लघु कथा -सीख
इस साल का नवयुवक मनु जीवन में तरक्की करना चाहता है। उसने दफ्तर में अपने सीनियर चंपकलाल से अपने मन की यही बात साझा की। चंपकलाल ने तो तरक्की करने के टिप्स रट रखे थे। ‘मनु, यह तो बहुत ही आसान है। सबसे पहले ऐसा करो कि बेकार के लोगों से मिलना जुलना और नाता रखना बिल्कुल बंद कर दो।’
अच्छा, इसकी पहचान कैसे हो सकेगी। बहुत आसान है। जिस आदम को लोग उसके नज़दीक आकर नमस्कार तक न करते हों। उसे उत्सव या किसी महत्वपूर्ण दिवस पर उपहार न देते हों। जिसकी राय मायने नहीं रखती। वही बेकार है आज के जमाने में। अच्छा, यह सुनकर मनु को अपने सेवानिवृत्त पिता की याद आई।
उसे अजीब सा लगा। भानु आगे बताने लगा।‘और जिसके चरण छूने को हर कोई बेताब है उसे काम का आदमी मानो। उससे तुम भी नजदीकी बढाओ।’
मनु ने उसकी बात चुपचाप सुन ली। मगर मनु को यह तरीक कतई पसंद नहीं आया। उसने इस रास्ते पर नहीं चलने का संकल्प लिया। उसने आज दफ्तर से पिता को कम से कम दो बार फोन किया और उनसे कुछ राय मशविरा लिया। तरक्की हौले हौले होती रहे। मगर पिता को नज़रअंदाज वह कभी नहीं कर सकता।
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