रबी के मौसम में फसली विभिन्नता लाने की ज़रूरत


गत दो दशकों से भी अधिक समय से धान की काश्त निचला रकबा कम करके फसली विभिन्नता लाने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं, परन्तु सफलता प्राप्त नहीं हुई। यह प्रथम वर्ष है कि धान की काश्त निचला तीन लाख हैक्टेयर रकबा कम हुआ है और फसली विभिन्नता में प्राप्ति हुई है। भूमि निचले जल के स्तर का हर वर्ष नीचे जाना पानी बचाने के लिए रबी के मौसम में धान की काश्त निचला रकबा कम करने की मांग करता है। धान की पानी की ज़रूरत ज्यादा होने के कारण फसली विभिन्नता की बहुत ज़रूरत महसूस की जा रही है। इस वर्ष बासमती की काश्त 6.31 लाख हैक्टेयर रकबे पर हुई और इस तरह गत वर्ष के 5.14 लाख हैक्टेयर रकबे में 1.17 लाख हैक्टेयर रकबे की वृद्धि हुई। इसी तरह कपास-नरमा 4 लाख एक हज़ार हैक्टेयर रकबे पर बीजा गया। इसकी काश्त गत वर्ष 2.68 लाख हैक्टेयर रकबे पर हुई थी। इस तरह कपास-नरमे की काश्त निचला इस वर्ष 1.33 लाख हैक्टेयर रकबा बढ़ा। मक्की की काश्त गत वर्ष 1.08 लाख हैक्टेयर रकबे पर हुई थी, जो रकबा इस वर्ष बढ़कर एक लाख 60 हज़ार हैक्टेयर हो गया। इस तरह 52,000 हैक्टेयर रकबा मक्की की काश्त निचला बढ़ा। दालों की काश्त निचला 8,000 हैक्टेयर रकबे की वृद्धि हुई। इस वर्ष मंडियों में बासमती धान की आमद गत सप्ताह तक 16.06 लाख टन हुई, जो गत वर्ष की अपेक्षा 3.97 लाख टन ज्यादा है। गैर-बासमती धान मंडियों में बिकने के लिए इस वर्ष गत सप्ताह तक 162.09 लाख टन आया। इसकी आमद गत वर्ष 168.34 लाख टन थी, क्योंकि गत वर्ष गैर-बासमती धान की काश्त निचला रकबा अधिक था। धान की आमद अधिक हुई। कृषि और किसान कल्याण विभाग के डायरैक्टर सुतंत्र कुमार ऐरी के अनुसार पानी की उपलब्धता को देखते हुए 12 लाख हैक्टेयर रकबा धान की काश्त से निकाल कर मक्की, बासमती, कपास, नरमा और सब्ज़ियां आदि की काश्त अधीन लाना चाहिए। पंजाब में 42 लाख हैक्टेयर रकबा काश्त अधीन है, जिसमें से मक्की की काश्त 3.82 प्रतिशत रकबे पर की जाती है। इस शताब्दी के शुरू से ही मक्की की काश्त निचला रकबा 1.09 लाख हैक्टेयर से लेकर 1.60 लाख हैक्टेयर रकबे तक घूमता रहा है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार 4 लाख हैक्टेयर रकबा और मक्की की काश्त अधीन ले जाने की ज़रूरत और गुंजाइश है। सरकार द्वारा वर्ष 2017-18 तक 5.50 लाख हैक्टेयर रकबा मक्की की काश्त अधीन लाने का लक्ष्य रखने के बावजूद प्राप्ति कुछ भी नहीं हुई, बल्कि मक्की की काश्त निचला रकबा कम होता गया। पिछली शताब्दी के छठे दशक में हरित क्रान्ति के आगाज़ के समय मक्की की काश्त निचला 5 लाख हैक्टेयर रकबा था। मक्की की अधिक झाड़ देने वाली सफल किस्में उपलब्ध हैं। यह किस्में झाड़ भी अधिक देती हैं, फिर मक्की की काश्त निचला रकबा बढ़ाने की ज़रूरत होने के बावजूद भी रकबा नहीं बढ़ रहा क्योंकि चाहे मक्की का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एम.एस.पी.) निश्चित किया जाता है, परन्तु धान और गेहूं की तरह सरकारी खरीद नहीं। यदि फसली विभिन्नता लानी है तो और पंजाब को दरपेश पानी की समस्या हल करनी है तो मक्की की सरकारी खरीद करनी पड़ेगी। सरकार को इस संबंध में गम्भीरता से विचार करना चाहिए। मक्की खाने, पोल्ट्री फीड, पशुओं का फीड, कागज़ उद्योग तथा फार्मास्यूटिकल दवाइयों में इस्तेमाल की जाती है और कुछ दक्षिण एशिया और इंडोनेशिया देशों को भी निर्यात की जाती है। दूसरी फसल जिसके द्वारा फसली विभिन्नता लाना सम्भव है, वह बासमती धान की है। भारत विश्व की कुल बासमती पैदावार का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा पैदा करता है। गत  वर्ष भारत से 44 लाख टन बासमती निर्यात की गई। लगभग 20 लाख टन बासमती भारत के उपभोक्ता खरीद लेते हैं। अब दिन-प्रतिदिन इस बासमती की खपत बढ़ती जा रही है। पंजाब की बासमती ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, इराक, यमन, रिपब्लिक और कुवैत को भी निर्यात की जा रही है। इस तरह बासमती की मंडी है सिर्फ योजनाबंदी की ज़रूरत है कि किसान को लाभदायक मूल्य मिले। इस वर्ष बासमती की काश्त निचला रकबा बढ़कर 6.31 लाख हैक्टेयर हो गया। वर्ष 2014-15 में बासमती की काश्त निचला रकबा 8.62 लाख हैक्टेयर तक पहुंच गया था, जिसके बाद बासमती की निर्यात और घरेलू कीमतों में काफी गिरावट आई और इसके स्टॉक बढ़ने से कीमतों में और उछाल आया। बासमती का कोई न्यूनतम समर्थन मूल्य या सरकारी खरीद न होने के कारण इसकी कीमत में उतार-चढ़ाव आते रहे। वर्ष 2008-09 से वर्ष 2011-12 तक बासमती के स्टॉक निर्यात से अधिक होने के कारण पंजाब में इसकी कीमत 2600 रुपए प्रति क्विंटल से घटकर 1830-50 रुपए प्रति क्विंटल तक रह गई। फिर कीमतों में आई गिरावट के कारण किसानों ने बासमती की काश्त निचला रकबा कम कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप वर्ष 2012-13 और वर्ष 2013-14 के दौरान इसका उत्पादन कम हो गया। ऐसा होने से बासमती के पिछले वर्षों के जमा हुए स्टॉक को खत्म करने में सहायता मिली और आने वाले वर्षों में इसकी कीमत 3500 रुपए प्रति क्विंटल तक पहुंच गई। बासमती एक ऐसी फसल है, जिसकी धान की अपेक्षा पानी की ज़रूरत कम है। पूसा बासमती 1509 जैसी कम समय में पकने वाली किस्में विकसित होने के साथ बासमती की फसल कई स्थानों पर बारिश से ही पक जाती है। इसी तरह कपास नरमे की काश्त निचला रकबा बढ़ने के आसार हैं। यदि सरकार किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एम.एस.पी.) सुनिश्चित बना दे, नरमे का न्यूनतम समर्थन मूल्य तो निर्धारित किया जाता है, परन्तु कॉटन कार्पोरेशन ऑफ इंडिया द्वारा पूरी खरीद नहीं की जाती, जिस कारण कई वर्षों के दौरान किसानों को निराशा का सामना करना पड़ा। 

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