प्रदर्शन का केन्द्र् असम क्यों


केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पूर्वोत्तर के राज्यों के मुख्यमंत्रियों, वहां के राजनीतिक दलों, विभिन्न संगठनों एवं अन्य संबंधित पक्षों के साथ नागरिकता बिल के विभिन्न पहलुओं पर गहन विचार-विमर्श किया। उन्होंने सबको आश्वस्त किया था कि आईएलपी और छठी अनुसूची वाले पूर्वोत्तर के इलाके नागरिकता बिल से बाहर रहेंगे। नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और मिजोरम में आईएलपी सिस्टम है। केंद्र ने कहा है कि वह मेघालय में भी आईएलपी सिस्टम लाएगी। ऐसे में ये राज्य कैब से अछूते रहेंगे जबकि असम का 33 में 26 जिले दायरे में आ जाएंगे। यही वजह है कि जनवरी महीने में मेघालय, मिजोरम और मणिपुर में विदेशियों के खिलाफ हो रहा प्रदर्शन अब असम स्थानांतरित हो गया है।
क्या है असम समझौता
1979 में असम के मूल निवासियों ने महसूस किया कि मंगलदोई लोकसभा के उप-चुनाव में वोटरों की संख्या अप्रत्याशित तौर पर बढ़ गई है। तब उन्हें लगा कि यह बांग्लादेश से आए अवैध शरणार्थियों की वजह से हुआ है। बस क्या था, मूल निवासियों ने घुसपैठ के खिलाफ प्रदर्शन करना शुरू कर दिया जो हिंसक रूप अख्तियार कर लिया। तब छह वर्ष तक चले हिंसक प्रदर्शनों में 885 लोग मारे गए। असम के लोगों का गुस्सा तब शांत हुआ जब 1985 में केंद्र की तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने असम समझौता पर दस्तखत किया। इस समझौते के तहत 25 मार्च, 1971 के बाद आए विदेशियों की पहचान कर उन्हें देश निकाला देने का वादा किया गया। दूसरे राज्यों के लिए यह समय सीमा 1951 की थी। अब नागरिकता बिल में 2014 का नई समयसीमा तय कर दी गई। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि नई समयसीमा से असम समझौता की अवहेलना हो रही है।
क्या है इनर लाइन ऑफ परमिट
बंगाल ईस्टर्न फ्रंटियर रेग्युलेशन, 1873 के तहत सीमाई इलाकों के लिए इनर लाइन ऑफ परमिट (आईएलपी) सिस्टम लागू किया गया। इसके तहत, बाहर के लोगों को (भारतीयों को भी) निश्चित इलाकों में आईएलपी के जरिए ही प्रवेश की अनुमति दी जाती है। बाहरी लोगों को उन इलाकों में बसने की अनुमति नहीं होती है। अब आईएलपी सिस्टम का इस्तेमाल कुछ इलाकों कैब के दायरे से बाहर रखने के लिए किया जा रहा है। साथ ही, आदिवासियों के संरक्षण के लिए भारतीय संविधान की छठी अनुसूची के तहत अधिसूचित (नोटिफाइड) इलाकों को भी कैब के दायरे से बाहर रखा गया है। पूर्वोत्तर के राज्यों के ज्यादातर इलाकों में आईएलपी सिस्टम लागू है।
क्या है एनआरसी 
असम समझौता में नैशनर रजिस्टर ऑफ सिटिजंश (एनआरसी) लागू करने का वादा किया गया था। इसके तहत विदेशियों की पहचान कर उन्हें देश से निकालने की बात कही गई थी। लेकिन, 35 वर्षों तक एनआरसी पर कोई काम  नहीं हुआ। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर जब एनआरसी की प्रक्रिया प्रारंभ हुई और 31 अगस्त, 2019 को जब फाइनल एनआरसी सूची का प्रकाशन हुआ तो असम में 19 लाख लोगों के नाम इससे बाहर हो गए। एनआरसी सूची में जगह नहीं बना पाने वाले ज्यादातर हिंदू और मूल आदिवासी समुदाय के लोग थे। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि कैब से एनआरसी निष्प्रभावी की प्रक्रिया ध्वस्त हो जाएगी और अवैध शरणार्थियों को नागरिकता मिल जाएगी।