गम्भीर कृषि संकट के हल के लिए :केन्द्रीय पहलकदमी की ज़रूरत


देश भर में कृषि का संकट बेहद गम्भीर होता जा रहा है। एक अनुमान के अनुसार हर रोज देश में 45 के लगभग किसान और खेत मजदूर आत्महत्या कर रहे हैं। गत 20 वर्षों में लगभग 3 लाख से अधिक किसान और खेत मजदूर आत्महत्याएं कर चुके हैं। पंजाब जहां की हरित क्रान्ति की सबसे पहले शुरुआत हुई थी और जो कई दशकों तक देश को अनाज सुरक्षा मुहैया करता आ रहा है, का अब अपना अस्तित्व खतरे में पड़ा नज़र आ रहा है। यहां भी हर रोज़ 3-4 किसान और खेत मजदूर आत्महत्याएं कर रहे हैं। पंजाब के इस गम्भीर कृषि संकट का अध्ययन करने के लिए प्रसिद्ध पत्रकार और कृषि संकट का लगातार अध्ययन करने वाले बुद्धिजीवी पी. साईनाथ ने दस दिनों तक राज्य के अलग-अलग ज़िलों का दौरा किया है। उन्होंने किसानों तथा  खेत मजदूरों के संगठनों के साथ इस संबंधी विचार-चर्चा की है। वह आत्महत्याएं कर गए किसानों और मजदूरों की विधवाओं को भी मिले हैं और उनकी समस्याओं को समझने का प्रयास किया है। कुछ स्थानों पर उन्होंने सैमीनारों को भी सम्बोधन किया है। उनका मानना है कि पंजाब सहित समूचे देश का कृषि संकट कार्पोरेट पक्षीय नीतियों की देन है। सरकारें अपना समाज कल्याण का उद्देश्य छोड़कर कार्पोरेट कम्पनियों को लाभ पहुंचाने पर लगी हुई हैं। उन्होंने कहा कि हर वर्ष कार्पोरेट कम्पनियों को टैक्सों में 5 लाख करोड़ की छूटें दी जाती हैं, जबकि कृषि को पुन: लाभदायक बनाने और किसानों को राहत देने के लिए केन्द्र सरकारों द्वारा कुछ भी नहीं किया जा रहा। उन्होंने कहा कि यह अजीब तर्क है कि उद्योगों तथा उद्योगपतियों को दी जा रही छूटों को तो उत्साहित करने के लिए दी जा रही रियायतें कहा जाता है, जबकि किसानों, मज़दूरों तथा अन्य गरीब वर्गों को दी जा रही थोड़ी बहुत रियायतों को सब्सिडियां कहा जाता है। उन्होंने कहा कि लोग एकजुट होकर अपने संघर्षों द्वारा ही सरकारों को अपनी नीतियां बदलने के लिए मजबूर कर सकते हैं। हम भी बहुत शिद्दत से महसूस कर रहे हैं कि समय की केन्द्रीय सरकारों और अलग-अलग राज्य की सरकारों ने लम्बे समय से चले आ रहे इस गम्भीर संकट की ओर उतना ध्यान नहीं दिया, जितना कि दिया जाना चाहिए था। जबकि यह सभी जानते हैं कि कृषि और किसानों का महत्व सेना से भी कहीं अधिक है। सेना देश की सीमाओं और भूमि क्षेत्र की सुरक्षा करती है, जबकि कृषि और किसान देश को अनाज सुरक्षा मुहैया करते हैं। कृषि का महत्व इससे भी समझा जा सकता है कि पेट में रोटी पड़ने के बिना सेना भी सीमाओं पर देश की सुरक्षा नहीं
कर सकती। गत लम्बे समय से अलग-अलग किसान संगठन और कृषि के अध्ययन से जुड़े अर्थशास्त्री और बुद्धिजीवी भी लगातार मांग करते आ रहे हैं कि देश के कृषि संकट संबंधी  संसद का विशेष सत्र बुलाकर उस पर विस्तारपूर्वक चर्चा होनी चाहिए और ऐसी विचार-चर्चा की रौशनी में फैसले लेकर केन्द्र सरकार को कृषि के बारे में ऐसी नीति बनानी चाहिए, जिससे किसानों को उनकी उत्पादन लागतों पर 50 प्रतिशत मुनाफा देकर लाभदायक मूल्य दिए जा सकें और इसके साथ ही कृषि में काम आने वाली चीज़ें, वस्तुएं भी किसानों को उचित दाम पर मुहैया की जानी चाहिएं और कृषि उत्पादनों के मंडीकरण के लिए भी एक विश्वसनीय व्यवस्था देश भर में कायम की जानी चाहिए। परन्तु समय की केन्द्र सरकारों ने इस तरफ से आंखें मूंद रखी हैं और बयानाज़ी से ही समय बिताया जा रहा है। तीखे हो रहे किसान संघर्षों को मुख्य रखते हुए अलग-अलग राज्य सरकारों द्वारा अपने सीमित संसाधनों से किसानों को ऋणों में थोड़ी-बहुत रियायतें दी जा रही हैं, परन्तु यह संकट इतना बड़ा है कि केन्द्र सरकार की पहलकदमी के बिना इसको हल करना असम्भव है।यदि कृषि जैसे अहम क्षेत्र के बारे में सरकारों का रवैया इसी तरह उदासीनता वाला बना रहा तो आगामी समय में न सिर्फ देश की अनाज सुरक्षा खतरे में पड़ जायेगी, अपितु किसान और खेत मजदूर भी मजबूर होकर बड़े संघर्ष छेड़ने के लिए सड़कों पर उतर आयेंगे। देश की विकास दर बढ़ने और भारत के दुनिया की शक्ति बनकर उभरने के दावे करने वाले शासकों को यह बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि खाली बयानबाज़ी और आंकड़ों से लोगों के पेट नहीं भरते और न ही आंकड़ों की बाज़ीगरी से वास्तविकताओं को अधिक देर तक छिपाया जा सकता है। जितनी शीघ्र हो सके श्री नरेन्द्र मोदी की केन्द्र सरकार को दीवार पर लिखा पढ़ लेना चाहिए, नहीं तो आगामी लोकसभा चुनावों में किसानी रोष की उसको बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है।