स्वर्ग की सृष्टि


एक व्यक्ति था जो थोड़ा धार्मिक प्रवृत्ति का था लेकिन अत्यंत अहंकारी भी। उसकी इच्छा थी कि इस जन्म में चाहे जो करना पड़े लेकिन मरने के बाद स्वर्ग अवश्य मिले इसलिए अनेकानेक संत-महात्माओं के पास जाता और उनकी सेवा कर स्वर्ग जाने का उपाय पूछता। लोग जैसा बताते वैसा करता। गरीबों की सेवा करता और दान-दक्षिणा देता। वह अपनी कमाई का अधिकांश भाग परोपकार में ही लगा देता था क्योंकि उसे उम्मीद थी कि ऐसा करने से स्वर्ग की प्राप्ति निश्चित है। लेकिन जैसे-जैसे उसकी परोपकार की भावना का विकास हो रहा था, वैसे ही उसमें अहंकार की भावना भी बढ़ती ही जा रही थी। उसकी दानशीलता पर कोई टीका टिप्पणी कर देता तो उसके क्रोध की सीमा न रहती। एक बार एक प्रसिद्ध संत उसके घर के पास आकर रुके तो वह फौरन उनकी सेवा में उपस्थित हो गया और उनसे भी स्वर्ग जाने का उपाय पूछा। साथ ही अपने स्वर्ग जाने की प्रयासों की चर्चा भी उनसे की। संत ने उस व्यक्ति को ध्यानपूर्वक  ऊपर से नीचे तक देखा और उपेक्षा से कही ‘तुम स्वर्ग जाओगे? तुम तो किसी नीच कुल के व्यक्ति दिखलाई पड़ रहे हो। तुम परोपकारी या दानी व्यक्ति नहीं, कोई व्यापारी या धर्म के ठेकेदार ज्यादा लग रहे हो।’ इतना सुनते ही वह व्यक्ति क्रोध से भर उठा और संत को मारने के लिए डंडा उठा लिया। संत ने मुस्कराते हुए पूछा, ‘तुम में तो तनिक भी धैर्य नहीं। इतनी अधीरता और अहंकार के होते हुए तुम स्वर्ग कैसे जा पाओगे?’ व्यक्ति को संत की कही हुई बातों का मर्म समझ में आया तो वह संत के चरणों में गिर पड़ा और अपनी गलती के लिए क्षमा मांगने लगा। आगे से क्रोध न करने तथा अहंकार वृत्ति के त्याग का भी प्रण किया। ‘यही है स्वर्ग का उपाय,’ संत ने कहा ‘एक-एक कर सब अवगुणों से मुक्त हो जाओ। जिस दिन विकारों से मुक्त हो जाओगे, उसी दिन स्वर्ग की सृष्टि हो जाएगी और यहीं पर हो जाएगी।’

—सीताराम गुप्ता