अनहोनी


पीला मेंढक गांव से बाहर तालाब में रहता था। उसकी मां मैंडी बताती थी कि उसका जन्म भी तालाब में हुआ था। इसीलिए इस तालाब का साफ पानी और वनस्पतियां पीले मेंढक के मन में तूफान मचाती थीं। उसका बाप अकसर कहता था, ‘यह तो कुदरत की ही कृपा है कि यह तालाब भूत-प्रेतों से बचा रहा। सामने रहने वाले लोगों के बच्चे हमारे मेंढकों से खेलने आ जाते। मेंढकों में जैसे खुशी छा जाती। बच्चों को देखकर उछल-कूद करने लगते। बच्चे मेंढकों की नकल उतारते। जब बच्चे परेशान करते तो मेंढक अपना शरीर फुला लेते और बच्चे डर कर दूर भाग जाते। कभी-कभी तो मेंढक बच्चों से बातें करने की खातिर किनारे पर आ बैठते।’पीले मेंढक का बाप बताता था-पहले लोग आज जैसे नहीं थे। जीव-जंतुओं पर तरस खाते थे। इन्सान ने कभी हमें पत्थर नहीं मारा था। माएं बच्चों को यह कहकर डराती थीं कि अगर मेंढक को परेशान करोगे तो गले में फोड़ा निकल आएगा। बच्चे मेंढक को बिल्कुल परेशान न करते। पीले मेंढक के बाप के मारे जाने की कहानी बहुत दर्द भरी है। एक दिन पीले मेंढक के मां-बाप पास के खेत में रहते किसी करीबी दोस्त से मिलने के लिए घर से चल पड़े। जब सड़क के नज़दीक पहुंचे, तेज़ धूप के कारण सड़क पर तारकोल पिघली हुई थी। पीले मेंढक के बाप ने सोचा कि वो तो यहीं से सौ बार गुजरा है, वो आगे चल पड़ा और पीछे-पीछे पीले मेंढक की मां। अभी दो-चार कदम ही चले थे उनके पांव लुक के साथ चिपक गए। पांव बाहर ही न निकले। जैसे ताले लग गए हों। वह अभी तारकोल से पांव छुड़ाने के लिए संघर्ष कर रहे थे कि एक तेज़ रफ्तार कार, उनके ऊपर से गुजर गई। पीले की मां-बाप पिचक गए थे। अनहोनी हो चुकी थी। दूर-दूर से मेंढक, पीले मेंढक के घर, उसके मां-बाप की मौत पर अफसोस करने आए थे। पीले को आज भी सब कुछ याद आ रहा था। अफसोस करने वाले मेंढक अपनी-अपनी समझ के अनुसार आस-पास आई तबदीलियों के बारे में बातें कर रहे थे। एक बूढ़ा मेंढक अपना जमाना याद करते हुए बता रहा था, ‘यह जिस जगह से सड़क निकली है यहां पर कुआं होता था। ज़मीन बेकार पड़ी थी। कुएं की मुंडेर पर चढ़ कर गांव दिखता था। हम टिंडों में ही छिपे रहते। शाम सवेरे कुआं चलता, हम कुएं के नीचे पानी से मुंह धो लेते, फिर टिंडों पर झूलते, ऊपर चढ़ आते, छलांग लगाकर धरती पर चल पड़ते। ‘फिर?’ एक छोटा मेंढक पूछ लेता। ‘एक दिन एक बड़ा-सा ट्रैक्टर जमीन खोद रहा था। दूर तक मिट्टी घसीटता। ज़मीन में से समतल रास्ता दिखने लगा। उस रास्ते पर कंकर-पत्थर डाले गए। कुछ दिनों में ही पत्थरों पर लुक और बजरी की मोटी परत डाल कर, ऊपर रोलर घूमता रहा।’ ‘फिर हमारी खोटी तकदीर के कारण, पीले के मां-बाप की जान लेने वाली कलमूंही यह सड़क हम मेंढकों के सरों के ऊपर आकर बैठ गई।’एक बार तो चारों तरफ चुप्पी छा गई। पीले मेंढक के मां-बाप की मौत सभी को याद आ गई।बुजुर्ग मेंढक बहुत तजुर्बेकार था। आसपास की काफी समझ रखता था। मेंढक उस बूढ़े मेंढक के पास इकट्ठे होकर पूछने लगे, ‘दादा! हम नासमझों को यह भी नहीं पता कि हमारे दुश्मन कौन हैं?’‘सांप, कानखजूरा, बंदर, ईल, बाज, बगला शुरू से ही हमारे दुश्मन रहे हैं। मेंढक ने झट से दुश्मन गिना दिये। ‘हमें मनुष्यों से किस समय सावधान रहने की ज़रूरत है?’ उनमें से एक मेंढकी ने पूछा। ‘जिस समय नुकीला पत्थर, दुरमट, हथौड़ा, आदमी के हाथ में हो उससे दूर हट जाओ।’ बूढ़े मेंढक ने अपनी समझदारी सांझी की। ‘दादा! आज कैसा समय आ गया है कि मेंढकों की कितनी ही प्रजातियां, हमारी आंखों से ओझल हो गई हैं। मेंढक रोज मर रहे हैं। तुम हमें क्या अक्ल देना चाहोगे?’ एक मेंढक ने बूढ़े मेंढक से कहा। ‘मेरी अगली पीढ़ी के मेंढक पुत्र, यह सब कुछ मैं भी देखता हूं। मुझे रात को नींद नहीं आती। सोचता रहता हूं। पीले मेंढक का बाप मैंडा मेरा पक्का मित्र था। उसके मरने से मेरा हौसला बीच में टूट गया। इन्सान अब पैसे की दौड़ में अन्धा हो चुका है। पानी में ज़हर घुल गया है। कीटनाशकों ने कीट पतंगे खत्म कर दिये। अब मेंढक क्या खायेंगे? सभी मेंढक ध्यान से बूढ़े मेंढक की बातें सुन रहे थे।’  (क्रमश:)

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