इच्छा-शक्ति से हल की जा सकती है पराली की समस्या


सभी प्रयासों के बावजूद सरकार किसानों द्वारा धान के अवशेषों और पराली को आग लगाना बंद करवाने में असमर्थ रही है। गत 7 नवम्बर तक पंजाब में 42,846 घटनाएं पराली को आग लगाने की घटी, जो गत वर्ष की अपेक्षा अधिक हैं। पंजाब सरकार द्वारा मशीनरी पर 400 करोड़ रुपए की सब्सिडी गत वर्ष और 268 करोड़ रुपए की अब तक इस वर्ष दी जा चुकी है, परन्तु समस्या बदस्तूर जारी है। इन सब्सिडयों पर दी गई मशीनों में एस.एम.एस. (सुपर मैनेजमेंट सिस्टम) भी शामिल है, जो कम्बाइन हारवैस्टरों पर लगाए जाते हैं। कृषि और किसान कल्याण विभाग के निर्देशक सुतंत्र कुमार ऐरी के अनुसार ऐसी 6 हज़ार एस.एम.एस. मशीनें सब्सिडी पर दी जा चुकी हैं। इसके पश्चात् अभी भी 8,000 स्वै-चालक कम्बाइनों में से बड़ी संख्या में मशीनें बिना एस.एम.एस. से चल रही हैं। चाहे ऐसी कुछ मशीनों पर हाल ही में जुर्माने भी किए गए हैं। एस.एम.एस. फिटिड कम्बाइन हार्वेस्टरों द्वारा कटाई करने के बाद हैपीसीडर के साथ गेहूं की बिजाई कर दी जाती है। चाहे एस.एम.एस. कम्बाइनों से कटाई करवाने के लिए किसानों को किराया अधिक देना पड़ता है। हैपीसीडर के प्रयोग पर कुछ किसानों द्वारा कई स्थानों पर टिप्पणी भी की जा रही है कि अन्य विधियों से गेहूं बीजने के मुकाबले झाड़ कम होता है, जिसका हल हाल ही में विकसित की गई ‘सुपर सीडर’ मशीन में मिल जाता है। सुपर सीडर जड़ों को काट कर भूमि में दबाती जाती है, जिस कारण भूमि की उपजाऊ शक्ति बढ़ती है। सुपरसीडर से बिजाई की गई गेहूं का झाड़ ज्यादा निकलता है और कोई समस्या नहीं आती। सरकार को सुपर सीडर मशीनें अधिक सब्सिडी पर देनी चाहिए, ताकि वह समूहों या सहकारी सभाओं और संस्थाओं के पास पहुंच करके इस मशीन की सेवा अधिक से अधिक किसानों को उपलब्ध हो। सुपर सीडर की मंडी में कीमत लगभग 2.35 लाख रुपए के लगभग निर्माताओं द्वारा निर्धारित की गई है। सरकार इसकी बनवाई का खर्चा और निर्माता के मुनाफे का निर्णय करके कीमत निर्धारित करने के लिए एक कमेटी बनाए, जिसमें किसानों, निर्माताओं, कृषि विभाग और पंजाब कृषि यूनिवर्सिटी के प्रतिनिधि को और इसकी उचित कीमत निर्धारित करे ताकि किसानों, समूहों, सहकारी सभाओं और संस्थाओं को उचित कीमत अदा करनी पड़े। उनको सब्सिडी की छूट भी उपलब्ध हो। किसान पराली और धान के अवशेषों को आग इसलिए लगाते हैं कि आग लगाने के अलावा किसी अन्य विधि से अवशेषों पर काबू पाकर बिजाई करना उनको महंगा पड़ता है, जो खर्च किसान बर्दाश्त नहीं कर सकते। पराली की गांठें बांध कर उठाने वाले प्लांट बहुत कम हैं और किसानों से कई स्थानों पर 1500-2000 रुपए प्रति एकड़ तक पैसे ले रहे हैं। सरकार को बिजली पैदा करने वाले छोटे-छोटे प्लांट स्थापित करने चाहिए। ऐसे बायोमास प्लांट निजी क्षेत्र में स्थापित करने के लिए सरकार को उत्साह देना चाहिए। पंजाब राज्य पावर कार्पोरेशन या अन्य किसी संस्थान को इन प्लांटों से बिजली खरीदने के लिए लामबद्ध  किया जाना चाहिए। अमलोह (फतेहगढ़ साहिब) के निकट कुछ ऐसे दो बड़े प्लांट स्थापित हुए हैं और वह अमलोह के आसपास किसानों की पराली की गांठें बनाकर बिना कोई पैसा लिये खेतों से उठा रहे हैं।
हरियाणा में भी कुरुक्षेत्र और यमुनानगर क्षेत्रों में ऐसे प्लांट स्थापित हैं। किसान पराली को आग लगाने की प्रथा को तिलांजलि देने के समय अपना नफा-नुक्सान अवश्य देखेंगे। पराली को आग लगाना छुड़वाने के लिए सरकार और समाज को किसानों द्वारा किया जाने वाला अतिरिक्त बर्दाश्त करना पड़ेगा, जो सर्वोच्च न्यायालय ने भी छोटे और मध्यम किसानों को सौ रुपए क्विंटल राशि की सहायता लेकर कुछ सीमा तक पूरा किया है। फिर बिजली पैदा करने वाले प्लांट भी अपने मुनाफे से कुछ पैसा पराली को आग न लगाने संबंधी खर्च कर सकते हैं। धान के छिलके से भी तो चावल के शैलर कुछ कमा ही रहे हैं। इसी तरह किसानों को पराली से कुछ आमदनी होनी चाहिए, जो बिजली पैदा करने वाले प्लांट ही दे सकेंगे। पंजाब सरकार ने वर्ष 2009 में कानून बनाकर किसानों पर धान एक निश्चित तिथि से पहले लगाने पर रोक लगा दी। चाहे यह पानी की बचत के लिए थी। परन्तु इससे धान काटने के बाद गेहूं की बिजाई करने के लिए समय कम रह गया है, जिसके बाद वह आग लगाने के लिए मजबूर हुए। पानी सभी की ज़रूरत है। यदि दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की सरकार यह कहती है कि पंजाब की पराली को आग लगाने के बाद हवा आने से वहां प्रदूषण फैलता है तो उस प्रदूषण को रोकने के लिए केन्द्र की सरकार को पंजाब सरकार द्वारा छोटे किसानों को दी जाने वाली सौ रुपए प्रति क्विंटल वाली राशि में अपना योगदान डालना चाहिए, बल्कि सारी राशि का बोझ ही केन्द्र सरकार वहन करे। पंजाब सरकार और केन्द्र द्वारा कृषि कर्मन पुरस्कार से सम्मानित धान का सबसे अधिक झाड़ प्राप्त करने वाले स्टेट अवार्डी राजमोहन सिंह कालेका ने अपने गांव बिशनपुर छन्ना (पटियाला) में अपनी 20 एकड़ भूमि से धान का सबसे अधिक झाड़ निकाला और 20 वर्ष में कभी पराली के अवशेषों को आग नहीं लगाई। धर्मगढ़ (अमलोह) के पंजाब कृषि यूनिवर्सिटी और आई.ए.आर.आई. से सम्मानित किसान बलबीर सिंह जड़िया ने पराली से पशुओं की खुराक बनाकर और अपने खेत में इसका एमोनिया ट्रीटमेंट करके इन विधियों पर खोज किए जाने का रास्ता दिखाया है। इनके अलग-अलग प्रयासों को उत्साहित करके इस पर काबू पाया जा सकता है। 

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