प्रैस की स्वतंत्रता को बनाए रखने की ज़रूरत


पत्रकारिता की आज़ादी समाज और देश की आज़ादी है, अगर पत्रकारिता आज़ाद काम नहीं करेगी तो वह समाज में हो रही लापरवाहियों और घटनाओं को सही ढंग से पेश नहीं कर सकती। पत्रकारिता की आज़ादी के महत्त्व को देखते हुए ही संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1993 में 3 मई को विश्व प्रैस आज़ादी दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की थी। उसके बाद प्रत्येक वर्ष 3 मई को विश्व प्रैस आज़ादी दिवस मनाया जाता है और इस दिन सरकारों द्वारा और मीडिया उद्योग से जुड़े लोगों द्वारा पत्रकारिता संबंधी विचार-विमर्श किया जाता है और इसके आज़ाद रूप में काम करने के लिए ठोस नीतियां बनाई जाती हैं। कुछ वर्ष पूर्व तक पत्रकारिता एक मिशन था और समाज के प्रति मीडिया से जुड़े लोगों की विशेष ज़िम्मेवारी होती थी परन्तु अब अधिकतर विभागों पर व्यापारिक घराने काबिज़ हो रहे हैं। कई मीडिया विभागों ने व्यापरिक हितों को प्राथमिकता न देते हुए अपनी छवि बनाई रखी हुई है परन्तु कुछ ने इसको निरोल लामबद्ध व्यापार बना कर रखा हुआ है। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र देश भारत का प्रैस की आज़ादी के मामले में 180 देशों में 138वां रैंक है। संविधान में दर्ज मौलिक अधिकारों में विचार व्यक्त करने की आज़ादी का विशेष ज़िक्र किया गया है जिसमें प्रैस की आज़ादी भी शामिल है। विश्व में आज लगभग 50 देशों में प्रैस परिषद् या मीडिया परिषद है। 4 जुलाई, 1966 को भारतीय प्रैस परिषद् की स्थापना की गई, जिसने 16 नवम्बर, 1966 से अपना काम शुरू किया। एमरजैंसी के दौरान जब प्रैस पर सैंसर लगा था तब पत्रकारिता एक बार फिर कुछ समय के लिए भ्रष्टाचार मिटाओ अभियान को लेकर मिशन बन गई थी। मीडिया समाज को प्रभावित करता है, परन्तु कभी-कभी मीडिया समाज से भी प्रभावित होने लगता है। भारतीय प्रैस परिषद् के निर्देशानुसार 17 अक्तूबर, 2011 को 6 सदस्यीय सब-कमेटी की घोषणा की गई जिसमें श्री के. अमरनाथ को कन्वीनर बनाया गया। इस सब-कमेटी ने इन 11 राज्यों के 1200 के लगभग पत्रकारों, सम्पादकों और पत्रकारों के संगठनों, सिविल अधिकारियों, उच्च पुलिस अधिकारियों, कुछ राज्यों के मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों के साथ मिलकर जानकारी प्राप्त की। इस कमेटी ने पत्रकारों पर हो रहे हमलों और पत्रकारों की भूमिका संबंधी अलग-अलग राज्यों में विचार-विमर्श किया। प्रैस की आज़ादी में सरकारों द्वारा भी रुकावटें डाली जा रही हैं। कई मीडिया ग्रुप प्रत्यक्ष तौर पर ही अलग-अलग राजनीतिक पार्टियों के नेताओं के नियंत्रण में चल रहे हैं अधिकतर मीडिया कर्मी लोगों से दूर हो चुके हैं और लोगों की समस्याओं को समझने और लोगों तक पहुंचाने की बजाय अपने निजी हितों को प्राथमिकता देते हैं। भारतीय प्रैस परिषद् की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2011 से 2014 तक कुल 3350 मामले रजिस्टर्ड किए गए हैं जिनमें 544 शिकायतें प्रैस की आज़ादी में दखलंदाज़ी के लिए प्राप्त हुई हैं और 2806 पत्रकारों के खिलाफ मिली हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 2017 का वर्ष पत्रकारिता के लिए काफी ़खतरनाक रहा है और इस वर्ष दौरान 11 पत्रकारों की हत्या हुई और 46 पत्रकारों पर हमले हुए और 27 पत्रकारों के खिलाफ पुलिस द्वारा केस दर्ज किए गए। सितम्बर 2017 में हुई गौरी लंकेश की हत्या ने सच लिखने वाले पत्रकारों पर मंडरा रहे खतरे को पूरी दुनिया के समक्ष लाया है। आज मीडिया की आज़ादी खतरे में है क्योंकि अब अधिकतर मीडिया पर राजनीतिक नियंत्रण है। विगत समय के दौरान देश के अलग-अलग भागों में हुए चुनावों के दौरान सामने आई पेड न्यूज़ के हज़ारों मामलों ने भी प्रैस की भूमिका पर बड़ा प्रश्न चिन्ह लगाया है जोकि प्रैस की आज़ादी के लिए खतरा है। आज ज़रूरत है लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ मीडिया को बचाने की ताकि हक और सच की आवाज़ बुलंद रह सके। अगर मीडिया सरकार और प्रभावशाली लोगों के प्रभाव अधीन काम करेगा तो समाज और देश के लिए खतरनाक साबित होगा।

-नज़दीक सरकारी प्राइमरी स्कूल दोभेटा, तह. नंगल, ज़िला रूपनगर, पंजाब-140124
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