ऐसी मित्रता अच्छी नहीं


नारायण और अरविंद दसवीं के छात्र थे। उन दोनों की मित्रता सारे विद्यालय में प्रसिद्ध थी। दोनों पढ़ाई में अच्छे थे। दोनों इकट्ठे पढ़ते, खेलते तथा घूमते थे। स्कूल आना-जाना भी उनका इकट्ठा ही था। लेकिन उन दोनों की आदतों में थोड़ा अन्तर था। नारायण सुशील, शान्त, एकाग्रचित तथा सच बोलने में विश्वास रखता था। लेकिन अरविंद शरारती, लापरवाह तथा कभी-कभी झूठ भी बोल लेता था। नारायण उसे समय-समय पर टोकता तथा समझाता रहता था। परन्तु अरविंद उसकी नसीहत को सदैव अनसुना कर देता था। नारायण की कक्षा के कई अध्यापक उसे अरविंद की दोस्ती छोड़ देने को कह चुके थे, परन्तु बचपन की दोस्ती होने के कारण वह उसे छोड़ता नहीं था। एक दिन हिन्दी अध्यापिका ने उनकी कक्षा को गृह कार्य करके लाने को कहा, उसने यह भी कहा कि जो बच्चा गृह कार्य करके नहीं लायेगा उसे प्रधानाचार्य कक्ष में ले जाया जायेगा तथा उसे दण्ड भी मिलेगा। अरविंद भी उन बच्चों में से एक था, जिन्होंने हिन्दी विषय का गृह कार्य नहीं किया हुआ था। अध्यापिका ने आते ही उन बच्चों को खड़ा कर लिया, जिन्होंने गृह कार्य नहीं किया हुआ था। सभी बच्चों की कापियों का निरीक्षण करने के पश्चात् जिन बच्चों ने गृह कार्य नहीं किया हुआ था उन्हें प्रधानाचार्य कक्ष में जाने के लिए कहा। प्रधानाचार्य बहुत ही कठोर स्वभाव के थे। बच्चे उनसे बहुत डरते थे। अरविंद ने मन में सोचा कि अब अन्य बच्चों की तरह उसे भी दण्ड मिलेगा। उसके पापा को बुलाया जायेगा। अध्यापिका के पास आते ही उसने कहा—‘मैडम, मैंने काम तो किया हुआ है, लेकिन मेरी कापी नारायण के घर पड़ी है। हमने इकट्ठे ही
विद्यालय से मिला कार्य किया था। मैडम ने नारायण को बुलाकर पूछा—‘बेटा, सच बताना क्या इसकी कापी तुम्हारे घर पड़ी है? नारायण मैडम द्वारा पूछे जाने पर एकदम घबरा गया। उनके मन में आया कि वह इन्कार कर दे लेकिन सच्चाई पर मित्रता की भावना भारी पड़ गई। उसने उसकी कापी अपने घर पड़ी होने की बात मान ली। मैडम तुरन्त बोले—‘ठीक है बेटा, यह पकड़ो मेरा मोबाइल, अपनी मम्मी से मेरी बात करवाओ।’ नारायण अध्यापिका द्वारा फोन पर मम्मी से बात करवाने  की बात को सुन कर घबरा गया। वह कुछ कहने ही वाला था कि इतने में घंटी बज गई। अध्यापिका ने नारायण और अरविंद को अपने कमरे में बुला लिया। इतने में नारायण का मन बदल गया। उसने अध्यापिका को कहा—‘मैंने, आपके डर से ही झूठ बोला था। मैं मित्रता निभाने के चक्कर में झूठ बोल बैठा। हमने गृह कार्य इकट्ठे नहीं किया और न ही इसकी कापी मेरे घर पर है। नारायण का उत्तर सुनकर मैडम बोली—‘बेटा, सच बोलने के लिए शाबाश परन्तु ऐसी मित्रता अच्छी नहीं। एक तो तुम झूठ बोलकर गलत आदत सीख रहे हो, दूसरा तुम स्वयं उसे गलत रास्ते में डाल रहे हो। भविष्य में ऐसा मत करना। नारायण और अरविंद दोनों ने अपनी गलती के लिए क्षमा मांग ली। अन्य बच्चों को भी घर से काम करके लाने के लिए कह दिया गया।