अभी भी उम्मीद की किरण हैं अच्छे ढंग से किए जाने वाले आन्दोलन


जापान के ओकाहामा में पिछले दिनों रयोबी ग्रुप के बस चालकों ने सद्भावना का विलक्षण प्रदर्शन किया कि उन्होंने जब अपना रोष व्यक्त करने के लिए हड़ताल की तो अपना काम बंद नहीं किया, बल्कि वे बस यात्रियों से किराया वसूलने के बगैर बसें चलाते रहे। रयोबी ग्रुप को मिगूरिन नामक एक अन्य बस ग्रुप से सख्त मुकाबले का सामना करना पड़ रहा है, जो यात्रियों को कम किराये की पेशकश कर रहे हैं। रयोबी ग्रुप के चालकों का संदेश यह था कि उनके लिए अपने हितों से यात्रियों के हितों का महत्त्व अधिक है। रोष प्रदर्शन के इस ढंग की लोगों ने भरपूर प्रशंसा की। रोष प्रदर्शन चाहे अहिंसक भी हो परन्तु इनसे एक तरह की उत्तेजना या आक्रामकता जुड़ी होती है। सामाजिक-राजनीतिक संगठनों की यह आम धारणा है कि लड़ाकू कार्रवाई से ही तुरंत और निर्णायक परिणाम हासिल किए जा सकते हैं। शांतिवाद को कमज़ोरी का चिन्ह माना जाता है परन्तु शांतिपूर्ण कार्रवाइयां समय-समय पर बार-बार प्रभावशाली सिद्ध हुई हैं। महात्मा गांधी, जिन्होंने अहिंसा के ़फलसफे और राजनीति की आधुनिक भारत के दक्षिण पंथी हिन्दुत्वी ग्रुपों द्वारा अक्सर आलोचना की जाती है, देश की आज़ादी के लिए लड़ रही सभी पार्टियों में से वह सबसे अधिक प्रभावशाली सिद्ध हुए थे। दक्षिणपंथी समूहों के मुख्य संरक्षक माने जाते राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आर.एस.एस.) ने तो आज़ादी के संघर्ष में हिस्सा भी नहीं लिया था। बल्कि इसके बंगाल के उप-मुख्यमंत्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने तो ब्रिटेन को सलाह दी थी कि 1942 के ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन को कुचल देना चाहिए, नहीं तो यह देश में गड़बड़ पैदा कर सकते हैं। कुछ माह पूर्व भारतीय मार्क्सवादी पार्टी से संबंधित ऑल इंडिया किसान सभा के 35-40 हज़ार किसानों ने महाराष्ट्र में 180 किलोमीटर लम्बे मार्च का आयोजन किया था। यह मार्च ऋणों और बिजली बिलों की पूर्ण माफी, स्वामीनाथन रिपोर्ट और वन अधिकार एक्ट को लागू करने जैसी मांगों के लिए किया गया था। यह रोष प्रदर्शन 5 मार्च, 2018 को नासिक से शुरू हुआ और 12 मार्च को मुम्बई में महाराष्ट्र विधानसभा तक पहुंच कर खत्म हुआ। अंतिम दिन जब यह रोष प्रदर्शन मुम्बई शहर में आ गया था तो किसानों ने एक विलक्षण किस्म की ज़िम्मेवारी वाली भावना दिखाई। उन्होंने शहर के भीतर दाखिल होने के लिए प्रात: 1 बजे प्रदर्शन शुरू किया ताकि वे सुबह-सुबह ही विधानसभा तक जा पहुंचें और उनके प्रदर्शन के कारण ट्रैफिक में कोई रुकावट न पड़े और न ही कार्यालयों आदि में जाने वाले लोगों या बोर्ड की परीक्षा हेतु जाने वाले विद्यार्थियों को किसी तरह के जाम में फंसना पड़े। यह बिल्कुल विपरीत पहुंच वाला रवैया था क्योंकि कोई छोटा-मोटा प्रदर्शन निकालने वालों की भी आम मानसिकता यही होती है कि वे ट्रैफिक को बंधक बना लें। किसी प्रदर्शन को तभी सफल माना जाता है जब वह ट्रैफिक आदि की बड़ी समस्या पैदा करे। किसानों द्वारा दिखाई गई शिष्टता और विचारशीलता के लिए इस प्रदर्शन को लम्बे समय तक याद किया जाता रहेगा।
भारत जैसे देशों में इस समय भ्रष्टाचार और फज़र् के प्रति लापरवाही न सिर्फ आम बात हो गई है, अपितु ऐसा करने वाले लोगों को ‘सम्राट’ भी माना जाता है। ईमानदार और ज़िम्मेवार लोगों का मज़ाक उड़ाया जाता है और उनके काम के रास्ते में रुकावट खड़ी की जाती है। प्रभावशाली पदों पर बैठे व्यक्तियों द्वारा भाई-भतीजावाद, जातिवाद और साम्प्रदायिकता को अपनाया जाता है। योग्यता की बात पीछे चली गई है और धन की ताकत को ही सलाम होती है। एक ताकतवर या साधन सम्पन्न अपराधी भी न केवल आसानी से बच निकलता है, बल्कि शिकायकर्ता अगर किसी भी राजनीतिक संरक्षण से वंचित हो तो उल्टा उस पर ही झूठा मामला बना दिया जाता है। प्रभावशाली और अमीर लोगों के हितों के अनुसार नियमों और कानूनों को मोड़ा जाता है। राजनीतिक समूह भी अपने संकीर्ण उद्देश्यों की पूर्ति के लिए प्रशासनिक-न्यायिक प्रबंध से लाभ लेने का प्रयास करते हैं। यह शासन का वह मॉडल है, जो आज भारत में निर्मित कर दिया गया है। जब कुछ एक अपवादों को छोड़ कर, योग्यता कोई कसौटी नहीं रही तो प्रबंध का हिस्सा बनने के लिए किसी तरह का राजनीतिक संरक्षण होना एक ज़रूरी शर्त बन गई है। यहां तक कि शैक्षणिक प्रबंध भी बुरी तरह भ्रष्ट हो चुका है। शिक्षण संस्थाओं में पढ़ाने के काम को सबसे कम प्रथामिकता मिलती है। प्रबंध चलाने वालों, अध्यापकों और अभिभावकों और विद्यार्थियों द्वारा प्रबंध को विफल करने के ढंग-तरीके ढूंढे जाते हैं। ज्ञान हासिल करने की बात को कोई महत्त्व नहीं दिया जाता। बस पूरा ज़ोर किसी भी ढंग से अच्छे नम्बर हासिल करने पर ही होता है। इस सम्पूर्ण अन्धकारपूर्ण और विफलता वाले दृश्य में ऑल इंडिया किसान सभा जैसों के अच्छी भावना वाले काम शुद्ध हवा के झोंके की तरह सिद्ध होते हैं। अगर हमें एक परिपक्व और मानवतावादी समाज बनाना है तो हमें न सिर्फ ऐसे कामों को अपनाना पड़ेगा, अपितु इनका अनुकरण भी करना पड़ेगा। विनाशकारी सोच को विकसित सोच के साथ बदलना पड़ेगा। स्वार्थी रवैये के स्थान पर सभी के लिए अच्छाई वाला रवैया अपनाना पड़ेगा। हर तरह के भ्रष्ट विभागों पर ईमानदारी और व़फादारी को भारी करना पड़ेगा। ऩफरत के स्थान प्यार को लाना चाहिए। जाति, वर्ग, धर्म या नस्ली भेदभाव और स्वार्थों के स्थान पर प्रत्येक तरह की विभिन्नता का सम्मान करने वाला सभ्याचार  अपनाना चाहिए। प्रत्येक मनुष्य को समाज का समान सदस्य समझा जाना चाहिए। निजी हितों को समाज और कुदरत के हितों के साथ जोड़ा जाना चाहिए। अधिकतर सभी कर्मशील और प्रतिबद्ध व्यक्ति ऐसे भी हैं जो अपने आस-पास के निरुत्साहित माहौल के बावजूद समाज को अपना सबसे बेहतर देने हेतु प्रयासशील हैं, परन्तु ऐसे उदाहरणें कम ही हैं। परोपकारी कार्यों के स्थान पर निम्न स्तरीय कार्यों के लिए लोग शीघ्र और आसानी से इकट्ठे हो जाते हैं। आम धारणा है कि समाज निर्मित कार्यों  के स्थान पर सनसनीपूर्ण मुद्दों पर लोगों को लामबंद करना अधिक आसान है। भारत में आज राजनीतिक सभ्याचार भी इसी तरह ही भारी है। हमारा समाज वैसे तो शांतिपूर्ण और मानवतावादी माना जाता रहा है परन्तु अब यह लगातार संकीणता और मूलवादी सोच को अधिक स्थान देता जा रहा है। जापान के बस चालकों और महाराष्ट्र के किसानों के ताज़ा उदाहरण अच्छे भविष्य हेतु कुछ उम्मीद जगाते हैं। यह इस बात का प्रमाण हैं कि एक अच्छे समाज के लिए विचार के बीज मौजूद हैं और अंकुरित होने के लिए सही मौके के इंतज़ार में हैं। प्रत्येक तरह के मानवीय कार्यों का उद्देश्य ऐसा सहयोगी माहौल बनाने का ही होना चाहिए, जिसमें मानवता के फूल पूरे यौवन पर खिल सकें। इन्सानों द्वारा अपनी इन्सानियत गुम होने के मौजूदा विपरीत स्थितियों वाले दौर में यह बात और भी आवश्यक हो जाती है।

(मंदिरा पब्लिकेशन्ज़)
-लेखक मैगसासे अवार्ड विजेता हैं और समाजवादी पार्टी (भारत) के उपाध्यक्ष हैं।