प्रधानमंत्री के सम्बोधन का संकेत


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नया वर्ष चढ़ने से पहले अपने रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ में देशवासियों के साथ कुछ प्रेरणादायक बातें साझी की हैं। नि:संदेह तीन तलाक संबंधी कानून पास करना मोदी सरकार की बड़ी सफलता है। भारत के हर समाज में महिला को बराबर का दर्जा मिलना उत्तम भावना मानी जानी चाहिए। ऐसा हमारे संविधान में स्पष्ट रूप में अंकित है। यहीं बस नहीं, प्रधानमंत्री मोदी ने मुस्लिम महिलाओं के बिना महिरम (गार्डियन) के हज पर जाने के लिए भी इजाज़त देने की बात की है। चाहे नरेन्द्र मोदी का प्रभाव एक बड़े सम्प्रदाय के प्रतिनिधि होने का ही अधिक बना हुआ है परन्तु एक-दूसरे बड़े सम्प्रदाय में एक बड़ी क्रान्तिकारी बदलाव लाने की उनकी कोशिशों की प्रशंसा हुई है।  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का रेडियो पर मासिक प्रसारित होने वाला ‘मन की बात’ कार्यक्रम भी अनूठा और भावपूर्ण कहा जा सकता है। देश के कार्यकारी प्रमुख द्वारा अपने देश के करोड़ों लोगों के साथ अपने मन की बात साझी करना और लोगों के दरपेश मामलों के बारे में उनके सामने अपना दृष्टिकोण रखने को अच्छी बात ही कहा जा सकता है। प्रधानमंत्री द्वारा इस कार्यक्रम में साफ-सफाई, खुले में शौच करने के मामले के साथ-साथ आतंकवाद के विरुद्ध कार्यवाही, लालबत्ती संस्कृति को दिमाग से निकालने, प्रदूषण को खत्म करने, सम्प्रदायिकता को तिलांजलि देने, चीनी वस्तुओं को छोड़कर स्वदेशी उत्पादन को उत्साहित करने आदि संबंधी मामलों के बारे में चर्चा की जाती है। वर्ष के अंत में उनका देशवासियों को यह 39वां सम्बोधन था। इसके अलावा नरेन्द्र मोदी द्वारा आतंकवाद, साम्प्रदायिकता, जातिवाद, गरीबी और भ्रष्टाचार संबंधी भी लगातार अपने विचार साझे किये जाते रहे हैं। नये भारत का निर्माण कैसे किया जाना है और इस देश में देशवासियों की भागीदारी कैसे की जानी है, संबंधी भी उन्होंने कई बार अपनी बात कही है। उन्होंने स्पष्ट रूप में कहा है कि अधिकतर योजनाएं जिनका संबंध जनता के साथ है, को मुकम्मल करने में आम लोगों को शामिल करना चाहिए। उनके ऐसे सम्बोधनों का कितना असर हुआ है, इसका सही रूप में तो अभी अनुमान नहीं लगाया जा सकता परन्तु इससे प्रत्येक स्तर पर एक चर्चा अवश्य छिड़ती रही है। गत वर्षों के दौरान प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद पर होते हुए स्वयं को और अपनी सोच को धीरे-धीरे बदलने का प्रयास किया है। अपने 35वें ‘मन की बात’ कार्यक्रम में उन्होंने स्पष्ट रूप में यह भी कहा है कि यह देश महात्मा बुद्ध और महात्मा गांधी का है, इसमें आस्था के नाम पर हिंसा बर्दाश्त नहीं की जा सकती। उनकी भावना के विपरीत चाहे गत साढ़े तीन वर्ष में कुछ साम्प्रदायिक संगठनों ने समाज में बड़ा खलल डालने का प्रयास किया है, उन्होंने कई बार भीड़ एकत्रित करके हिंसा भी की है। इसलिए उनको भाजपा से संबंधित संगठनों द्वारा उत्साहित भी किया जाता रहा है। इस संबंधी केन्द्र सरकार पर भी दोष लगते रहे हैं कि वह ऐसा साम्प्रदायिक माहौल पैदा करने में कुछ सीमा तक सहायक हो रही है, क्योंकि प्रधानमंत्री द्वारा इस संबंधी कोई कड़ा संदेश नहीं जाता था। परन्तु शायद अब उनको साम्प्रदायिकता के बढ़ रहे खतरे का एहसास 
होने लगा है।  गत समय के दौरान इसके बारे में श्री नरेन्द्र मोदी ने एक मोड़ लिया प्रतीत होता है कि उनके लिए संविधान का पालन करना ज्यादा आवश्यक है। इसी के साथ ही वह समाज के सभी वर्गों को न्याय देने में सफल हो सकते हैं। यदि सही अर्थों में प्रधानमंत्री की सोच में बदलाव आता है, तो हम इसको देश के लिए शुभ समझते हैं। यह बदलाव मानवाधिकारों के लिए खुशनुमा माहौल बनाने में सहायक हो सकता है। नि:संदेह इस देश को एक साझी और भ्रातृत्व भाव वाली भावना से ही उन्नति के रास्ते पर आगे चलाया जा सकता है। प्रधानमंत्री के सम्बोधन का यह एक अच्छा संकेत कहा जा सकता है।

बरजिन्दर सिंह हमदर्द