चुनावों का प्रभाव


चाहे चुनाव तो हरियाणा एवं महाराष्ट्र विधानसभाओं के होने थे, परन्तु इसके साथ ही लगभग एक दर्जन प्रांतों में कुछ विधानसभाओं एवं कुछ लोकसभा सीटों पर उप-चुनाव भी हुए हैं। देश भर में इन चुनावों की बड़ी चर्चा होती रही है। मुख्य मुकाबला दो राष्ट्रीय दलों भाजपा एवं कांग्रेस के बीच रहा है। इसलिए दोनों पार्टियों के प्रमुख नेता इन चुनावों में बहुत सक्रिय रहे। हरियाणा में भारतीय जनता पार्टी एवं महाराष्ट्र में भारतीय जनता पार्टी तथा शिव सेना का गठजोड़ पिछले पांच से वर्ष से सत्तारूढ़ चला आ रहा है। वैसे तो प्रांतीय चुनावों में प्राय: स्थानीय मुद्दों पर चर्चा होती है। संबद्ध राज्यों में तत्कालीन सरकारों ने किस प्रकार शासन किया, जन-साधारण उनसे किस सीमा तक प्रसन्न रहे, जैसे स्थानीय मुद्दे ही भारी रहते हैं, परन्तु इन चुनावों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रभाव को स्पष्ट रूप में देखा जा सकता है।इन चुनावों से पूर्व जम्मू-कश्मीर में धारा 370 को हटाकर इसे दो केन्द्र शासित प्रदेशों में बांटने से इन राज्यों के मतदाताओं पर पड़े प्रभावों को नकारा नहीं जा सकता। दोनों बड़े दलों के नेताओं ने अपने चुनाव प्रचार में कुछ महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दों को भी उभारने का यत्न किया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह तथा कुछ अन्य भाजपा नेताओं की ओर से इस प्रचार के दौरान जम्मू-कश्मीर की समस्या को बार-बार उठाया गया। इस बार बाबरी मस्जिद एवं राम जन्मभूमि का मामला अधिक नहीं उभर सका। अपने दूसरे कार्यकाल के दौरान नरेन्द्र मोदी की सरकार पर किसी बड़े भ्रष्टाचार का आरोप भी नहीं लग सका। इसलिए भाजपा इन चुनावों में अधिक विश्वास के साथ उतरी प्रतीत होती है। इन दोनों ही राज्यों में चाहे स्थानीय समस्याएं बार-बार सामने आती रहीं तथा स्थानीय समस्याओं से भी लोगों को दो-चार होना पड़ा है, परन्तु इन दोनों ही राज्य सरकारों का प्रभाव प्राय: ईमानदारी वाला बना रहा है। बेशक कांग्रेस की ओर से देश की अवसान की ओर अग्रसर आर्थिकता का हवाला बार-बार दिया जाता रहा। नोटबंदी एवं जी.एस.टी. को लागू करने जैसे फैसलों को मोदी सरकार की गलत नीतियों के तौर पर प्रचारित किया गया परन्तु समूचे चुनाव प्रचार में भाजपा आक्रामक रुख ही धारण किए रही। इसके कांग्रेस का प्रभाव रक्षात्मक ही बना दिखाई दिया। यह बात स्पष्ट है कि इन चुनावों का प्रभाव किसी न किसी रूप में देश की समूची राजनीति पर अवश्य पड़ेगा, तथापि राष्ट्रीय सरकार पर इसका प्रभाव इसलिए अधिक नहीं होगा, क्योंकि मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल का अभी काफी समय बचा हुआ है। अतीत में लोकसभा के चुनावों में कांग्रेस के पराजित हो जाने के बाद पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी के अपने पद से त्यागपत्र दे देने के बाद पार्टी की कतारों में खलबली अवश्य मची रही है। पार्टी के डावांडोल हुए पग अभी तक स्थिर नहीं हो सके। इस समूचे परिदृश्य को देखते हुए इस बार भी इन राज्यों में भाजपा का प्रभाव बने रहने की सम्भावना अधिक दिखाई देती है।  कुछ अन्य प्रांतों के साथ-साथ पंजाब में भी चार विधानसभा क्षेत्रों में उप-चुनाव हेतु हुए मतदान ने यहां की राजनीति में इसलिए दिलचस्पी पैदा की है क्योंकि ये चुनाव कैप्टन सरकार के कार्यकाल के अढ़ाई वर्ष बीत जाने के बाद हुए हैं तथा इन्हें सरकार की कारगुज़ारी के साथ जोड़ने का यत्न किया जा रहा है। प्रदेश में इस समय कांग्रेस सत्तारूढ़ है। दूसरी ओर आम आदमी पार्टी विगत समय में हाशिये पर चली गई प्रतीत होती है। अकाली दल के पुनर्जीवन का इस समय उतना प्रभाव नहीं बन सका, जिसकी आशा की जाती थी। इन चारों ही विधानसभा क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न दलों के विधायक प्रतिनिधित्व करते रहे हैं। बहुचर्चित रहे दाखा विधानसभा क्षेत्र में आम आदमी पार्टी के विधायक एच.एस. फूलका की ओर से मध्य काल में त्यागपत्र दिए जाने से भी इस पार्टी का प्रभाव कम हुआ है। इसीलिए मौजूदा चुनाव में आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार की अधिक चर्चा नहीं रही। सिमरजीत सिंह बैंस की लोक इन्साफ पार्टी के उम्मीदवार का भी आशानुकूल  प्रभाव नहीं बन सका। मुख्य मुकाबला कांग्रेस एवं अकाली दल में ही है। जहां कांग्रेस उम्मीदवार मुख्यमंत्री के साथ निकटता के कारण अधिक जाना जाता है, वहीं अकाली उम्मीदवार के विगत लम्बी अवधि से सक्रिय रहने एवं क्षेत्र के विकास के लिए उनकी ओर से किए गए कार्यों की विशेष तौर पर चर्चा होती रही है। फगवाड़ा में मुख्य मुकाबला कांग्रेस एवं भाजपा के बीच है। मुकेरियां में भी यही दोनों दल आमने-सामने हैं।  जलालाबाद क्षेत्र सुखबीर सिंह बादल के लोकसभा हेतु चुने जाने के कारण खाली हुआ था। सुखबीर सिंह बादल ने विधानसभा चुनावों में बहुत बड़ी जीत प्राप्त की थी। यह देखने वाली बात होगी कि अकाली इस विजय को किस सीमा तक कायम रख पाते हैं तथा कांग्रेस का उम्मीदवार दोनों पार्टियों के पिछली विधानसभा के चुनावों में पड़े मतों के अन्तराल को किस सीमा तक पाट सकने में कामयाब हो सकता है। चाहे पंजाब के इन उप-चुनावों की सीटों के गणित का सरकार पर कोई असर पड़ने की सम्भावना नहीं है, परन्तु निश्चित रूप से इन चुनावों के परिणाम सरकार की कारगुज़ारी का प्रतिबिम्ब अवश्य साबित हो सकते हैं। इसीलिए 24 अक्तूबर को इन चुनावों के घोषित होने वाले परिणामों के प्रति अभी से ही अधिक उत्सुकता एवं दिलचस्पी बन गई  दिखाई देती है।

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द