जवानों-किसानों का नहीं,  भगौड़ों का बनता भारत


यह देश है वीर जवानों का,अलबेलों का मस्तानों का, फिल्म संगीत से जुड़े गीत के यह बोल हम भारतवासियों को राष्ट्रभक्ति के प्रवाह में दशकों से सराबोर करते आ रहे हैं। जय जवान-जय किसान का नारा लगभग प्रत्येक भारतवासी ब़खूबी लगाना जानता है। यहां तक कि स्वयं हमारे देश के जवान व किसान भी ‘जय जवान-जय किसान’ के नारों को सुनकर आत्मसंतोष का एहसास करते हैं। और यह बात सही भी है कि राष्ट्रभक्ति, राष्ट्रप्रेम या राष्ट्रवाद का जो खुमार देश के जवानाें-किसानों, छात्रों, युवाओं तथा मध्यम वर्ग के लोगों पर चढ़ा होता है, वह देश के तथाकथित संपन्न लोगों पर नहीं होता। शायद यही वजह है कि जब भी पांच वर्षों के बाद राष्ट्रनिर्ण तथा विकास हेतु देश की सरकार चुनने का अवसर आता है उस समय पूरे देश में आम आदमी ही मतदान प्रक्रिया में हिस्सा लेता दिखाई देता है। इनमें अधिकांश गरीब,मज़दूर व किसान वर्ग के लोग ही शामिल होते हैं। जबकि स्वयं को संभ्रांत व संपन्न कहने वाला वर्ग मतदान के समय अपनी दूसरी प्राथमिकताओं में व्यस्त होता है। जब कभी भारत को कृषि प्रधान देश कहे जाने की बात आती है अथवा देश के कृषि उत्पादन में होने वाली बढ़ोतरी व इससे अर्जित किए जाने वाली मुद्रा या इसके बल पर देश की लगातार बढ़ती अर्थव्यवस्था का ज़िक्र हो तो निश्चित रूप से पूरा देश स्वयं को भारतीय कृषक समाज का ऋणी व शुक्रगुज़ार महसूस करता है। देश की बढ़ती अर्थव्यवस्था में देश के अन्नदाता रूपी किसानों का एक बड़ा योगदान हमेशा से ही रहा है। परंतु क्या यह भी सच नहीं है कि हमारे ही देश में इन्हीं अन्नदाताओं को तरह-तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है? किसान कहीं बाढ़ की चपेट तो कहीं सूखे की मार झेलता है। कहीं बैंकों के कर्ज़ तले दबा किसान तो कहीं किसी निजी फाइनेंसर या साहूकार के कर्ज़ के बोझ के नीचे दबा किसान। कहीं फसल का सही मूल्य न मिल पाने के कारण भूखमरी का सामना कर रहा किसान तो कहीं तंगहाली के चलते खाद व बीज की कमी का सामना कर रहा किसान। और दुर्ग्यवश इन्हीं परिस्थितियों में प्रत्येक वर्ष देश के सैकड़ों अन्नदाता मौत को गले लगा लेते हैं। अब आईए देश के जय जवानों की ह़क़ीकत पर भी एक नज़र डालें। इस बात से कौन इंकार कर सकता है कि आज यदि देश का प्रत्येक नागरिक चैन की नींद सोता है तो इसमें हमारे देश की सीमाओं के प्रहरियों अर्थात् सैनिकों की बड़ी भूमिका है। ग्लेशियर्स, रेगिस्तान, पहाड़, जंगल व समुद्र के बीच विपरीत प्राकृतिक परिस्थितियों में रहकर देश की रक्षा करना कोई आसान काम नहीं। परंतु बड़े अ़फसोस की बात है कि वर्तमान रोज़मर्रा की बढ़ती मंहगाई के अनुरूप न तो इन्हें मासिक आय मिलती है न ही उनकी मेहनत व कुर्नी के अनुसार उन्हें सुविधाएं दी जाती हैं। कई बार सेना के जवानों द्वारा ही कई ऐसी वीडियो सोशल मीडिया के माध्यम से शेयर की गई, जिससे उनके दयनीय खान-पान,रहन-सहन व उनकी पारिवारिक परेशानियों के बारे में पता चलता है। दूसरी ओर हमारे ही देश में एक स़फेदपोश लुटेरों व भगोड़ों का भी एक ऐसा ‘श़ौकीन’ वर्ग है जो इन्हीं ़गरीबों, किसानों, जवानों तथा मध्यम आय वर्ग के लोगों के द्वारा अदा किया गया टैक्स का खून-कमाई का पैसा राजनेताओं तथा बैंक अधिकारियों की मिलीभगत से लूटकर न केवल हड़प जाता है बल्कि इन बेशर्मों को अपने ऐसे काले कारनामे करने के बाद देश छोड़कर भागने में भी कोई द़िक़्कत महसूस नहीं होती। पिछले कुछ वर्षों से देश में कई ऐसे नाम सुनाई दे रहे हैं जो अपने चेहरे से ऩकाब हटने से पहले देश के संभ्रांत स़फेदपोश अमीर लोगों में गिने जाते थे। जनता के खून-पसीने की कमाई के बैंकों में जमा पैसे हड़प करना तथा क़ागज़ी हेराफेरी करना ऐसे ‘महान’ लोगों के बाएं हाथ का खेल है। एक ओर जहां हमारे देश के किसानों को बैंकों से जल्दी ऋण नहीं हासिल होता, जहां गरीब किसानों को ऋण दिलाने हेतु कोई ज़मानतदार ही नहीं मिलता, जहां किसानों की कज़र्म़ाफी की घोषणा से एक ओर किसी को सत्ता मिल जाती है तो दूसरा पक्ष ऐसी योजनाओं से तिलमिलाने लगता है वहीं हमारे ही देश की स़फेदपोशों का पक्षपात करने वाली व्यवस्था में पहले से ही भारी कर्ज़ के बोझ तले दबे बैंकों के ड़िफाल्टर्स को हवाई जहाज़ का बेड़ा खरीदने के लिए धन उपलब्ध करा दिया जाता है। और बाद में ऐसा ही व्यक्ति हज़ारों करोड़ रुपये का भगौड़ा विजय माल्या साबित होता है।  परंतु उपरोक्त वास्तविकताओं के मध्य एक सवाल अपने-आप में हमेशा सिर बुलंद किए रहता है कि भारतवर्ष की मान-मर्दा, इसके वास्तविक शुभचिंतक हमारे देश के किसान, जवान, यहां के मेहनतकश मज़दूर व टैक्स अदा करने वाले मध्यम व निम्न मध्यम वर्ग के लोग हैं या फिर ऐसे स़फेदपोश, लुटेरे, भगौड़े व आर्थिक अपराधी जो देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी अपने देश की नाक कटवाने में कोई कसर उठा नहीं रखते हैं?