प्लास्टिक अजर है परन्तु हम नहीं


प्लास्टिक की खोज सुविधावाची जीवन जीने के लिए हुई थी, परन्तु विकास के इस चरण पर वह जानलेवा होता जा रहा है। जैसे कि आदमी का रचा हुआ सूरज आदमी को भाप बना कर उड़ा देने को तैयार हो। एक अनुमान के तहत हम भारत वासी हर साल 90 लाख टन से ज्यादा प्लास्टिक का कचरा पैदा कर रहे हैं। इस प्लास्टिक कचरे में पचास प्रतिशत सिंगल यूज प्लास्टिक है। हमारी आपकी जीवन शैली में बेपरवाही इतनी अधिक है कि हम अपनी सुविधा ज्यादा देखते हैं, नुक्सान के प्रति इतने सजग नहीं हैं। कुछ ऐसे स्थल भी हैं जहां प्लास्टिक का इस्तेमाल अनिवार्य बना दिया गया है। भारत से इतने लाचार हो गये हैं कि उन दिनों पर सोच नहीं पाते जब प्लास्टिक की इतनी बहुतायत नहीं थी। दूध या दही लाने के लिए घर से बर्तन लेकर जाते थे। सब्ज़ी, फल, दाल, मसाला, चावल लाने के लिए थैला लेकर जाते थे। गुसलघर में बाल्टी-टब या नहाने का डिब्बा प्लास्टिक का नहीं था। एक अन्य तथ्य प्रस्तुत किया जा रहा है कि हर वर्ष दुनिया में 38 करोड़ टन प्लास्टिक का उत्पादन हो रहा है जिसमें से अधिकतम 10 प्रतिशत ही रीसाइकिल हो पाता है। बाकी का कचरे के ढेर में परिवर्तित होता है। दुनिया प्रत्येक मिनट में दस लाख पीने के पानी की बोतलें खरीद रही है। पांच ट्रिलियन टन सिंगल यूज प्लास्टिक हर साल इस्तेमाल हो रहा है, जिसमें से आधा प्लास्टिक वेस्ट हो रहा है।
जिस तेजी से सिंगल यूज़ प्लास्टिक इस्तेमाल हो रहा है और हमारी दैनिक दिनचर्या का हिस्सा बन गया है, इसका उपयोग पूरी तरह बंद करने की ज़रूरत है, परन्तु क्या कार्य जन-भागीदारी के बिना सम्भव है? नहीं, हर्गिज नहीं। जैसे पानी के फिजूल खर्च को रोकने के लिए हमें घरों में काम करने वाली बहनों को अपने मकसद का हिस्सा बनाना ज़रूरी है वैसे ही सिंगल यूज़ प्लास्टिक की ज़रूरत है। सुजैन फ्रीनकोल की किताब ‘प्लास्टिक आयक्सिंक लव स्टोरी (प्लास्टिक एक ज़हरीली प्रेम कथा) इस किताब में उनकी दिनचर्या का ज़िक्र है। वह 24 घंटों के वक्फे में प्लास्टिक की कितनी चीज़ों के सम्पर्क में आई। इनमें प्लास्टिक के लाइट स्विच, टॉयलेट सीट, टुथ ब्रश, टुथ पेस्ट की ट्यूब जैसी 196 चीजें थी जबकि गैर प्लास्टिक चीज़ें मात्र 102 थीं। ़खतरनाक परिणामों को देखते हुए प्लास्टिक प्रोसैसिंग इंडस्ट्री के अनुमान ने खतरे में यह बता कर इज़ाफा किया है कि आज की खपत को देखते हुए 2022 तक पालीमर यानी हर तरह के प्लास्टिक की खपत 10.4 फीसदी की दर से बढ़ेगी। इसमें आधे से ज्यादा सिंगल यूज प्लास्टिक ही होगा। जिसे एसयूपी कहा जाता है। इसके इस्तेमाल के लिए जागरुकता अनिवार्य है।
सवाल विकल्प का भी है। क्या हम विकल्प नहीं खोज पा रहे? पहले इसे परिभाषित कर लिया जाये। सिंगल यूज प्लास्टिक में वे सभी प्लास्टिक और पैकिंग आइटम आते हैं जिन्हें हम सिर्फ एक बार इस्तेमाल कर अलग कर देते हैं। मिठाइयों के डिब्बों में इस्तेमाल आने वाले रैपर्स, पैकिंग आइटमस में इस्तेमाल प्लास्टिक, एक बार इस्तेमाल आने वाली क्राकरी जैसे चम्मच, कप, गिलास, रैपर, गुटखे के पाउच, पानी की बोतलें आदि।
पिछले कुछ समय से सफाई को लेकर जागरुकता में इज़ाफा हुआ है। आज नगर निगम, महानगर पालिकाएं, नगर पालिकाएं कचरे को अलग-अलग कर इकट्ठा करने तथा निष्पादन पर ध्यान दे रही है, परन्तु काफी काम बाकी है। नगरीय निकाय प्लास्टिक और बेस कचरे को अलग-अलग कर निष्पादन का काम ठीक से नहीं कर पा रहीं। गीला, सूखा कचरा, घरेलू हानिकारक कचरा अलग-अलग करने से लेकर उसके निष्पादन की प्रक्रिया कोई मामूली काम नहीं है। इसे ठीक से कर/करवा  कर बड़ा काम होगा। देश सेवा जैसा काम। मानवता की सेवा जैसा काम। इसलिए इसमें सभी की भागीदारी की ज़रूरत रहेगी।