सोलह कला सम्पूर्ण भगवान श्री कृष्ण


श्रीमद्भागवत से लेकर आज तक भगवान श्री कृष्ण के स्वरूप और स्थान का विचार कई कोणों से किया जा रहा है। परिभाषा, व्याख्या, अथवा टीकाओं में सोलह कला सम्पूर्ण श्री कृष्ण को पुरुषोत्तम स्वीकार किया गया है।सोलह संस्कारों, शृंगारों की तरह, ग्रंथों में सोलह कलाओं का संदर्भ भी सामने आया है। आंख, कान, नाक, जीभ और त्वचा ये पांच कलाएं प्रत्येक मनुष्य में पहले से ही होती हैं। कुछ कलाएं कर्मेन्द्रियों द्वारा प्राप्त की जा सकती हैं, तो कुछ ज्ञानेन्द्रियों द्वारा। सबसे अंत में अह्म तत्व प्राण है। भगवान श्री कृष्ण का इन सभी कलाओं पर पूर्ण नियंत्रण था। तभी तो उन्हें सोलह कला सम्पूर्ण कहा जाता है। पुरुष से पुरुषोत्तम तक मनुष्य का विकास, प्रभाव और अस्तित्व सर्वकालीन है। आत्मा जब परमात्मा में मिलती है तो एक विस्तृत-विराट आकार की सूक्ष्मता हमें चौंकाने लगती है।  हम अपने कर्म और धर्माचरण से पुरुष को पुरुषोत्तम होते हुए मानते हैं। लौकिक अथवा अलौकिक जगत में मनुष्य का स्वभाव-धर्म, भिन्न-भिन्न होता है। लेकिन संसार चमत्कार, विश्वा, विराट भाव में भी सहमत होता रहता है। अवतार और इंसान की सीमा रेखा, पहचान या उसके स्थान के वास्ते, इतिहास भीतरी गुणों की गणना अपनी तरह से करता आया है। अध्यात्म, धर्म, संस्कृति या संस्कारों का भी इससे गहरा नाता है। परिवेश अथवा स्थितियां हमें इस ओर खींचती है। सर्वपल्ली डा. राधाकृष्णन के अनुसार, श्री कृष्ण भगवान विष्णु के प्रतिनिधि हैं। अवतार रूप में भी उन्हें स्वीकार किया गया है। परमात्मा का मनुष्य रूप में अवतरण ही अवतार है। सच्चे आध्यात्मिक अन्वेषक ही श्री कृष्ण के समान दिव्यन को प्राप्त कर पाते हैं। इसीलिए श्री कृष्ण सोहल कला सम्पूर्ण अवतारी पुरुष कहे गए हैं। उनके आलोक में तारतम्य है। प्रकाशकुंज के रूप में इनकी पूजा होती है। निरंतरता का बोध इनका व्यक्तित्व और कर्म क्षेत्र करवाता है। द्वारिका धाम में उनका पूरा प्रकाश है। यूं हीवहे मथुरा में पूर्णतर और वृंदावन में पूर्णतम हो रहे हैं। ये कलाएं श्री कृष्ण को लीला पुरुष सिद्ध करती हैं। कहीं इनके साठ गुणों की कल्पना की गई है। चार गुण और भी इनमें लक्षित हुए हैं। माधुर्य प्रियता और वाणी संयम ने इन्हें अन्य गुणों का परिचायक सिद्ध किया है। जो गुण गिनती में आए हैं, माधुर्य के साथ उनमें वेणुनाद, रूप-माधुर्य, प्रियजन संग्रह और अद्भुत लीला शामिल है। संतुलित व्यवहार की कला भी उन्हें पूर्ण पुरुष सिद्ध करती है। उनका प्रत्येक आदर्श महसूस किया जा सकता है। कर्मवीर होने की उनकी कथाएं जगह-जगह ग्रंथों में  उपलब्ध हैं। आनन्द पक्ष की प्रचुरता ने भी उन्हें लोकप्रिय बनाया है।  अमावस्या से पूर्णिमा तक और विपरीत भी, अंधकार और प्रकाश में स्वत: पूज्य ही रहे हैं लीला पुरुष। श्री कृष्ण विलास क्रीड़ाएं दिखाते हैं। दिखते हैं तो कलाज्ञानी, पारखी, भावक, मर्मज्ञ, भाविक रूप में भी पूजनीय हैं। लीलाकर्त्ता, क्रीड़ा, तमाशाई। मायावी और मायामय रूप में सामाजिक सृष्टि का दिशा-दर्शन भी करते हैं। यही नवसप्त षोडेष नौसत लीला के सहचर की संज्ञाएं इन्हें प्राप्त हैं। अभिनय, करतब, क्रीडा, मनोरंजन, विलास या उपदेश के जीवन प्रसंग सर्वविदित हैं। इहलोक में आत्मा, शरीर और लीलास्थली के साथ चित्र, भाषण, मूर्ति जैसी चंद्रकलाओं को आलम्ब बना कर श्री कृष्ण ने अपने बाल सखा किशोर रूप में ही नहीं, जीवन पर्यन्त जन-जन को प्रभावित और प्रेरित किया है। कर्म और धर्माचरण से पूर्ण पुरुष श्री कृष्ण, ‘पुरुषोत्तम’ के पद को यूं ही सुशोभित नहीं करते। अवलोक कसौटी, परीक्षा, विवेचना, गुण-अवगुण जैसी कला किसी अन्य अवतार पुरुष में कम ही देखी गई है। श्री राम को भी चौदह कलाओं की उपलब्धि थी। श्री कृष्ण, प्रकाश के क्रमश: विकास की सोलह चंद्रकलाओं के धारक हैं।  पूर्णत्व को प्राप्त पुरुष, इतिहास, पुरुष, रणनीति पुरुष, चिंतक पुरुष, श्री कृष्ण की सोलह कलाओं के दिव्य दर्शन गोवर्धन चक्र, मधुर वाणी, सौम्यता, सुदामा प्रसंग, कंस वध तक प्रचलित, विख्यात हैं। पांडवों की रक्षा, उन्हें बचाने की चेष्टा में, ‘परम भाव’ से सक्रिय, निज परिवार तक को उपेक्षित करते नज़र आते हैं। कर्माधारित जीवन इनका मूल मंत्र दिखाई देता है।  बालक श्री कृष्ण लीलामय हैं। मां से दही, माखन, रोटी चाहते हैं, आंगन में लोट-पोट होकर उन्हें रिझा रहे हैं। बालसुलभ स्वभाव माटीभी मुंह में रख लेते हैं। यशोदा की डांट पर बताते हैं: ‘मैयी मोरी मैं नहिं माखन खायो’। जैसे ही कृष्ण का मुख खुलता है, यशोदा मां उसमें पूर्ण ब्रह्मांड देख कर चकित हो जाती हैं।  अपने आचरण से श्री कृष्ण समता, समानता का आभास देते थे। ऊंच-नीच, जाति-पाति को नहीं मानते थे। सुदामा के चावल यहां प्रमाण हैं। परम ब्रह्मा हैं श्री कृष्ण। गोपियां जीवात्मा है। मुरली भगवान की पुष्टि है जो मानव मात्र को सचेत करती है। सांसारिकता से तटस्थ करके हमें अपनी ओर खींचती है। गोपियों का आत्म-समर्पण भी उन्हें ब्रह्मा के समीप लाता है। रासलीला अर्थात एक प्रकार का कलापूर्ण नृत्य ही तो है ‘रास’। आनंद की अवस्था है मनोरंजन। उपदेश इसमें समाहित है अत: चंद्र रेखाओं के सोलह भाग, क्रम विकास इन्हें प्रकट करने वाले हैं। कृष्ण पूर्ण योगी थे। भोग की अनेक सिद्धियों के चमत्कार वहां आज भी देखे, सुने जाते हैं।

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