मिलावटखोरी  दृढ़ निश्चय की ज़रूरत


त्यौहारों का समय आ गया है। मिलावटखोर सक्रिय हो गये हैं। बयानों और सूचनाओं के अनुसार सरकार ने भी इसके प्रति तैयारी शुरू कर ली है। कुछ आंकड़े भी सामने आ रहे हैं, परन्तु सोचने वाली बात यह है कि प्रशासन के यह प्रयास मिलावटखोरी की इस बाढ़ को रोकने में कितने सफल होंगे। सरकार ने इस वर्ष इस संबंधी जितने भी प्रयास किये हैं, अलग-अलग वस्तुओं के जो नमूने लिये हैं, उनमें से 25 प्रतिशत नमूने गुणवत्ता के पक्ष से फेल हो गये हैं। इनमें दूध और दूध से बनीं वस्तुएं, तेल, बेकरी की वस्तुएं तथा मसाले आदि शामिल हैं।
प्रशासन ने यह भी दावा किया था कि वर्ष के प्रथम तीन महीनों में पकड़े गये 500 केसों में इन मिलावटखोरों को 75 लाख के लगभग जुर्माना भी किया गया था। सरकार का दावा है कि यह मुहिम अब तक जारी है और लगातार मिलावटखोरों पर केस भी दर्ज किये जा रहे हैं। दी गई एक सूचना के अनुसार इस वर्ष अब तक 837 मामले कानून की सीमा में लाये गये और इन पर डेढ़ करोड़ के लगभग जुर्माना भी लगाया गया। फूड सेफ्टी टीमों द्वारा जून से सितम्बर 2019 तक चार महीनों के अंतराल में नमकीन, मिठाइयां, खोया, घी, दूध, पनीर आदि के 3548 नमूने लिये गये। इनमें से 20 प्रतिशत नमूने अयोग्य पाये गये। सर्वेक्षण टीमों द्वारा भारी मात्रा में फल, सब्ज़ियां तथा खाद्य पदार्थ ज़ब्त किये गये हैं। इसके बावजूद अलग-अलग शहरों से मिलावटखोरी के समाचार लगातार मिल रहे हैं। पिछले महीने बठिंडा, मानसा और लुधियाना में भी मिलावटी चीज़ों के बड़े भंडार पकड़े गये। आजकल यह चलन अधिक हो गया है, क्योंकि दशहरे के बाद दीवाली का त्यौहार निकट है। इन दिनों में मिठाइयों की मांग बढ़ जाती है। इन दिनों उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश से भी खोया मंगवाया जाता है, जो कम कीमत का होता है, जिसमें तरह-तरह की मिलावट की गई होती है। गत वर्ष भी ऐसा ही कुछ देखने को मिला था और ऐसे ही आंकड़े सामने आये थे। चाहे सरकार बड़े दावे कर रही है, परन्तु हमारी सूचना के अनुसार कई ज़िलों में कार्रवाई के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति ही की जा रही है। इस बात पर इसलिए विश्वास करना बनता है, क्योंकि यदि व्यवहारिक रूप में बड़े स्तर पर मिलावटखोरों को नकेल डाली जाती है, तो अब तक यह सिलसिला बंद हो गया होता। गत वर्षों से इस क्षेत्र में कड़े कानून बनाये जाने की मांग उठती रही है। ऐसे कानून बनाये भी गये हैं, परन्तु देखने वाली बात यह है कि इन कड़े कानूनों के अधीन कितने अपराधियों को कड़ी सज़ाएं दी गई हैं। यदि फैली इस बीमारी को रोकने के लिए कड़े कदम उठाये गये होते, तो प्रशासन को मिलावटखोरी के ऐसे आंकड़े पेश नहीं करने पड़ते। ऐसा करना मानव स्वास्थ्य से खिलवाड़ है। इसके साथ-साथ इससे यह भी प्रकट होता है कि आज हमारा समाज किस सीमा तक गिरावट की ओर जा चुका है और यह भी कि हमारा समूचा ढांचा किस तरह चरमरा चुका है और इसमें अनुशासन की कितनी कमी महसूस होने लगी है। दुनिया के बहुत सारे विकसित देशों ने इस बीमारी को पूरी तरह खत्म कर दिया है। वहां किसी तरह की कोई भी चीज़ खरीदने के समय यह सन्देह आपके मनों में पैदा ही नहीं होता कि इसमें कोई मिलावट भी की गई होगी। यह इसलिए क्योंकि उन देशों में मिलावटखोरी को बहुत बड़ा अपराध समझा जाता है और बड़ी सज़ाएं दी जाती हैं। समूचे रूप में अपने लोगों के स्वास्थ्य के लिए और सामाजिक ढांचे को मज़बूत बनाये रखने के लिए मिलावटखोरी की बीमारी को जड़ से उखाड़ना होगा। इसके लिए मज़बूत और दृढ़ निश्चय की ज़रूरत होगी। ऐसा करना सरकार की बड़ी ज़िम्मेदारी बन जाता है।

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द