हैवानों को त्वरित सज़ा


हैदराबाद के हैवानों को उनके पापों की सजा मिल गई। गुस्से में उबलता हुआ देश आज संतोष की सांस ले रहा है। पुलिस की जय-जयकार हो रही है। लोगों के मन की खुशी बता रही है कि उनको देश की न्यायिक व्यवस्था पर जरा-सा भी भरोसा नहीं है और हो भी क्यों? जहां इंसाफ  की आस में लोगों की मौत हो जाती है, पीड़िता को ही मौत के घाट उतारने की कोशिशें की जाती है, सुनवाई के लिए जा रही दुष्कर्म पीड़िता को जिंदा जला दिया जाता है, उसके परिजनों की हत्या कर दी जाती है और सीबीआई की जांच उनकी मौत का इंतजार कर रही होती है, वहां इस तरह के एनकाउंटर पर लोगों को खुश ही होना चाहिए। लेकिन पुलिस की इस कार्रवाई पर कुछ सवालिया निशान भी लगने लगे हैं। राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा ने कहा कि किसी भी मामले में एनकाउंटर करना ठीक नहीं है। उन्होंने कहा कि पुलिस दावा कर रही है कि आरोपी पुलिस की बंदूक छीनकर भागने की फिराक में थे। ऐसे में शायद उनका फैसला सही रहा होगा। हमारी मांग है कि इस तरह के मामले में आरोपियों को फांसी की सजा दी जाए लेकिन कानूनी प्रक्रिया के तहत उन्हें सजा मिले। भले ही कोई ऐसे एन्काउंटर पर ऊंगली उठाए, परन्तु अब लगता है ऐसे हैवानों को त्वरित सजा देने का यही तरीका सही है। वरना तो केस चलते रहते हैं, और पीड़िता के परिजन भी कितनी ही यातनाओं से गुजरते हैं। निश्चित ही ऐसे 5-7 एन्काउंटर लगातार हो जाएं तो ऐसे भयावह अपराधों में कमी आएगी।