथापि असंख्य लोग इस निमंत्रण को स्वीकार कर प्रकृति का आनंद लेने वहां पहुंचकर प्लास्टिक आदि से इन स्थानों को प्रदूषित करने का पाप न जाने क्यों करते हैं। आखिर हम कब सीखेंगे  प्रकृति का आदर करना। देवभूमि को पवित्र बनाए रखने के अपने कर्त्तव्य को न भुलाकर ही हम अपनी भावी पीढ़ियों को प्रकृति की इस धरोहर को सौंप सकते हैं। (उर्वशी)  

—विनोद बब्बर