अयोध्या भूमि विवाद सर्व-स्वीकार्य फैसले की उम्मीद बंधी


अंतत: अयोध्या में राम जन्म भूमि तथा बाबरी मस्जिद विवाद को लेकर देश के सर्वोच्च न्यायालय ने निश्चित समय में फैसला करने का मन बना ही लिया है। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने इस मामले से संबंधित सभी पक्षों को 18 अक्तूबर तक अपनी दलीलें और जवाब पूरे करने के लिए कहा है। 17 नवम्बर को मुख्य न्यायाधीश सेवानिवृत्त हो रहे हैं। उनकी इच्छा है कि इस अत्यावश्यक मामले का फैसला उनकी अध्यक्षता वाले पांच जज तय समय में कर दें। देश में शायद ही कोई ऐसा केस हो, जो इतने लम्बे समय से लटकता आया हो और जिसका अंतिम फैसला न सुनाया जा सका हो। यह केस लगभग 130 वर्ष पुराना है। समय के बीतने से यह पेचीदा बनता गया। दूसरी बड़ी बात यह कि इसके कोई ठोस ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलते, अपितु उसके स्थान पर यह अधिक आस्था और विश्वास से जुड़ा हुआ है। वर्ष 1526 में केन्द्रीय एशिया से आकर बाबर ने इब्राहिम लोधी पर पानीपत के मैदान में जीत प्राप्त करके देश की केन्द्रीय सत्ता संभाल ली थी। यह कहा जाता है कि उनके एक सेनापति ने अयोध्या में मस्जिद बनवाई थी। आस्थावान हिन्दुओं का यह मानना है कि इस मस्जिद से पहले इसी स्थान पर एक मंदिर होता था, जहां भगवान राम का जन्म हुआ था। यहां मस्जिद में नमाज़ पढ़ी जाती रही हो, विगत लम्बे समय से इसके बारे में भी कुछ नहीं कहा जाता। यहां कोई पूजा होती हो, इसके भी ज्यादा प्रमाण नहीं हैं परन्तु 1949 में मस्जिद के विवादित ढांचे में रामलला की मूर्ति रख दी गई। इससे पहले बाहरी प्रांगण के राम चबूतरे में पूजा होती थी। 1949 में मूर्ति गुम्बद के नीचे रखी गई थी। 1984-85 में मूर्ति के दर्शन करने की अनुमति दे दी गई और उसके बाद इस संबंधी घटनाक्रम तेज़ी से चलने लगा। दोनों ही पक्षों में विवाद और टकराव बढ़ने लगा। दिसम्बर 1992 में कुछ हिन्दू संगठनों ने 16वीं सदी की इस मस्जिद के ढांचे को तोड़ दिया और बाद में वहां अस्थायी पूजा स्थल बना दिया गया। इस घटना से देश भर में बड़े स्तर पर साम्प्रदायिक दंगे हुए थे। पाकिस्तान सहित दुनिया के अन्य बहुत से देशों में इसकी कड़ी प्रतिक्रिया हुई थी। बाद में इस संबंधी अदालतों के केसों में भी तेज़ी आ गई, जिस संबंध में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बहुत ही महत्वपूर्ण फैसला वर्ष 2010 में दिया। यह अदालत में की गई 14 अपीलों पर आधारित था। इस फैसले में 2.77 एकड़ की विवादित भूमि को तीन हिस्सों में बांटने का फैसला सुनाया गया। एक हिस्सा सुन्नी वक्फ बोर्ड, दूसरा निर्मोही अखाड़ा और तीसरा राम लला के प्रतिनिधियों को दिया गया। इस फैसले ने विवाद को और भी तेज़ कर दिया। उसके बाद इस संबंध में कई अपीलें सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल की गईं और दर्जन से अधिक पार्टियां इस विवाद में उठ खड़ी हुईं। इस बीच अलग-अलग पक्षों द्वारा आपसी समझौते के प्रयास हुए। सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे समझौते के लिए मार्ग प्रशस्त करने के लिए मध्यस्थ नियुक्त करने का ऐलान किया। इसी वर्ष मार्च में सालसी का सिलसिला शुरू हुआ, परन्तु वह किसी परिणाम पर नहीं पहुंच सका। सुप्रीम कोर्ट ने इस विवाद का मध्यस्थता द्वारा हल निकालने में असफल हो जाने के बाद 6 अगस्त से अयोध्या केस की रोज़ाना सुनवाई करने का फैसला किया, जिसके फैसले संबंधी अब तस्वीर साफ होती दिखाई दे रही है। यदि सुप्रीमकोर्ट की इच्छा के अनुसार 18 अक्तूबर तक बहस पूरी हो जाए तो मुख्य न्यायाधीश के 17 नवम्बर को सेवानिवृत्त होने से पहले इस केस का फैसला सामने आने की सम्भावना बन गई है। जिस ढंग से इसका समूचे भारतीय समाज पर असर हुआ है, जिस ढंग से यह लगातार दशकों तक लटकता आया है, और जिस तरह यह देश के सर्वोच्च न्यायालय के पास पहुंचा है, उसको देखते हुए देश, समाज और भ्रातृत्व साझेदारी के लिए अब सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए जाने वाले फैसले को माना जाना चाहिए। केन्द्र सरकार ने भी और इस विवाद से संबंधित सभी पक्षों ने भी समय-समय पर यह प्रभाव दिया है और विश्वास प्रकट किया है कि वे इस संबंध में देश के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को मानने के पाबंद होंगे। नि:संदेह इसके लिए सभी पक्षों को सुनाए जाने वाले इस फैसले का पाबंद होना चाहिए ताकि देश में भ्रातृत्व सांझेदारी और एकजुटता मजबूत हो सके, जो इस सदियों पुराने देश की बड़ी परम्परा रही है। 

-बरजिन्दर सिंह हमदर्द