गम्भीर आर्थिक संकट


पंजाब सरकार गहरे आर्थिक संकट में फंसी दिखाई दे रही है। विगत लम्बी अवधि से प्रदेश के वित्त मंत्री मनप्रीत सिंह बादल, शिक्षा मंत्री विजयइन्द्र सिंगला एवं कुछ बड़े अधिकारियों ने भी इस संबंध में बयान दिए हैं। पिछले कुछ महीनों से यह संकट और भी गम्भीर हुआ है। प्रदेश सरकार यह बयान दे रही है कि केन्द्र की ओर से उसे उसके हिस्से का जी.एस.टी. का 4100 करोड़ रुपया नहीं दिया गया। दूसरी ओर ऑडिट जनरल के आंकड़े ये दर्शाते हैं कि सरकार ने अपने साधनों में भी कोई सुधार नहीं किया। यह भी कि विगत 6 मास में प्रदेश में जी.एस.टी. की वसूली में 34 प्रतिशत की कमी आई है। घबराई हुई सरकार ने रिज़र्व बैंक से एक हज़ार करोड़ रुपया उधार लिया है, परन्तु इस उधार से हालत किस सीमा तक सुधर सकेगी, इसका अनुमान इस बात से ही लगाया जा सकता है कि सरकार का एक मास का कर्मचारियों का वेतन ही 2,000 करोड़ रुपए बनता है। विपक्षी दल यह स्थिति देखकर तीव्र आलोचना पर उतर आए हैं। इसके जवाब में सरकारी प्रवक्ता एवं सत्ता पक्ष के नेता यह कह रहे हैं कि अकाली-भाजपा सरकार ने अपने अंतिम दिनों में 31,000 करोड़ रुपए का ऋण ले लिया था। इस ऋण के लिए ज़िम्मेदार अकाली हैं, क्योंकि उन्होंने 10 वर्ष तक प्रदेश में शासन किया। इस काल के दौरान पंजाब के सिर पर यह ऋण डेढ़ लाख करोड़ रुपए से भी अधिक हो गया था। विगत अढ़ाई वर्षों में वर्तमान सरकार को भी भारी मात्रा में ऋण लेना पड़ा है, जिससे ऋण की गठरी हल्की होने की बजाय और भी भारी हो गई है। सरकार के बजट का बड़ा हिस्सा इस ऋण का ब्याज़ चुकाने में ही चला जाता है। ऐसी स्थिति में सरकार की ओर से की जाने वाली नई भर्तियों की घोषणाएं फानूस बन कर ही उड़ती जा रही हैं। हमारी सूचना के अनुसार नवम्बर मास में 70,000 कर्मचारियों को वेतन नहीं दिया जा सका। सितम्बर मास से 19 लाख के लगभग विधवाओं, अपाहिजों एवं बुजुर्गों को दी जाने वाली पैन्शन भी रुकी हुई है, जो लगभग साढ़े चार सौ करोड़ रुपए बनती है। आज सिंचाई तकनीकी शिक्षा बोर्ड एवं अन्य विभागों के कर्मचारी वेतन में देरी होने के कारण नित्य-प्रति प्रदर्शन करने लगे हैं। पावरकॉम विगत लम्बी अवधि से सरकारी नीतियों के कारण संकट में फंसा हुआ है। मुफ्त बिजली, आटा-दाल एवं ऐसी अनेक अन्य योजनाओं ने सरकार एवं इसके साथ जुड़े अन्य संस्थानों को बड़े स्तर पर ऋणी बनाकर रख दिया है। पनसप, पनसीड, मिल्कफैड और ऐसे अन्य अनेक सरकारी संस्थान आर्थिक दुरावस्था का शिकार हुए दिखाई दे रहे हैं। सरकार इन संस्थानों के फंडों का भी अपने खर्च चलाने के लिए उपयोग करती रही है। नीले, पीले कार्डों की अमली वास्तविकता लोगों के सामने है। प्रत्येक क्षेत्र में चुनावों से पहले मतदाताओं को रिझाने के लिए वायदे करने के बाद फंडों की भारी कमी के कारण सरकारों की ओर से ऋण लेकर इन दावों को आधे-अधूरे रूप में पूरा करने की कोशिशें की जाती रही हैं। लोगों में इससे और भी निराशा पैदा होती रही है। इस कड़ी में किसानों के पूरे ऋण माफ करने की घोषणाओं पर भी सरकार खरा नहीं उतर सकी। जो कुछ इसने किया भी है, उससे किसान वर्ग अधिक निराश हुआ दिखाई देता है। विगत कई वर्षों से किसानों का सैकड़ों करोड़ रुपए का बकाया तो गन्ना मिलों के सिर पर ही खड़ा है। किसान धरने लगा-लगा कर थक-हार चुके हैं परन्तु अभी तक आशा की कोई किरण दिखाई नहीं दी। अनेक विभागों के कर्मचारियों ने वेतन न मिलने की सूरत में काम बंद करने की घोषणा कर दी है। इसी कड़ी में जल सप्लाई विभाग ने तो गांवों, शहरों को पानी सप्लाई न करने की घोषणा भी कर दी है। एक समाचार के अनुसार कभी बड़ी सामर्थ्य वाला जालन्धर नगर निगम जी.एस.टी., एक्साइज़, पालिका कर एवं ऑनलाइन नक्शों की करोड़ों रुपए की बकाया राशि के लिए प्रदेश सरकार से मिन्नतें कर रहा है। ऐसी स्थिति में विकास के कार्य कैसे सम्पन्न किए जा सकेंगे, इस संबंध में तो सरकार ने दावे करने ही छोड़ दिए हैं। इस वित्तीय संकट में से निकलने के लिए कोई अधिक चिन्ता प्रदर्शित की जा रही हो तथा बड़े स्तर पर हाथ-पांव मारे जा रहे हों, ऐसा कुछ भी होते हुए दिखाई नहीं दे रहा जिससे दिन-प्रतिदिन  इस मोर्चे पर हालात और भी खराब होते नज़र आ रहे हैं, जिस कारण आज सरकार लड़खड़ाते हुए दिखाई दे रही है।

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द