लघु कथा
फरिश्ता
छोटा रामू आज अपनी मां को कपड़े की दुकान पर ले आया था। कयोंकि आज उस की मां का जन्मदिन था। मां को कोई उपहार देने की इच्छा थी। उसने दुकानदार को मां के लिये साड़ी दिखाने को कहा। कई प्रकार की साड़ियां मां के आगे खिलार दी गई। दुकानदार बोला, ‘पहले पसंद कर लो, कीमत बता दूँगा’ रामू की मां को एक साड़ी पसंद आ गई। बोली, ‘इसका क्या दाम?’
‘दो हज़ार।’
दाम सुन कर रामू जेब की ओर देखने लगा।
रामू उठ कर काउंटर पे चला गया। इशारे से दुकानदार को पास बुला कर बोला, ‘अंकल जी, आज मेरी मां का जन्मदिन है। मैं इसकी पसंद का तोहफा देना चाहता हूँ। इस टाईम मेरे पास सिर्फ पांच सौ रुपये हैं। यदि आप यह साड़ी दे दोगे। तो बाकी के पैसों के बदले मैं आप की दुकान पर कल से कोई भी काम करके पूरे कर दूँगा।’
दुकानदार बोला, ‘ठीक है बेटे, कल काम पर आ जाना।’ दुकानदार ने साड़ी अच्छे से पैक की और रामू को पकड़ा दी। रामू साड़ी मां को पकड़ कर बोला, ‘लो मां आप को जन्मदिन मुबारक हो!’
दुकान से बाहर आकर मां रामू को बोलने लगी, ‘महीने का राशन ले आता, महंगी साड़ी खरीदने से।’ पापा दिया करते थे न तुझे, वो नहीं हैं तो अब मैं दूंगा।’ मां की आंखों में आँसू टपकने लगे। रामू को अपनी बांहों में उड़ेल कर बोली, ‘तू इतना बड़ा हो गया। मेहनत करना, गलत तरीके से धन मत कमाना। मुझे मुफ कर दे, तुझे स्कूल न भेज सकी।’ रामू मां के आंसू पोचने लगा। अगले दिन रामू काम करने के लिये दुकान पर पहुंच गया। दुकानदार से पूछा, ‘ सेठ जी, बताओ कौन सा काम शुरू करूं?’
‘काम कोई नहीं बेटा। मां से तेरा प्यार देख कर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई। कल जब मैं घर-घर लौटा तो मेरी खुशी दोगुनी चौगुनी बड़ गई।’
‘वो कैसे?’
‘महीनों से कोमा में पड़ी मेरी मां, होश में आ गई। तू तो कोई फरिश्ता हो। मैं तेरे से कोई पैसे नहीं लूंगा। अब घर जाओ। मां को बोलना यदि स्कूल जाने का मन हो तो तेरा सारा खर्च मैं झेल लूँगा।’ रामू दुकानदार के मुंह की ओर हैरत से देखता रहा। उसको कुछ भी समझ नहीं आ रहा था।
-मो. 9780667686
चालान
ईरान और अमरीका के बीच युद्ध जारी था। कोई भी देश पीछे हटने को तैयार नहीं था। हर तरह के शांति समझौते विफल हो रहे थे। भारत और अन्य देशों में पेट्रोल, डीज़ल और गैस की हालत बेहद गंभीर थी। सोने-चांदी की कीमतें आसमान छू रही थीं। अमरीका जैसे देशों में भी तेल और गैस की ऊंची कीमतों को लेकर हंगामा मचा हुआ था। प्रधानमंत्री और देश की राज्य सरकारों ने इन समस्याओं से निपटने के लिए कई तरह की योजनाएं बनाईं। तेल और गैस की खपत कम करने और सोना-चांदी न खरीदने के लिए सूचना जारी की गई।
आम लोग सोना-चांदी तो कम खरीद लेते, लेकिन तेल और गैस के बिना उनका गुजारा कैसे होता। सरकारों ने इसका एक समाधान यह निकाला कि सभी कार्यालय सप्ताह में दो दिन घर से ऑनलाइन काम करें, वाहनों का उपयोग कम किया जाए। यानी पैट्रोल और डीज़ल का कम इस्तेमाल किया जाए, साइकिल को प्राथमिकता दी जाए। एक दिन हरिंदर ने संजीव और मनदीप से फोन पर बात की, ‘यार, क्यों न हम लोग अलग-अलग मोटरसाइकिल पर यूनिवर्सिटी जाने के बजाय, एक ही वाहन पर जाया करें! किसी दिन एक अपनी मोटरसाइकिल निकाल ले, तो कभी दूसरा।’ ‘तुम सही कह रहे हो, इस तरह हम ईंधन की खपत कम करने में योगदान दे पाएंगे।’
संजीव और मनदीप ने अपनी सहमति जताई। एक दिन रास्ते में यातायात पुलिस ने एक चेकपॉइंट पर रोककर एक ही मोटरसाइकिल पर बैठे तीन लोगों का चालान काट दिया, तो संजीव ने तुरंत कहा, ‘देखिए साहब, हमने यह कदम सिर्फ पैट्रोल बचाने के उद्देश्य से उठाया है। हमारे बाकी सभी दस्तावेज पूरे हैं, हेलमेट भी पहने हुए हैं। अगर सरकारी कर्मचारी ही पैट्रोल बचाने के काम में बाधा बनते हैं, तो हम आगे से अपनी-अपनी मोटरसाइकिलों पर आ जाया करेंगे...’ यातायात पुलिस कर्मी दुविधा में था कि चालान काटें या नहीं।
मो. 9417692015
अंतर
वह ऑफिस के बड़े बाबू की पत्नी थी। जलवे ऐसे कि अफसरों की बीवियां शरमा जाएं।
बड़े बाबू ने कभी किसी को निराश नहीं किया। एवज में मिली रिश्वत की राशि से बैंक बैलेंस और भव्य मकान खड़े किए। यदि कभी बड़े बाबू किसी से नाराज हुए तो रिश्वत की रकम उनकी धर्मपत्नी यानी भाभी के पास पहुंचा दी गई। गरज यह कि नाराज़गी के चलते भी काम किसी का नहीं रुका।
दुर्भाग्यवश भरी जवानी में बड़े बाबू अचानक हृदयघात से चल बसे। तुरंत ऑफिस में शोक-सभा का आयोजन हुआ और बाबू के गुण गाए गए। शोक-सभा के बाद लोग बड़े बाबू के घर उनकी पत्नी को सांत्त्वना देने पहुंचे। सांत्त्वना के बहाने कोई उनके बदन को छूता तो कोई जमकर निहारता।
अपने पति का सरकारी फंड पाने में भाभी जी को अंतर समझ में आ गया। कल तक जो लोग बड़े अदब से उन्हें प्रणाम करते थे, उनकी आंखों की भाषा बदल चुकी थी।
(सुमन सागर)





