लार्ड माउन्टबेटन एवं भारत की


इंग्लैंड की शांत संध्या को हमें सुंदर एकांत रौमसे-ऐबी गिरिजाघर को देखने का अवसर प्राप्त हुआ। मिल-लेन के आगे से निकलते हुए हम विशाल भव्य रौमसे-ऐबी की ओर आकर्षित हुए। जिसका अविक्षुब्ध एवं शांतिपूर्ण वातावरण मंत्रमुग्ध  करता है। कार को वहीं पार्क कर हम रौमसे-ऐबी की ऐनटरेन्स की ओर चल पड़े जो वर्ष 1907 की पुरानी-ऐबी नींव पर पुन: बनाया गया था। भीतर जाते हुए हम अनभिज्ञ थे कि हमें भारत के अंतिम वाइसराय लार्ड माउन्टबेटन का भी लिंक यहां मिलने वाला था।
रौमसे-ऐबी : तब और अब
मुख्य द्वार पर हमें एक विसिटर ब्रोशर मिला जिसमें रौमसे-ऐबी के मुख्य आकर्षण अंकित थे। हमने पढ़ा कि संत बेनेडिक्ट के समय यहां 500 वर्ष तक ननस (मठवासिनी) रहती थीं और क्रूर राजा हेनरी आठ के शासन में रौमसे-ऐबी को ध्वंस होने से बचाया गया जब चार दानी व्यक्तियों ने इसे केवल सौ पाउंड में राजा से खरीद लिया। फिर हमने अपनी रौमसे-ऐबी की ‘विश्वास की तीर्थ यात्रा’ आरंभ की जो धार्मिक, ऐतिहासिक  एवं शिल्प कलाओं के समावेश का कोष है। कथिड्रल के भीतर हमें सर्वप्रथम बड़े श्वेत पत्थर से निर्मित सुंदर नक्काशी वाला फोन्ट दिखा जिस पर सदियों से नवजात शिशुओं का बैपटिज़्म (ईसाई चर्च में सदस्य बनाते समय अभिषेक करना एवं फिर नामकरण करना) किया जाता है। ऐबी के केन्द्रीय भाग-नेव पर चलते हुए हमने ऊंची छत की बेहतरीन आर्चिस (मेहराबों) को देखा जो नोरमैन एवं अंग्रेज़ी आर्कीटेक्चर शैली में बनी थी। 1961 में कढ़ाई किए रंगीन एमब्राइडरड परदे के आगे से होकर हम संत निकोलेस के चेपल में पहुंचे (छोटा चर्च या पूजा स्थल)। परदे पर अनेक ईसाई संतों एवं परम्परिक ईसाई चिन्हों से हाथ कढ़ाई की गई है।
संत निकोलस का चेपल एवं  लार्ड माउन्टबेटन
रोमसे-ऐबी के भीतर अनेक छोटे चेपल हैं जिनमें से एक संत निकोलस का है जो उदार हृदय वाले एवं बच्चों से प्रेम करने वाले विशेष संत हैं। ऐसा माना जाता है कि वे ही क्रिसमस उत्सव के सेन्टा क्लास हैं जो सभी के लिए उपहार लाते हैं। आगे हाई आलटर के पास क्रिसमस ट्रीस भी सजाए गए थे (गिरिजाघर में मुख्य पूजा स्थल)। चलते हुए नीचे फर्श पर एक स्याह कब्र पत्थर को देख हम जब साइड से निकलने लगे तो दृष्टि उस पर बने राजसी चिन्ह एवं खुदाई पर पड़ी। उस पर लिखा था कि वह कब्र ऐडमिरल ऑफ फ्लीट्स, एर्ल माउन्टबेटन ऑफ बर्मा की है जिनका जीवन काल 1900 से 1979 तक था। रोमसे ऐबी में कब्र को देख हम हैरान हुए एवं फोटो लेने लगे, तब हमारी ओर एक नन आई और उसने हाई आलटर की ओर संकेत किया जहां लार्ड माउन्टबेटन का विशेष ‘प्यू’ (पूजा गद्दी) भी था। संतों को समर्पित अनेक चेपलस के आगे से होकर हम चर्च की केन्द्रीय नेव पर से होकर प्रभावशाली, बहुमूल्य कलात्मक स्टेनड गलास खिड़कियों की पृष्ठभूमि वाले, हाई आलटर के निकट पहुंचे। 19वीं शताब्दी के वाकर आरगन (भक्ति गीतों के संग बजाने वाला संगीत वाद्य यंत्र) के समक्ष हमें सुंदर लकड़ी से बनी ब्राडलैंड्स प्यू दिखी। ब्राडलैंड्स लार्ड माउन्टबेटन का पुश्तैनी घर है जिसके नाम से इसे विशेष पूजा सीट को पुकारा जाता है। एक पैनल पर माउन्टबेटन परिवार का राजसी चिन्ह बना था जिसके नीचे राज-घोष वाक्य लिखा था। दूसरे पैनल पर लार्ड माउन्टबैटन को श्रद्धांजलि लिखी थी। आज भी माउन्टबैटन के परिवार के सदस्य इन्हीं प्यू-सीट्स  पर बैठ प्रार्थना करते हैं।
लार्ड माउन्टबेटन एवं हिन्दुस्तान
टाइम मशीन पर सवार, मैंने अपने को लार्ड माउन्टबेटन के जीवन काल में पाया। प्रिंसेस एलीस उनकी नानी थी जो इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया की पोती थी। तभी लार्ड माउन्टबैटन को प्रथम अर्ल माउन्टबैटन ऑफ बर्मा के शीर्षक से सम्मानित किया गया। ब्रिटिश रॉयल नेवी आफिसर से लेकर द्वितीय विश्व युद्ध के ‘सुप्रीम अलाइड कमांडर’ के रूप में लार्ड माउन्टबैटन का करियर सम्मानों एवं सफलताओं से परिपूर्ण था। फरवरी 1947 में उन्हें ‘वाइसराय ऑफ इंडिया’ घोषित कर उन्हें भारत को 1948 तक स्वतंत्र देश में परिवर्तित करने का कार्यभार दिया गया। तभी वह भारत के अंतिम ‘वाइसराय’ एवं प्रथम ‘गवर्नर जनरल ऑफ इंडिपेनडेन्ट इंडिया’ कहलाते हैं। ऐसा माना जाता है कि आरंभ में लार्ड माउन्टबेटन ने हिन्दुस्तान के विभाजन को रोकने के भी प्रयत्न किए थे। अस्थिर वातावरण के चलते हुए उन्होंने विभाजन को शीघ्रता से अगस्त 1947  में करवा दिया। भारतीय शीर्ष नेता-गांधी व नेहरू के निकट होते हुए, वह अपनी टर्म पूरी करके जून 1948 तक दिल्ली में रहे, फिर ब्रिटेन लौटे।
हैन्ड ऑफ गॉड जेम
रौमसे-ऐबी के हाई आलटर से वापिस जाते हुए हम 11वीं शताब्दी के पत्थर से निर्मित ‘रूड’ को देखने के लिए रुके जिसमें जीसस को क्रास पर जीवित दर्शाया गया है और ऊपर से ‘हैन्ड ऑफ गॉड’ (भगवान का हाथ) नीचे आकर जीसस का स्वागत कर रहा है (‘रूड’ सूली पर चढ़ाने वाला क्रास है)। इस प्रदर्शन को ‘देश की नायाब मणि’ पुकारते हैं।
लार्ड माउन्टबेटन का निजी झण्डा
फिर हम चलते हुए चर्च के पिछले छोर तक पहुंचे जहां (सेन्ट निकोलस चेपल से मिली) नन ने हमें लार्ड माउन्टबैटन के निजी झण्डे का प्रदर्शन देखने को कहा था। यदि वह हमें न बताती तो संभवत: वह महत्वपूर्ण प्रदर्शन हम मिस कर जाते। झण्डे के नीचे पीतल की प्लेट पर लिखा था-इंडिया के वाइसराय का निजी झण्डा जो 1947 में दिल्ली से लाया गया था और उस पर लार्ड माउन्टबेटन के चार पदों के नाम खुदे थे जो चार वाक्यों जितने लम्बे थे। लार्ड माउन्टबैटन के पर्सनल फ्लैग पर ‘स्टार ऑफ इंडिया’ का चिन्ह बना था जिसके ऊपर महारानी विकटोरिया का मुकुट बना था। इस झण्डे को दिल्ली के वाइसराय हाउस पर फहराया जाता था। 
रौमसे क्षेत्र का माउन्टबेटन परिवार
वहां खड़े हुए हमें 27 अगस्त 1947 का वह दिन याद आया जब लार्ड माउन्टबेटन की आइरिश आतंकवादी गुट ने बम ब्लास्ट से हत्या की थी। इंग्लैंड की महारानी एलीजबेथ, इंग्लैंड व यूरोप के राज परिवारों ने, हजारों व्यक्तियों ने लंदन में उनकी अंतिम यात्रा में भाग लिया। बाद में जैसे लार्ड माउन्टबेटन की इच्छा थी, वैसे ही उन्हें अपने पुश्तैनी घर ब्राडलैंड्स के निकट रौमसे-ऐबी में दफनाया गया। एक पादरी ने हमें बताया कि कब्र को देखने हजारों विजिटरस यहां आते हैं। उन्हें 1979 का वह दिन भी याद था जब लार्ड माउन्टबैटन को दफनाया गया था और सम्पूर्ण रौमसे नगर में शोक का वातावरण था जहां हजारों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। माउन्टबैटन रौमसे-ऐबी को अपने ‘विश्वास एवं धर्म’ का केन्द्र मानते थे। शानदार आर्कीटेक्चर से निर्मित, हज़ार वर्ष पुराने पूजा स्थल रौमसे-ऐबी से वापिस लौटते हुए हमारे मन में क्रिसमस उत्सव की यादों के साथ-साथ भारत में लार्ड माउन्टबेटन की याद भी थी।