अमिट छाप छोड़ गया 50वां अंतर्राष्ट्रीय फिल्म मेला 


प्रत्येक वर्ष गोवा (पणजी) में होने वाला अंतर्राष्ट्रीय फिल्म मेला अपने उद्घाटन समारोह के साथ 20 नवम्बर को शुरू हो गया था। अपने उद्घाटन समारोह के दौरान केन्द्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने 50वें इंटरनैशनल फिल्म फैस्टीवल ऑफ इंडिया  में जन-समूह को सम्बोधित करते हुए कहा कि सिनेमा भारत की ‘साफ्ट पॉवर’ है। यह भी एक यात्रा है। इसको मजबूत करते रहना चाहिए। अब भारतीय फिल्में अपने तंग दायरे में से बाहर निकल रही हैं और विदेशों से निर्देशक भारत का रुख कर रहे हैं। 50वें अंतर्राष्ट्रीय फिल्म मेले में अंतर्राष्ट्रीय फिल्मों के तहत जिस देश में फोक्स किया गया था। वह इस बार रशिया (रूस) था। जिसकी 8 फिल्में दिखाई गईं। ‘सिनेमा ऑफ दा वर्ल्ड’ के तहत इस बार 64 फिल्में पेश हुईं। ‘लाइफ टाइम अचीवमैंट अवार्ड’ (जिसकी राशि 4 लाख है) रूस की इसाबेल हूपर्ट को मिला। मूल रूप से फ्रैंच एक्टर हैं जिन्होंने 120 फिल्मों में अपना योगदान डाला। 66 वर्ष की उम्र में पहुंच कर भी सिनेमा के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी समझती हुई गम्भीर कार्य कर रही हैं। 2016 में बनी फिल्म ‘ई.एल.एल.ई.’ को दर्शकों के साथ जोड़ा गया। 1950 को मराठी परिवार में पैदा हुए रजनीकांत को ‘आइकॉन ऑफ गोल्डन जुबली इफ्फी’ से नवाज़ा गया। अंतर्राष्ट्रीय मुकाबले की ज्यूरी में इस बार जॉन इरा बेली अमरीका के ज्यूरी चेयरमैन थे। उनके साथ फ्रैंच के राबिन कैंपिलो, स्काटलैंड की लिनगमसे, बीजिंग की जांग यांग और भारत के रुपेश सिप्पी थे।
भारतीय फिल्मों के मुकाबले ज्यूरी के चेयरमैन प्रियदर्शन थे और तमिलनाडू की प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक एहातियान, आकशादित्य लामा, गिरिश मोहिते, हरीश भिमानी, जादूमोनी दत्ता, डा. के. पुतास्वासी, कुक्कू कोहली, फुनसुक लिदाखी, राजेन्द्र प्रसाद चौधरी, डा. मोहापात्रा, सुलेखा मुखर्जी और विनोद गानातरा थे।भारतीय सिनेमा के तहत इस बार 26 फिल्में इस 50वें फिल्म मेले में शामिल हुईं। 15 फिल्में (नॉन फीचर फिल्में) भारतीय पनोरमा के तहत पेश हुईं। जिस राज्य को फिल्मी नगरी के तहत उभारा गया वह इस बार गोवा था। इस राज्य की कला और संस्कृति को दर्शाते हुए 6 फिल्में दिखाई गईं, जोकि कोकणी भाषा में पेश हुईं। असल में पहले दिन से ही फिल्मों के बारे जानकारी मिलनी शुरू हो जाती हैं। सोशल मीडिया हरकत में आने के कारण ‘इफ्फी’ आपको पल-पल की ़खबर मेल करता है। इस 50वें फिल्म मेले में अंतर्राष्ट्रीय सिनेमा के साथ-साथ भारतीय सिनेमा भी अपने रंग उभारता है। जिसको ‘इंडियन पनोरमा’ का नाम दिया गया है। इसमें ‘आनंदी गोपाल’ (मराठी), ‘बधाई हो’ (हिन्दी) ‘बहत्तर हूरे’ (हिन्दी), ‘भोंगा’ (मराठी), ‘एफ्ट ़फन एंड फ्रस्ट्रेशन’ (तेलुगू), ‘हेललारो’ (गुजराती), ‘हाऊस ऑनर’ (तमिल), ‘जलीकटू’ (मल्यालम), ‘कोलांबी’ (मल्यालयम), ‘माई घाट क्राई नं. 103/2005’ (मराठी), ‘परीक्षा’ (हिन्दी) फिल्मों ने प्रशंसा हासिल की। फिर भी कुल मिला कर 4 फिल्में मल्यालम भाषा की, 6 फिल्में हिन्दी की, 4 मराठी की, एक कन्नड़ की, 2 तमिल की, 3 बंगाली की, 2 गुजराती की और एक तेलुगू भाषा की फिल्में मेले में गूंजीं। इस 50वें अंतर्राष्ट्रीय फिल्म मेले में नॉन फीचर फिल्मों के तहत अंग्रेज़ी की ‘ए थैंकलेस जॉब’, असम की ‘बोहूवर्ता’, बंगाली की ‘बूमा’, हिन्दी की ‘ब्रिजा’, कश्मीर की ‘नूरे’ आकर्षण का केन्द्र रहीं। इस मेले के दौरान दादा साहिब फालके पुरस्कार-2018 अमिताभ बच्चन की फिल्में ‘बदला’ (2019), ‘ब्लैक’ (2005), ‘दीवार’ (1975), ‘पा’ (2009), ‘पीकू’ (2015), ‘शोले’ (1975) दर्शकों के संग जुड़ी। इसी दौरान 2019 में 50 वर्ष पूरे कर चुकी भारतीय फिल्मों को भी याद किया गया, जिसमें ‘आदिमकाल’ (मल्यालम), ‘आराधना’ (हिन्दी), ‘डा. बेज़बरुआ’ (आसामी), ‘गोपी गायने बाघा बायने’ (बंगाली), ‘इरू कोदूगल’ (तमिल), ‘नानक नाम जहाज़ है’ (पंजाबी), ‘सत्याकाम’ (हिन्दी), ‘तांबड़ी माती’ (मराठी), ‘वाराकटनम’ (तेलुगू) दिखाई गईं। 50वें अंतर्राष्ट्रीय फिल्म मेले के दौरान कला की दुनिया के साथ जुड़ी इन हस्तियों को भी याद किया गया, जो अपना-अपना कर्त्तव्य निभा कर अलविदा कह गईं। इन कलाकारों के द्वारा भारतीय सिनेमा को जो चार चांद लगाए गए उन पलों को याद किया गया। आसाम के बीजू फूकन, गिरीश कर्नाड, कादर खान, ख्याम, एम.जे., राधा कृष्ण, मिरनाल सेन, राज कुमार बड़जात्या, राम मोहन, रूमा गुहा ठाकुरता, वीरू देवगन, विद्या सिन्हा, विजया मूले के किए काम को दर्शकों संग जोड़ा। यह फिल्म मेला फिल्मों से जुड़े प्रत्येक शख्स के लिए एक वर्कशाप से कम नहीं, जहां एक ओर फिल्मी दुनिया के कैमरों की विरासत को सम्भाले हुए विलियम प्रदर्शनी लगा रहा है तो दूसरी तरफ मास्टर क्लास के तहत प्रियादर्शन, वी. श्रीनिवास मोहन, फरहा खान, मधुर भंडारकर, इसाबेल हूपर्ट, जौल बेली, आदिल हुसैन, प्रकाश झा, तापसी पन्नू, राहुल रावेल, इम्तियाज़ अली आदि ने अपने अनुभव सांझे किए। ओपन एयर स्क्रीनिंग के तहत मराठी की ‘आनंदी गोपाल’, हिन्दी की ‘अंदाज़ अपना-अपना’, ‘बधाई हो’, ‘चलती का नाम गाड़ी’, ‘चेन्नई एक्सप्रैस’, ‘एफ टू-फार एंड फ्रस्ट्रेशन’, ‘गली ब्वाय’, ‘हेललारो’, ‘हेराफेरी’, ‘पड़ोसन’, ‘सुपर-30’, ‘टोटल धमाल’ फिल्में दिखाई गईं। इस मेले दौरान जो लोग डैलीगेट के तौर पर मेले का हिस्सा नहीं बन सके वह ओपन एयर स्क्रीनिंग के मंच पर फिल्में देख कर इस 50वें मेले का हिस्सा बन सकें। इस मेले के दौरान दुनिया भर की अच्छी फिल्मों ने उपस्थिति लगवाई। कई नए चेहरे सामने आए। देश/विदेश/क्षेत्रीय विषय उबरे। यह फिल्में देख कर दो बातें उभरीं। एक यह कि दुनिया में मनुष्य जिस तरह विचर रहा है उसकी पीड़ा पर्दे पर एक दिन आ ही जाएगी। दूसरा यह कि अब फिल्मों को हर हरकत प्रभावित करती है। चाहे वह हरकत धर्म से जुड़ी हो जा नस्ल से। 50वें अंतर्राष्ट्रीय फिल्म मेले ने 9 दिन अपना प्रभाव छोड़ा। मनुष्य जाति के भीतर और बाहर चल रहे संघर्ष को समर्पित था यह 50वां अंतर्राष्ट्रीय फिल्म मेला, परन्तु अफसोस हमारे अपने पंजाबी फिल्मी जगत की बात कहीं भी नहीं थी, क्या पंजाब की पंजाबीयत का कोई संघर्षशील पहलू आज तक नहीं उभरा जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी हाजिरी लगा सके।

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