धान की उत्पादकता बढ़ने और गेहूं की कम होने की सम्भावना


कृषि और किसान कल्याण विभाग के डायरैक्टर सुतंत्र कुमार ऐरी के अनुसार इस वर्ष धान की उत्पादकता गत वर्ष की अपेक्षा अधिक है। प्रति एकड़ 1.25 क्विंटल झाड़ की वृद्धि का अनुमान कृषि विभाग द्वारा 22 ज़िलों में फसल काटने के परीक्षणों के आधार पर लगाया गया है। यह अनुभव कृषि और किसान कल्याण विभाग हर ज़िले के हर ब्लाक में मुख्य फसलों के संबंध में करता है। धान की उत्पादकता बढ़ने का यह अनुमान 1982 परीक्षणों में से 1271 परीक्षणों के परिणाम आने के आधार पर है, जबकि राज्य की उत्पादकता की औसत में वृद्धि हुई है। कुछ ज़िलों में उत्पादकता कम होने की भी रिर्पोटें  हैं। सितम्बर में जब फसल बिल्कुल पकने के कगार पर थी, लगातार बारिश और उसके बाद तापमान के बढ़ने से फसल प्रभावित हुई। लुधियाना के एक किसान की धान की उत्पादकता 25 क्विंटल प्रति एकड़ आई है, जबकि गत वर्ष उसने 29 क्विंटल प्रति एकड़ झाड़ प्राप्त किया था। फतेहगढ़ साहिब के एक किसान ने 10 एकड़ में धान लगाया था और उसकी औसत उत्पादकता 20 क्विंटल ही आई। लुधियाना के ही एक किसान ने पी.आर. 121 से 25 क्विंटल की औसत और पूसा 44 से 29 क्विंटल की औसत प्रति एकड़ की उत्पादकता प्राप्त की। जबकि गत वर्ष उसने क्रमवार 30 क्विंटल और 35 क्विंटल झाड़ लिया था। जाहिर है कि राज्य की औसत का अनुमान अधिक होने के बावजूद कई स्थानों पर इस वर्ष झाड़ गत वर्ष के मुकाबले कम रहा। धान की काश्त 29.5 लाख हैक्टेयर पर की गई है, जिसमें से 23 लाख हैक्टेयर पर धान और 6.5 लाख हैक्टेयर पर बासमती किस्में लगाई गई हैं। शुक्रवार तक 168.53 लाख टन धान मंडीकरण के लिए राज्य की मंडियों में आया, जिसमें 13-15 लाख टन बासमती किस्में शामिल हैं। गत वर्ष 172.65 लाख टन धान और 21.03 लाख टन बासमती किस्मों की फसल मंडियों में बिकने के लिए आई थी। अभी बासमती की काफी फसल और कुछ धान की भी मंडियों में बिकने के लिए आनी है। डायरैक्टर ऐरी द्वारा लगाए गए अनुमान के अनुसार इस वर्ष आमद गत वर्ष की अपेक्षा अधिक होगी। बठिंडा, मुक्तसर और फरीदकोट ज़िलों में जहां उत्पादकता गत वर्ष की अपेक्षा बढ़ी है। एक रिपोर्ट के अनुसार पी.आर. 121 किस्म का झाड़ कम हुआ है। पी.आर. 113 किस्म जिसके दाने मोटे और भारी हैं, लगभग आई.आर. 8 किस्म जैसे हैं। इसको मंडीकरण ने किसानों को समस्या का सामना करना पड़ा है। इस वर्ष धान की कटाई में देरी होने और पराली को आग लगाने की परम्परा को सख्ती से बंद करवाने के बाद गेहूं की बिजाई के लिए खेतों की तैयारी देरी से हुई है। अभी बिजाई गत वर्षों के मुकाबले बहुत कम रकबे पर की गई है, जिसके पश्चात् गेहूं की उत्पादकता कम होने के अनुमान हैं। गेहूं की बिजाई का सामान्य समय अक्तूबर के अन्त से मध्य नवम्बर तक है। यदि बिजाई देरी से की तो समय में देरी के अनुसार झाड़ लगातार कम होता जाता है। बिजाई का समय फसल के झाड़ पर सीधा असर डालता है। उपयुक्त समय से बिजाई में एक सप्ताह की देरी होने से झाड़ लगभग 150 किलो प्रति एकड़ प्रति सप्ताह कम होता जाता है। नवम्बर का पहला पखवाड़ा गेहूं की बिजाई के लिए उपयुक्त है। चाहे अब 30 नवम्बर तक भी गेहूं की बिजाई की जाएगी परन्तु समय पर बिजाई करने वाली उन्नत पी.बी.डब्ल्यू. 343, एच.डी. 2967, पी.बी.डब्ल्यू. 1 जिंक और डब्ल्यू.एच. 1105 तथा नई विकसित एच.डी. 3226 आदि किस्में जो अब देरी से बीजी जायेंगी, उनकी उत्पादकता में कमी आने की सम्भावना है। यदि देरी वाली बिजाई अगेती पहले बिजाई वाली या साधारण समय में बीजने वाली किस्में बीजी जाएं तो झाड़ पर और भी बुरा असर पड़ेगा। देरी की बिजाई के लिए डी.बी.डब्ल्यू.173, पी.बी.डब्ल्यू. 752, पी.बी.डब्ल्यू. 658 किस्में अनुकूल हैं, जो 130, 135 दिनों में पक जाती हैं। अच्छा झाड़ लेने के लिए एक एकड़ में 40 किलो बीज डालना चाहिए। बिजाई से पहले बीज को अच्छी तरह साफ और ग्रेड कर लेना चाहिए। छोटे बीज और नदीनों के बीज पूरी तरह निकाल देने चाहिएं। दीमक वाली भूमि में बीज को रैक्सल या वीटावैक्स 75 डब्ल्यू.पी. के बाद क्लोरोपायरोफास से साफ कर लेना चाहिए। गेहूं की देरी से बिजाई में उगने की शक्ति बढ़ाने के लिए गेहूं के बीज को 4 से 6 घंटे में भिगोकर 24 घंटे सुखाने के बाद ड्रिल से बिजाई करनी चाहिए। बिजाई का दोतरफा ढंग अपनाने से प्रति एकड़ दो क्विंटल तक झाड़ बढ़ जाने का अनुमान है। खाद और बीज की अधिक मात्रा एक तरफ बीजने के लिए और शेष आधी मात्रा दूसरी तरफ बिजाई करने के लिए इस्तेमाल करनी चाहिए। बीज चार सैंटीमीटर गहरा और क्यारियों के बीच 20-22 सैंटीमीटर का अन्तर होना चाहिए। जब गेहूं आलू की फसल के बाद बीजी जाए और आलुओं को सुपर फास्फेट या 10 टन प्रति एकड़ रूड़ी की खाद डाली हो तो गेहूं में फास्फोरस डालने की कोई ज़रूरत नहीं। नाइट्रोजन के लिए नीम-कोटिड यूरिया का इस्तेमाल करना लाभदायक है। आधी नाइट्रोजन, सारी फासफोरस और पोटाश बिजाई के समय डाल देनी चाहिए। मटर और आलुओं की फसल के बाद लगाई गई गेहूं को नदीनों की समस्या कम आती है। चाहे फिर भी गुल्ली-डंडे, जौन्धर जंगली जवी या चौड़े पत्तों के नदीनों की रोकथाम के लिए नदीननाशक इस्तेमाल करने की ज़रूरत है। गेहूं की फसल को पहले पानी हल्का देना चाहिए। पहला पानी चार सप्ताह बाद, दूसरा पानी बूझा मारने के समय और तीसरा पानी दाने में बूर पड़ने के समय लगाना चाहिए। 

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