क्या नीति-निर्माताओं की दृष्टि से ओझल रहे किसान ?


भारत में एक मुहावरा प्रचलित है जिसके अनुसार खेती को उत्तम माना गया है। व्यापार, नौकरी और भीख को नीचे रखा गया है। महाकवि घाघ द्वारा कही गई बात ‘उत्तम खेती मध्यम बान, निषिद्ध चाकरी भीख निदान’ कविवर घाघ का कथन उस मुहावरे की पुष्टि करता है। यदि कृषक पसीना न बहाएं तो भारत ऐसा न हो जैसा दिखाई देता है। हमारे देश के कई महापुरुषों ने खेतीबाड़ी की। भगवान कृष्ण के दाऊ भईया ने तो अपना नाम ही हलधर रख लिया था। इसलिए यदि किसान खेतीबाड़ी न करे तो उसे अन्नदाता कौन कहे। 40 हज़ार किसान जब दिल्ली के बार्डर पर आकर रुक गये क्योंकि पुलिस ने उन पर पानी की तेज़ बौछारें और बल प्रयोग किया। किसानों ने भी पुलिस की चेतावनी को धत्ता बताते हुए बेरीकेट्स पर ही ट्रैक्टर ट्राली चढ़ा दी। सरकार ने किसानों से बात करने का मन बनाया ताकि कृषि क्षेत्र को कुछ सुविधाएं दी जा सकें। किसान नेता नरेश टिकैत भी बातचीत के लिए तैयार हो गए ताकि समस्या का कुछ समाधान तलाशा जा सके। भाजपा की सरकार ने किसानों की समस्याओं पर बड़ी संजीदगी से ध्यान दिया और कुछ निर्णय भी लिए, जिसमें रबी फसलों पर एम.एस.पी. बढ़ा दी। राज्यमंत्री राजेन्द्र सिंह शेखावत की अध्यक्षता में 9 सदस्यीय समिति का गठन किया गया जो सहानुभूति सहित सभी मांगों पर विचार करेगी। इस पर किसानों का संघर्ष समाप्त हुआ। देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने किसान पद यात्रा को समाप्त कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।हमारे देश में 649481 के करीब गांव हैं। राजग सरकार के अनुसार बहुत से गांवों का रूप स्वरूप बदल रहा है। अब गांव में पक्के घर, बिजली, गैस सप्लाई और आवाजाही के कई सुगम साधन भी उपलब्ध हैं। अब गांव में बेहतर सम्पर्क साधन, प्रौद्योगिकी और नई ग्रामीण योजनाएं आने से जीवनशैली में परिवर्तन हो रहा दिखाई देने लगा है। यदि यह सच है तो फिर देश में किसानों द्वारा सत्याग्रह क्यों होते हैं? क्यों उतारू हो जाते हैं संघर्षों के लिए? सन् 1859 में पहला किसान सत्यागृह बहुत तेज़ गति से देश में फैला था। इसके पश्चात् चम्पारण सत्याग्रह जिसमें महात्मा गांधी ने  पहली बार किसी किसान सत्याग्रह में भाग लिया। बारदोली सत्याग्रह जिसका वल्लभ भाई पटेल ने नेतृत्व किया और महात्मा गांधी ने इस सत्याग्रह की सफलता पर पटेल को सरदार की उपाधि दी। शहीद-ए-आज़म स. भगत सिंह के चाचा स. अजीत सिंह ने किसानों को आंदोलित करने के लिए ‘पगड़ी संभाल जट्टा, पगड़ी संभाल ओए’ का गीत गांव-गांव तक पहुंचा दिया। इतिहासकार कहते हैं कि उन दिनों के सभी सत्याग्रह आज़ादी के लिए ही किए जाते थे जो ब्रिटिश राज के खिलाफ होते थे। आज़ादी के पश्चात् किसान सत्याग्रहों की मांगों में तबदीली आ गई। इसमें मुख्यत: कज़र् माफी की बात होने लगी, क्योंकि उन दिनों देश की राजनीति में कई किसान नेताओं का उदय हो गया जिनमें चौधरी देवी लाल, चौधरी चरण सिंह, स. प्रताप सिंह कैरों इत्यादि ने किसानों के सत्याग्रह में भाग ही नहीं लिया बल्कि उनकी मांगों पर उस समय की सरकारों को पूरा करने पर जोर भी दिया। हरित क्रांति से पूर्व देश में जब थोड़े समय के लिए स्वर्गीय लाल बहादुर शास्त्री ने सत्ता की बागड़ोर संभाली तब उन्होंने सन् 1965 में जय जयवान और जय किसान का नारा दिया। किसानों की कुछ मांगें ऐसी रहीं जो प्रत्येक सत्याग्रह में सरकार के सामने लाई जाती रहीं। जैसे कि स्वामीनाथन कमेटी के फार्मूले के आधार पर किसानों की आय तय हो, सुगमता से कज़र् मिले, गन्ने का भुगतान शीघ्र-अति-शीघ्र हो, सिंचाई की सुविधा और ज़मीनों को सरकार द्वारा अधिग्रहण करने से रोकना, सूखा तथा आपातकाल तथा बाढ़ इत्यादि में फसलों की हानि में जल्दी और अधिक सहायता उपलब्ध हो। कुछ लोग किसानों की मांगों पर वैसा नहीं सोचते जैसा किसान लीडर सोचते हैं। वातानुकूलित कमरों में बैठकर किसानों की समस्याओं का समाधान नहीं खोजा जा सकता, खेतीबाड़ी घाटे का सौदा बन गई है।  ऐसा कहने वाले भी बहुत हैं। खाद, बिजली और बीज की उपलब्धि पर भी किसान नेताओं ने कई बार सरकार में गुहार लगाई है। हो सकता है कुछ समस्याएं सुलझ गई हों, परन्तु कुछ नेता यहां तक कहते हैं कि अब गांव वैसे नहीं हैं, जैसे आज से चार दशक पूर्व थे। वर्षा पर निर्भर न करने वाली बागवानी, मुर्गीपालन, मछली पालन जैसी गतिविधियों से आय के स्रोत बढ़े हैं। कुपोषण से त्रस्त, फटे पुराने कपड़े पहने किसान और धूप से झुलसे दरार पड़े खेत अब शायद ही दिखाई देते हों। इतना होने पर भी युवा कृषक कुछ शिक्षा के प्रसार के कारण और कुछ शहरी जीवनशैली से आकर्षित होकर अब शहरों की ओर जाना पसंद करता है। मिट्टी से मिट्टी होना शायद वह नहीं चाहते भौतिकवाद का यह अच्छा चेहरा नहीं। हम अंत में यही कहना चाहेंगे जब खेतीबाड़ी को उत्तम माना गया है तो सरकार इसके बारे में कोई ठोस नीति बनाए, जिससे किसानों में खुशहाली आए और उनकी संतान खेतीबाड़ी में रुचि दिखाने लगे। अन्यथा संघर्ष और नारे गूंजते रहेंगे और किसान को खेती छोड़ शहरों की ओर जाना मजबूरी हो जायेगा। भारतीय सिने जगत में किसानों की समस्याओं को बड़े मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया, फिल्म चाहे ‘दो वीघा ज़मीन’ हो, उपकार हो, मदर इंडिया हो या लगान इत्यादि। क्या हमारे देश के राजनेता यह सब नहीं देखते? क्यों नहीं किसानों की जीवनशैली में परिवर्तन हुआ। उपज के लिए मंडीकरण कर देना अथवा देश के किसी भी कोने तक फसल बिकने के लिए योजना बना देना इससे समस्या का समाधान नहीं होता, क्योंकि ढुलाई इत्यादि पर जितनी राशि खर्च होती है, फसल के पकने तक किसान के पास शायद इतने पैसे बचते ही नहीं। सरकार को एक विभाग ऐसा भी बना देना चाहिए, जिससे छोटे से छोटा काश्तकार जा कर अपनी समस्या बता सके और यदि वहां बैठे कर्मचारी उसकी बात को अनसुना करें तो इसकी जवाबदेही भी होनी चाहिए। आज का दौर ऐसा नहीं कि किसान को भाग्य के भरोसे छोड़ा जाए। नीति  निर्माताओं को किसानों की समस्याओं पर गम्भीरता से चिंतन करना होगा।