क्यों न इस प्रकार करें बेटियों का पालन-पोषण

बेटी का प्यार ही कुछ इस प्रकार होता है कि वह छोटी उम्र से ही माता-पिता की ज़िन्दगी बन जाती है। बेहद प्यार से परवरिश की गई बेटी कब जवान हो जाती है पता नहीं चलता। माता-पिता को अपनी बेटी हमेशा एक छोटी गुड़िया की तरह लगती है। बेटी के पालन-पोषण की ज़िम्मेदारी को बड़ी सूझबूझ के साथ निभाने की आवश्यकता होती है। आज की तेज़ रफ्तार और मूल्यवान जीवन में अपनी बेटी को अच्छे और बुरे के बारे में बताना एक बहुत बड़ी चुनौती है। समझदार और दूरदर्शी माता-पिता इसे बाखूबी निभा जाते हैं, लेकिन बेटियों के पालन-पोषण में कहीं थोड़ी-सी भी कमी रह जाए तो भविष्य में बहुत-सी मुसीबतों का सामना करना पड़ता है। माता-पिता को चाहिए कि शुरू से ही बेटी की हर बात को ध्यान सुनें और उसे फैसला लेने के योग्य बनाया जाए।
कुछ लोगों की सोच होती है कि लड़कियों को डरा कर सहम का माहौल बना कर ही बड़ा किया जाए। लेकिन ऐसे माहौल में बेटी डरी और सहमी रहती है और भीतर ही भीतर मरती रहती है। परिणाम स्वरूप न तो वह अपने माता-पिता के साथ अपने मन की बात करती है और न ही उन पर पूर्ण तौर पर विश्वास करती है। जहां मां का प्राथमिक दायित्व है कि वह अपनी बेटी के साथ ऐसा माहौल पैदा करे जिसमें बेटी बिना किसी हिचकिचाहट के मां के साथ हर बात को सांझा कर सके। 
युवावस्था में कदम रखते ही बेटियों की मनोदशा कुछ अलग हो जाती है, लेकिन अगर माता-पिता का साथ और सही दिशा-निर्देश हों तो बेटियां कुमार्ग पर जाने से बच सकती हैं। मां को बेटी की खुशी, ़गमी, उपलब्धियां, कमियां और कुशलताओं का ज्ञान होना ज़रूरी है। बेटी को ज़िद्दी मत बनने दें, अपितु दूरदर्शी समझ वाली बनाना चाहिए। अपने घर का माहौल खुशनुमा रखें। अपनी बेटी को घरेलू झगड़ों और नकारात्मकता के बोझ से दूर रखें। हर समय आपसी झगड़ों और दुख के आंसू उसके आगे नहीं बहाते रहना चाहिए। क्योंकि इससे उसके मन में गुस्सा और ऩफरत घर कर जाएगा। आज का समय बेटियों को यह कह कर रसोई के कामकाज़ से दूर रखा जाता है कि पहले पढ़ाई कर लो, काम तो पूरी उम्र करना है। यह हमेशा याद रखना चाहिए कि बेटियों के लिए घर के काम संबंधी जानकारी होना आवश्यक होता है, जिससे उनमें निपुणता बढ़ने के साथ-साथ माता-पिता को भी सहयोग मिलता रहता है। बेटी को हमेशा अच्छी श्रोता बनाना चाहिए। ताकि सही समय पर अपनी बात रखने की समझ हो। तर्क भरपूर जीवन जीने के लिए उत्साहित करें। अपनी बेटियों के साथ समझ की ऐसी साझ बनानी चाहिए कि वह आपको अपना बॉस न मान कर सच्चा साथी माने, तभी वह अपनी सभी बातें साझी कर सकेगी। अगर कहीं अनजाने में उससे कोई गलती हो जाती है तो उसको डांट लगाने की बजाय प्यार से समझाना चाहिए। इससे जहां छोटी उम्र में वह आपके साथ अच्छे फैसले लेकर चलेगी, वहीं भविष्य में भी अकेले तौर पर सुखद फैसला ले सकेगी। जीवन भर मां बेटी के साथ नहीं रहती लेकिन मां के व्यवहार की सांझ में जो बातें एक बेटी ने सीखी होती है, वह जीवन भर उसके लिए अच्छा मार्ग-दर्शक बनती है। जिससे बेटियां माता-पिता के सिर का ताज बनती हैं।