महाराष्ट्र में ढूंढा जा रहा है एक नींद में तीन सपनों का फार्मूला


यूंतो महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लग चुका है, लेकिन न तो सरकार बनाने का रास्ता खत्म हुआ है और न ही इसके लिए प्रयास खत्म हुए हैं। चूंकि राजनीति एकमात्र ऐसी शै है, जिसमें संभावनाएं कभी भी खत्म नहीं होतीं, न ही यहां बनने वाले या बन सकने वाले समीकरणों की कोई सीमा होती है, इसलिए अब एक ऐसे फार्मूले पर काम हो रहा है, जिसमें शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस तीनों के ही सपने पूरे हो जाएं। इसके लिए कई सुझाव पेश किये गए हैं। सियासी गलियारे में चर्चा है कि सोनिया गांधी ने अहमद पटेल को इस संबंध में खुली छूट दे दी है और पटेल ने करीब-करीब फार्मूला फाइनल कर दिया है जो कुछ इस प्रकार से है कि पहले ढाई साल शिवसेना अपना मुख्यमंत्री बना ले, फिर बाद के ढाई साल एनसीपी अपना मुख्यमंत्री बना ले। जबकि कांग्रेस का पूरे समय उप-मुख्यमंत्री के पद पर कब्जा रहे। सियासी गलियारे के सूत्रों के मुताबिक एनसीपी को इसमें कोई ऐतराज नहीं है। अब भी किसी को दुविधा और हिचक है तो वह शिवसेना ही है। दरअसल शिवसेना तय ही नहीं कर पा रही कि वस्तुत: उसे घोषित मांग के अतिरिक्त और क्या-क्या चाहिए? इसकी वजह शायद यह है कि शिवसेना को उम्मीद नहीं थी कि ऐसी स्थितियां बनेंगी और वह अपनी ही जिद के जाल में फंस जायेगी। उसे लग रहा था कि वह नखरा दिखायेगी तो भाजपा मान मनौअल करेगी। इसके बाद वह कुछ और अग्रिम धमकियां देकर मान जायेगी जिससे उसकी ताकत की खुशफहमी भी बनी रहेगी और कमजोरियों से निपटने के लिए सुरक्षित समय भी मिल जायेगा।लेकिन शायद भाजपा और शिवसेना दोनों को ही एक-दूसरे को लेकर यही गलतफहमी थी कि वह नहीं, अगला झुकेगा, लेकिन जब दोनों में से कोई नहीं झुका तो दोनों के हाथों से लगाम निकल गयी। इस वजह से भले इस समय शिवसेना और भाजपा अलग-अलग रास्ता ढूंढती दिख रही हों लेकिन सच यही है कि शिवसेना अब भी किसी चमत्कार की उम्मीद कर रही है कि भाजपा उसे मनाते हुए दिखे और उसे फिर से उसके पास लौटकर आने का रास्ता मिल जाय। इसकी दो वजहें हैं। शिवसेना भले भाजपा पर आरोप लगा रही हो या बिना आरोप लगाए यह सोचकर डर रही हो कि वह उसका नेचुरल स्पेस कब्जाए जा रही है, लेकिन एनसीपी और कांग्रेस के साथ उसे यह डर न हो ऐसा नहीं है। सच तो यह है कि यहां यह डर और घना है। भाजपा के साथ तो फिर भी यह भ्रम बनाये रखने का बहाना है कि दोनों पार्टियों की विचारधारा और लक्ष्य एक हैं, लेकिन जब शिवसेना और एनसीपी किसी मोड़ पर आमने-सामने होंगी और होंगी हर हाल में , तब तो दोनों में से किसी के पास मतदाताओं की सहानुभूति पाने का रास्ता नहीं होगा कि व्यापक वैचारिक हितों के लिए उसने अपनी कुर्बानी दी इसलिए वोटर उसके प्रति सहानुभूति दिखाते हुए इसकी भरपाई करें। एनसीपी शिवसेना या शिवसेना और कांग्रेस के बीच किसी तरह की अनबन में, किसी को भी मतदाताओं से सहानुभूति नहीं मिलेगी। इसके उलट अवसरवादी होने की उलाहनाएं मिलेंगी यह तय है।यही वजह है कि भाजपा के खिलाफ  तमाम जहर उगलने के बावजूद शिवसेना, एनसीपी के साथ आगे बढ़ने से झिझक रही है। जबकि एनसीपी उसकी हर बात मानने को तैयार है। लेकिन शिवसेना के मन से यह भय नहीं जा रहा कि अनुभवी शरद पवार उसे खा जायेंगे। इस बात का एहसास शिवसेना को इस पूरे घटनाक्रम के दौरान शरद पवार के बेहद कूल रवैय्ये ने भी करा दिया है। शिवसेना द्वारा उछल उछलकर पवार की तारीफ में कसे गए कसीदों और एनसीपी को जरूरत से ज्यादा वजन दिए जाने के बावजूद एक बार भी शरद पवार ने शिवसेना के प्रति कोई अतिरिक्त लगाव दिखाने की हड़बड़ी नहीं दिखाई। शरद पवार ने एक बार भी शिवसेना की तारीफ में कुछ नहीं कहा, उलटे अपने अनुभवी अंदाज में यह कहते हुए उसे आईना दिखाया है कि मतदाताओं ने उन्हें और कांग्रेस को विपक्ष में बैठने का जनादेश दिया है। हालांकि हकीकत यह भी है कि इस दौरान शरद पवार न केवल लगातार शिवसेना के टच में थे बल्कि मीडिया की नजर में आयी एक मुलाकात के अलावा भी वह शिवसेना के साथ मिलजुल  रहे थे। लेकिन कल को अगर दोबारा चुनाव की नौबत आती है तो शरद पवार मतदाताओं को यह बताने और समझाने में जरा भी पीछे नहीं रहेंगे कि शिवसेना किसी भी कीमत में सरकार बनाने के लिए किस तरह बेचैन थी। शिवसेना एनसीपी के इस आत्मविश्वास से भी डर रही है कि एनसीपी उसे वह हर चीज देने को तैयार है, जो शिवसेना मांगती रही है। मसलन आधे समय तक का मुख्यमंत्री पद आदि। शिवसेना को लगता है कि उसकी मांग कम है उसे और ज्यादा यानी पूरे पांच साल के लिए मुख्यमंत्री का पद मांगना चाहिए।लेकिन अब इस मोड़ पर आकर वह अचानक यह भी नहीं कह सकती कि उसे पूरे 5 सालों के लिए मुख्यमंत्री पद चाहिए। जबकि उसकी सारी माथापच्ची इसी बात को लेकर है। उसे लगता है कि अगर एनसीपी को बाद के पांच सालों के लिए मुख्यमंत्री का पद मिलता है तो वह अगले चुनावों को ध्यान में रखकर सरकार चलाएगी और चुनावों के ठीक पहले मतदाताओं को व्यापक तरीके से अपने जाल में फांस लेगी। इसलिए वह बाद की टर्म में एनसीपी को मुख्यमंत्री देने से हिचकती है, लेकिन शुरू में भी उसे एनसीपी को मुख्यमंत्री का पद देते हुए डर लगता है, उसे लगता है कि कहीं सता में आते ही एनसीपी इसका फायदा उठाते हुए अपने मतदाताओं को खुश करने के लिहाज से सरकार चलाना शुरू करे और इसके चलते बने गतिरोध से सरकार गिर जाए तो उसे अगले चुनावों में इसका फायदा मिले।इसमें कोई दो राय नहीं है कि फिलहाल इस पूरे समीकरण में कांग्रेस अपनी टर्म डिक्टेट कराने की स्थिति में नहीं है, लेकिन उसे यह तय है कि आज वह जिस मोड़ पर खड़ी है उस मोड़ पर उसे सरकार में रहने का फायदा मिलना ही मिलना है। शिवसेना यही सब सोचकर एक कदम आगे जाती है और फिर दो कदम पीछे चली आती है। हालांकि ऐसा भी हो सकता है अपनी नाक बचाने के लिए वह इन सब बातों को सोचने के बावजूद झुकने से परेशानी महसूस करे और कांग्रेस तथा एनसीपी के साथ आगे बढ़ जाय। मगर फिलहाल तो शिवसेना अपनी  अनुभवहीनता के चलते उलझन में है।

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