एक देश-एक संविधान तो फिर समान नागरिक संहिता कब ?


तिहरे तलाक को रोकने के लिए भारतीय लोकसभा और राज्यसभा में बिल पारित करवा कर राष्ट्रपति ने कानून बना दिया। क्या इससे तलाक की प्रथा रुक गई? ऐसा लगता नहीं।  एक समय पर तलाक-तलाक-तलाक कह देने को अपराध करार दिया गया परन्तु तलाक का एक तरीका अभी भी मौजूद है जो इस्लामिक परम्परा के अनुसार समाज में नारी जगत के सिर पर तलवार की तरह लटकता रहेगा। वर्ष 1985 में उच्चतम न्यायालय द्वारा शाहबानो को दिए गए तलाक पर एक महत्त्वपूर्ण निर्णय लोगों के सामने आया। 62 वर्षीय मुस्लिम  महिला ने अपने पांच बच्चों के लिए गुज़ारा भत्ता पाने के लिए एक मुकद्दमा दायर किया था। मुस्लिम कट्टरपंथी लोगों ने उस समय की सरकार पर दबाव डाला और मुस्लि तुष्टिकरण की नीति ने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार को झुकने पर मजबूर कर दिया और सन् 1986 में कांग्रेस ने मुस्लिम महिला (तलाक के अधिकार की रक्षा) कानून बना डाला, जिस पर उच्चतम न्यायालय ने सामान नागरिक संहिता कानून बनाने के लिए सरकार को आह्वान किया। वोट बैंक की राजनीति में अभी तक समान नागरिक संहिता की ओर किसी भी दल की सरकार को एक कदम आगे न बढ़ने दिया। देश की हालत यह है कि जो भी व्यक्ति दूसरी शादी करना चाहता है, वह कुछ दिनों के लिए कलमा शऱीफ पढ़ कर मुस्लमान होने का नाटक करता है और फिर वापस अपने धर्म में आ जाता है। यह भी हकीकत है कि उच्चतम न्यायालय ने ऐसे धर्म परिवर्तन को समाज के लिए ठीक नहीं समझा और विवाह करने के लिए किया गया धर्म परिवर्तन नहीं माना। इसी तरह आंध्र प्रदेश के एक जज की टिप्पणी ने भारतीय समाज में हलचल पैदा कर दी। मान्य जज महोदय ने मुस्लिम लड़के द्वारा हिन्दू लड़की से शादी करने को ‘लव जेहाद’ कह दिया था। इस तरह की बहुत-सी शादियां देश में हुईं, एक हिन्दू महिला जिसने मुस्लिम व्यक्ति से शादी की, उसके पासपोर्ट बनाने पर काफी खींचातानी हुई, जिस पर स्वर्गीय सुषमा स्वराज तत्कालीन विदेश मंत्री ने स्वयं दखल दिया था। हमारा यह सब बताने का भाव यह है कि कट्टरपंथी उभार के काले साए मुस्लिम समाज पर भी बहुत दूर तक फैलते जा रहे हैं और सरकारें मुस्लिम मतदाताओं के मत हासिल करने के लिए बेबस और लाचार नज़र आती हैं।  मायावती, अखिलेश यादव, ममता बैनर्जी और नितीश कुमार जैसे बहुत से नेता ऐसे हैं जो मुस्लिम तुष्टिकरण करने में कांग्रेस से भी चार हाथ आगे बढ़ जाना चाहते हैं। राजनीतिक अवसरवादिता ने जो खेल खेला उससे आने वाली पीढ़ियां परेशान रहेंगी और उन्हें भावनात्मक तौर पर विचलित कर जाएगी। शरयी कानून अथवा निज़ाम-ए-मुस्त़फा आज के युग में किसी मुस्लिम देश  में भी पूरी तरह लागू नहीं हो सका। आज इलैक्ट्रानिक मीडिया, प्रिंट मीडिया एवं सोशल मीडिया  हर घर में मौजूद है। मुस्लिम परिवार भी इनमें से बहुत-सी सुविधाओं का आनंद ले रहे होंगे। हम मानते हैं कि परिवर्तन हमेशा समय की मांग रही है और रहेगी भी। चीन में सन् 1979 से मुसलमानों पर बहुत-सी पाबंदियां लागू हुई थी। उन सभी पाबंदियों का केवल इतना उल्लेख करना चाहेंगे कि आजकल बीस लाख के करीब मुस्लिम चीन की जेलों में कैद हैं, क्या किसी मुस्लिम देश ने चीन को ऐसा न करने को कहा? पाकिस्तान तो चीन को अपना निकटतम मित्र मानता है वह भी मुसलमानों पर लगी पाबंदियों पर चीन से दो शब्द भी नहीं कह सकता। भारत में हिन्दू कोर्ट बिल तो पहले से ही लागू है।  राजा राम मोहन राय और स्वामी दयानंद ने हिन्दुओं में कई प्रकार के विरोधों के बावजूद सती प्रथा, विधवा विवाह और नारी शिक्षा पर जागृति लाई। क्या हम मुस्लिम महिलाओं में व्याप्त भय से मुक्ति दिलाने के लिए कम से कम समान नागरिक संहिता का कानून नहीं बना सकते? राजनीतिक इच्छा-शक्ति सभी अवरोधों को पार कर जाती है। निकाह को इस्लाम के स्कालर यह कहते नहीं थकते कि यह दो व्यक्तियों में एक अनुबंध है यानि कांट्रैक्ट, जिसमें कुछ लोगों की उपस्थिति अनिवार्य होती है, परन्तु क्या तलाक के समय भी काज़ी वकील इत्यादि मौजूद होते हैं? आज का दौर चार विवाहों की इजाज़त नहीं देता। हम मानते हैं कि बहुत थोड़े लोग ऐसी बहु-विवाह प्रणाली के पक्षधर हैं। इस्लाम के एक स्कालर ने एक दिन कहा कि पांच ऐसी बाते हैं जिन पर एक व्यक्ति और विवाह कर सकता है इनमें से एक तो महिला की सुंदरता को सुरक्षित रखने के लिए, दूसरा महिला की बीमारी, तीसरा बच्चा न पैदा कर सकना इत्यादि। ऐसी समस्याएं तो हिन्दू तथा अन्य अल्प-संख्यक परिवारों में भी हैं, क्या वे भी बहु-विवाद प्रणाली पर चल निकलें? ऐसा नहीं होना चाहिए। 
दोहरे जीवन के त्रास से अब मुस्लिम समाज को भी मुक्ति दिलानी होगी। मुस्लिम महिलाओं में बढ़ती बेचैनी से सरकार को अवगत होना चाहिए। पचास वर्ष पूर्व बना ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड भी मुसलमानों को बहु-विवाह प्रणाली से दूर रखने में असमर्थ दिखाई देता है। जब सरकार इस तरफ कदम बढ़ाएगी तब यह तो हल्ला मचाने लगेंगे। हम उन लोगों से भी सहमत नहीं जो कहते हैं हम पांच हमारे पचास। जन-संख्या की समस्या की ओर प्रधानमंत्री ने लाल किला से खुल कर बात की जिस पर बहुत से मुस्लिम धार्मिक नेताओं ने हामी भी भरी। ऐसा लगता है कि मुस्लिम समाज में बदलाव की इस समय एक क्रांति करवट ले रही है। लोहा गर्म है। मोदी सरकार को चाहिए कि चोट कर दें।