विजय बरसे झोंपड़पट्टी फुटबॉल के जन्म-दाता


 इन प्रतियोगिताओं से दो टीमों- एक पुरुष व एक महिला- का चयन किया जाता है, जो होमलेस वर्ल्ड कप में भारत का प्रतिनिधित्व करती हैं। यह अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता भी साधनहीनों के लिए 2001 से ही आयोजित की जा रही है। 2006 में बरसे कॉलेज से रिटायर हुए और उन्हें अच्छा खासा रिटायरमेंट फंड मिला। वह कहते हैं, ‘मैं सोचता था कि मैं कुछ ही घंटों के लिए काम करता हूं और मुझे बहुत सारी छुट्टियां मिलती हैं, फिर भी मुझे पूरा पेमेंट मिल रहा है। मुझे लगा कि मुझे आवश्यकता से अधिक मिल रहा है और इसे मुझे वापस समाज को देना चाहिए।’इस पैसे से उन्होंने जमीन खरीदी, अब जहां उनका संगठन स्लम सॉकर काम करता है। दो वर्ष बाद उनकी स्पोर्ट्स टीचर पत्नी रचना भी रिटायर हो गईं और उन्होंने भी अपना फंड केंद्र के विकास के लिए दे दिया। इस तरह एक फुटबॉल ग्राउंड बना, छोटी सी एक मंजिला इमारत बनी जो सप्ताहांत पर समुदाय के लिए चर्च बन जाती है और सप्ताह के बाकी दिनों में एक्टिविटी सेंटर और साथ ही स्लम सॉकर का मुख्यालय व बरसे का घर भी यही बिल्डिंग है। हालांकि बरसे को अपनी पत्नी का तो बिना शर्त समर्थन मिला, लेकिन बेटे डा. अभिजित, जो अब स्लम सॉकर के सीईओ हैं, को साथ लाना आसान नहीं था। अभिजित का अपने पिता से विवाद हुआ और उन्होंने 2007 में अमरीका में रिसर्च फेलो का जॉब ले लिया। अभिजित कहते हैं, ‘मैं तार्किक व्यक्ति हूं। मैं अपने इर्दगिर्द की हर चीज पर सवाल करता हूं, अपने आप से भी। उस समय मुझे अपने पिता के आदर्श समझ में नहीं आते थे।’ 
2007 में स्लम सॉकर की राष्ट्रीय प्रतियोगिता को बीबीसी ने कवर किया। होमलेस वर्ल्ड कप के तत्कालीन निदेशक एंडी हुक्स ने बरसे को दक्षिण अफ्रीका आमंत्रित किया, जहां उनकी मुलाकात नेल्सन मंडेला से हुई। बरसे बताते हैं, ‘उस दिन मुझे अपने कार्य के लिए सबसे बड़ा सम्मान मिला जब मंडेला ने मेरे कांधे पर हाथ रखकर कहा- ‘मेरे बेटे तुम बहुत अच्छा काम कर रहे हो।’ 2008 में बरसे पर एक लेख न्यूयॉर्क की एक पत्रिका में प्रकाशित हुआ, जिसे उनके बेटे ने देखा। अभिजित ने वापस आना तय किया, उस व्यक्ति के पास जिसका दुनिया जश्न मना रही थी। आज स्लम सॉकर अनेक कार्यक्त्रम चलाता है लिंग जागृति से लेकर रजोधर्म हाइजीन तक। अधिकतर विभिन्न राज्यों के सरकारी स्कूलों में ही यह कार्यक्त्रम चलते हैं। इसके मुख्य कार्यालय नागपुर, चेन्नई व कोलकाता में हैं।बरसे की तरह उनके छात्रों ने भी पलट कर नहीं देखा है। कृषि मजदूर के बेटे होमकांत सुंदरसे यवतमाल जिले के अपने गांव नेर से भागे और स्लम सॉकर प्रतियोगिता का हिस्सा बन गये। उन्होंने 2008 में होमलेस वर्ल्ड कप में भारत का प्रतिनिधित्व किया और अब वह कोच हैं। उनकी साथी कोच श्रुतिका अमले ऐसी जगह से आती हैं जहां लड़कियों का नेकर पहनना बुरा समझा जाता है। चालक की इस बेटी ने 2015 में एमेस्टरडम में होमलेस प्रतियोगिता में भारत का प्रतिनिधित्व किया और तब से वह प्रतियोगिताओं व वर्कशॉप के लिए फ्रांस, जर्मनी आदि जा चुकी हैं। वह कहती हैं, ‘मैं कभी हवाई जहाज में नहीं बैठी थी, पासपोर्ट भी नहीं था। आज मैं अपनी अकादमी देखने का सपना देखती हूं। यह सब स्लम सॉकर के कारण ही हो सका, वर्ना मैं कहीं गुमनामी के अंधेरे में होती।’