भारत-अमरीका व्यापार संबंधों में नई बयार


भारत एवं अमरीका के बीच व्यापार संबंधों को नई ऊंचाई पर ले जाने संबंधी भारतीय वित्त मंत्री सीतारमण का बयान जहां विदेशों के साथ देश की व्यापार नीति को स्पष्ट करता है, वहीं यह इस बात का भी द्योतक है कि विदेशों को निर्यात में वृद्धि किये बिना देश में वर्तमान में मौजूद वित्तीय मंदी का सामना नहीं किया जा सकता। वित्त मंत्री सीतारमण आजकल अमरीका में हैं, और यह बात उन्होंने अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष मुख्यालय में अमरीकी वित्त सचिव स्टीवन मुशीन के साथ वार्तालाप के दौरान कही। भारतीय वित्त मंत्री का यह कथन भी एक सार्थक संकेत जैसा है कि दोनों देशों के बीच व्यापारिक धरातल पर हाल ही में कुछ अच्छे पग उठाये गये हैं, और निकट भविष्य में इनके अच्छे परिणाम निकलने की बड़ी सम्भावनाएं हैं। सीतामण का यह बयान भी आशावाद को जगाने के लिए काफी है कि इन संबंधों को बढ़ाने के लिए व्यापार औपचारिकताओं को तय किया जा रहा है और सम्भावित फैसले हेतु तेज़ी से कार्य किया जा रहा है। इस तथ्य का प्रमाण इस बात से भी मिल जाता है कि विगत कुछ समय से दोनों देशों के आधिकारिक धरातल पर कोई विपरीत बात नहीं हुई है, और वर्तमान में भी सीतारमण की अमरीकी वित्त क्षेत्र से सम्बद्ध अधिकारियों से हुई बातचीत में प्रगति के चिन्ह साफ दिखाई दिये हैं। नि:संदेह भारतीय वित्त मंत्री का यह बयान जहां देश के लिए एक अच्छे संकेत जैसा है, वहीं इससे अन्य देशों के साथ विदेश व्यापार नीति की एक नई झलक भी मिलते दिखाई देती है। दुनिया आज एक विश्व ग्राम के रूप में प्रकट होती जा रही है। प्रत्येक देश एकाधिक देशों के साथ अपने-अपने हितों के अनरूप संबंध बढ़ाने खासकर व्यापारिक रिश्ते बढ़ाने हेतु उत्सुक एवं तत्पर रहता है। एशियाई देशों में यह जैसे एक प्रतिस्पर्धा के रूप में सामने आया है। चीन की ओर से नेपाल, भूटान, म्यांमार, बंगलादेश के साथ बढ़ाए जाते संबंधों के दृष्टिगत भारत की ओर से भी अपनी विदेश नीति खासतौर पर व्यापार के धरातल पर अधिक विस्तार दिये जाने की बड़ी ज़रूरत है। वित्त मंत्री का वर्तमान अमरीकी दौरा भी सम्भवत: इसी विस्तार का हिस्सा बनने की एक प्रक्रिया है। अमरीका सामरिक धरातल पर तो एक बड़ी शक्ति है ही, व्यापारिक दृष्टिकोण से भी अमरीकी संबंधों की कदापि अवहेलना नहीं की जा सकती। अमरीका की चीन के साथ व्यापार धरातल पर चल रही खींचतान भी भारत के लिए एक बड़ा संकेत है कि वह अमरीका और भारत के अन्य मित्र देशों के साथ अपने संबंधों को मजबूत बनाये। चीन की उपस्थिति के कारण भारत-चीन सीमाओं से जुड़े देशों में तो इस नीति को विस्तार देना बहुत ज़रूरी हो गया है। वित्त मंत्री ने अपने इस दौरे के दौरान अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के अतिरिक्त विश्व बैंक के अधिकारियों के साथ अहम वार्तालाप किया और यह वार्तालाप भी देश के विदेश व्यापार की कड़ियों से जुड़ा रहा। वित्त मंत्री का निष्कर्ष-स्वरूप कहा गया यह एक वाक्य भी संतोष जगाता है कि भारत और अमरीका के बीच व्यापार धरातल पर हुई बातचीत का समझौते के रूप में कोई परिणाम बहुत शीघ्र सामने आ सकता है। उन्होंने भारतीय उप-महाद्वीप और एशियाई क्षेत्र में मौजूदा स्थितियों  के दृष्टिगत सोच-समझ कर फैसला किये जाने पर भी बल दिया। हम समझते हैं कि भारत की सरकार जिस प्रकार 50 खरब डालर की अर्थ-व्यवस्था बनने के दावे कर रही है, उसके अनुरूप देश की विदेश व्यापार नीति को विस्तार दिये जाने और अमरीका जैसे देशों के साथ व्यापार संबंधों को बढ़ाये जाने की महती आवश्यकता है। चीन भी इस पूरे क्षेत्र को अपने व्यापार घेरे में लेने की भरपूर कोशिश कर रहा है। ऐसे में, भारत का भी यह कर्त्तव्य बन जाता है कि वह इस हेतु अपने प्रयासों एवं यत्नों को सतत् बनाए रखे। इस हेतु देश के निर्यात लक्ष्यों को बढ़ाने के लिए विश्व देशों की स्थानीय स्थितियों के अनुरूप उनसे संबंधों को निर्धारित करना होगा। सीतारमण के हालिया दौरे की एक बड़ी उपलब्धि दोनों देशों के बीच अतीत में उपजे कुछ मतभेदों को दूर करने हेतु अमरीकी अधिकारियों की सहमति का होना भी है। दोनों देशों के वाणिज्य मंत्रालय अंतिम समझौते की भूमिका तैयार करने में जुटे हैं। हम समझते हैं कि यदि अमरीका के साथ व्यापार संबंधों के धरातल पर कोई नया समझौता सम्पन्न होता है तो इससे इन दो देशों के बीच तो एक नई लकीर खिंचेगी ही, भारत के पड़ोसी देशों में आर्थिकता के धरातल पर एक नई बयार बहेगी, जिसका लाभ उप-महाद्वीप के सभी देशों को पहुंचेगा।

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