गम्भीर होते जा रहे जल संकट पर काबू कैसे पाया जाए ?


वर्षा जल का प्राथमिक स्रोत है। झीलें, दरिया और भूमि निचले जल दोयम दर्जे के स्रोत हैं। वर्षा की नमी ही बर्फबारी को प्रभावित करती है और जंगलों को भी। दरियाओं के मुख्य स्रोत हैं : बर्फीले क्षेत्र और घने जंगल। जल बहाव और भूमिगत जल तो है ही वर्षा पर निर्भर। मौजूदा समय हम पूरी तरह के दो नम्बर के स्रोतों, जलकुंडों तथा भूमि निचले जल पर ही निर्भर होकर रह गए हैं। हम भूल गए हैं कि यह वर्षा ही है जो इन स्रोतों की पुन: पूर्ति करती है। जल 100 प्रतिशत प्राकृतिक वरदान है, यह बनाया नहीं जा सकता। परन्तु संयम से इस्तेमाल किया जा सकता है, शुद्ध रखा जा सकता है, बचाया जा सकता है, पुन:-भरपाई की जा सकती है।
वर्षा तो हमारे बहुत होती है, परन्तु देश में जल की कमी फिर भी है क्यों? क्योंकि हम वर्षा की प्रत्येक बूंद की कीमत और महत्त्व से परिचित नहीं। भारत में औसतन 1170 मिली मीटर वार्षिक वर्षा होती है, जो दुनिया की औसतन 800 मिली मीटर वार्षिक वर्षा से कहीं ज्यादा है। विडम्बना देखें चिरापूंजी जहां किसी समय वर्षा की दुनिया की सबसे ज्यादा 11000 मिलीमीटर दर थी, भी पीने वाले पानी की समस्या से ग्रस्त है। यह सब इसलिए है कि हम वर्षा के जल को सम्भालते नहीं, उल्टा नुक्सानों के लिए बहने देते हैं। वर्षा हमें प्राकृतिक जल चक्र द्वारा प्राप्त होती है। यह जल चक्र तब ही संतुलित चलेगा यदि प्राकृतिक संतुलन हो और वातावरण भी संतुलित हो। लगभग 3,28000 घन किलोमीटर जल हर वर्ष समुद्र से उड़ता है और लगभग 61,300 घन किलोमीटर धरती से, जिसके परिणामस्वरूप लाखों घन किलोमीटर जल वर्षा के रूप में समूची दुनिया को पुन: प्राप्त होता है। भारत में औसतन 4 हज़ार अरब घन मीटर वर्षा होती है। इसमें से हाल के समय 690 अरब घन मीटर जल कार्य में लाया जा सकता है और इतना ही धरती में पुन: भेजने के लिए सम्भाला जा सकता है। ज़रूरत तो अब भी कहीं ज्यादा है। फिर इस समय हम 552 अरब घन मीटर जल का प्रयोग करते हैं। हमारे देश के मौजूदा बांधों से 162 अरब घन मीटर जल रोका गया है। लगभग 100 अरब घन मीटर हम नदियों झीलों से और 290 अरब घन मीटर धरती के नीचे से इस्तेमाल करते हैं, जिससे जल स्तर गहरा होता जा रहा है। सिर्फ पंजाब में ही एक वर्ष में 31.44 बिलियन क्यूबिक मीटर जल धरती से निकाला जाता है, जबकि 21.44 ब.क.म. जल धरती में रिस्ता है। चिंता यह है कि वर्षा दर साल दर साल कम और असंतुलित हो रही है। वर्ष 2025  तक हमारी जल खपत 1530 अरब घन मीटर हो जाएगी। परन्तु वर्षा के बिना हमारी अन्य जल सम्पत्ति न तो इतनी है, न ही उसको सही तौर पर इस्तेमाल करने के लिए हमारे पास साधन हैं। इसलिए वर्षा के जल को हर छोटे, सस्ते, प्रकृति से मिलते, सम्भव तरीकों से संग्रह करने या धरती में रिसाने के बिना कोई विकल्प नहीं। 
बेशक पंजाब, खास तौर पर भारत के बहुत सारे क्षेत्र प्राकृतिक स्रोतों से मालामाल कहे जा सकते हैं, परन्तु हमारे पास समूची दुनिया के मुकाबले रकबा 2.4 प्रतिशत, शुद्ध जल की उपलब्धता 4.1 प्रतिशत परन्तु विश्व मुकाबले आबादी 17.5 प्रतिशत है। 1951 में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता 5200 घन मीटर थी, जो मुनाफे वाली लालसा और प्राकृतिक स्रोतों के हनन के कारण वर्ष 2010 में प्रति व्यक्ति हिस्सा 1600 घन मीटर रह गई, जोक 2025 में लगभग 1100 घन मीटर प्रति व्यक्ति रह जाएगी। जल कृषि के लिए भी ज़रूरी है और उद्योगों के लिए भी। वास्तव में समूची दुनिया के लिए भोजन पैदा करने में भूमि और जल का बेहद महत्त्व है। भूमि जहां जीवन का आधार है, वहां विश्व की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थिति को जल की उपलब्धता, मात्रा और गुण प्रभावित करते हैं। रोटी, कपड़ा और मकान मनुष्य की अहम बुनियादी ज़रूरतें हैं। राजनीतिक स्थिरता में भोजन का अहम योगदान है। भूमि और जल भोजन के केन्द्रीय नुक्ते हैं। दरअसल यही दो अहम प्राकृतिक वस्तुएं हैं जिनके बिना जीवन के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता। जहां सत्ता का आश्रय यही है वहीं किसी भी क्षेत्र की जीवनशैली, जेब और तख्त की स्थिति पर जल की भूगौलिकता, उसको सम्भालने-विकसित करने (संयम से इस्तेमाल/पुन:भरपायी) की सार्थकता भी प्रभावशाली होती है।
पंजाब की कुल कृषि योग्य भूमि लगभग 40 लाख हैक्टेयर है। देश की कुल धरती का महज़ 1.2 प्रतिशत। पंजाब ने लगभग 26 लाख हैक्टेयर रकबे ने जल को पीने वाली धान की बिजाई (अब बिना ऋतु के मक्की भी) शुरू कर दी है। पंजाब की कृषि 70 प्रतिशत भूमिगत जल पर निर्भर है। वर्ष 1960 में चावल की पैदावार 3 लाख टन थी। हरित क्रांति/मुनाफे के लिए पैदा हुई लालसा के तहत यह आंकड़ा 146 लाख टन पर पहुंच गया। एक एकड़ धान के लिए 1 करोड़ 12 लाख लीटर जल की ज़रूरत पड़ती है। इस तरह हम खरबों लीटर जल धरती के नीचे से निकाल कर चावल के रूप में अन्यों को मुफ्त में देकर समाप्त कर रहे हैं। हमारे वारिस प्यासे मरेंगे। परिणाम स्वरूप पंजाब का जल बहुत तेजी से नीचे जाने लगा। पूरे भारत में 4271 जलाशय हैं, उनमें से जल का अत्यधिक दुरुपयोग करने वाले कई क्षेत्र हैं, जिसमें से लगभग आधे 107 सिर्फ छोटे से पंजाब और हरियाणा में हैं। ऐसे पंजाब के 184 जल स्रोत ज़ोन हैं, जिनमें 124 खत्म हो चुके हैं। पंजाब के कुल 148 भूगौलिक ब्लाकों में से 110 बुरी स्थिति में चले गए हैं। एक किलो चावल की पैदावार के लिए औसतन 4 हज़ार लीटर पानी की ज़रूरत पड़ती है। यदि कीमत सिर्फ 10 पैसे प्रति लीटर मानें (अंतर्राष्ट्रीय वर्षा के पानी की कीमत 2.80 रुपए आंकी जा चुकी है) तब ही 400 रुपए प्रति किलो बनते हैं। अन्य खर्च अलग। भला! हम कितने रुपए किलो चावल बेचते हैं? 
पंजाब के लगभग 14 लाख ट्यूबवैलों में से 11 लाख सबमर्सीबल या अर्द्ध-सबमर्सीबल बोर पाताल का पानी अंधाधुंध उगल रहे हैं। बिना यह सोचे कि पाताल तक पानी जाने के लिए अढ़ाई लाख वर्ष लगते हैं। वह भी तो यदि हम तालाबों, खड्डों, बांधों में वर्षा का पानी रोकेंगे। दिन-रात पाताल का पानी निकाल रहे सबमर्सीबल क्या गुल खिलाएंगे? ज़हर ऊपर को आएगी और धरती खिसकनी शुरू हो जाएगी इनसे। बाद में लगभग 25 लाख घरेलू (छोटे) और औद्योगिक (बहुत गहरे) सबमर्सीबल भी खतरे की घंटी हैं। सिर्फ पारम्परिक सीमा तक वाली जल खड्डें (100 फुट तक) वाले कुएं के ट्यूबवैल ही ठीक हैं। वे भी तब चलेंगे यदि यह खड्डें वर्षा के पानी को रोक कर सम्भाल कर रखेंगी। यह वर्षा का जल ही है जो भूमिगत और दरियाई जल की जीवन रेखा है। 
इमानदारी से देखें तो पुराने पंजाब के हरे-भरे क्षेत्र उस समय तक ही थे जब तक यहां के सभी प्राकृतिक स्रोत सहज-सरल थे।  शिवालिक सब्ज़ थी तब ही पांच दरियाओं की उप-नदियां भरी पड़ी थीं। बेहद छोटे-बड़े तालाब थे। अफसोस पंजाब में बाढ़ के इतिहास ने भी तब ही विकराल रूप धारण किया जब छोटे-बड़े जल कुंड जो बड़ी मात्रा में वर्षा का जल सम्भाल सकते थे। तेजी से खत्म होने लगे। यही स्रोत भूमि निचले जल की सत्ता को संतुलित रखते थे। हर वर्ष जितना सामान हम बाढ़ में गंवा देते हैं और पुन: जितनी राशि हम मुआवज़ों में बांट देते हैं, उतनी एक बार ही योजनाबद्धी खर्च की गई राशि से हम काफी सीमा तक स्वयं भी मुक्त हो जाएंगे और पड़ोसी भी। यदि हम तीस प्रतिशत भूमिगत जल का इस्तेमाल करें और 70 प्रतिशत पुन: भरपाई हो तो बहुत सही होता, 40 प्रतिशत तक इस्तेमाल खतरे के निशान तक पहुंच जाता और यदि भूमि निचले जल का प्रयोग 70 प्रतिशत हो गया है, तो समझो इससे भयंकर स्थिति और नहीं हो सकती। परन्तु पंजाब जैसे घनी कृषि वाले क्षेत्र तो 146 प्रतिशत से भी कहीं अधिक इस्तेमाल कर रहे हैं, जिस कारण गहरे होते जा रहे जल कुंड तो शीघ्र ही खत्म हो जाएंगे।
जल-कुंड बरकरार रखने के लिए रिचार्ज हेतु अपनी विलक्षण भूगौलिकता के कारण कंडी क्षेत्र सस्ता और ज़रखेज़ है। कुछ हिस्सा इस्तेमाल करने के बाद धरती में जाए तो पंजाब का जल स्तर अगले एक दशक तक पुन: पारम्परिक स्तर के कुओं (10 से 100 फुट) तक पहुंच जाएगा, फिर गहरे ट्यूबवैल लगाने की ज़रूरत नहीं रहेगी। बहुत कुछ बचेगा, संवरेगा फिर। इससे पहाड़, जंगल और चश्मे जरखेज़ होंगे। दरियाओं को पानी मिलेगा, जंगल वर्षा करवाने में सराहनीय भूमिका ही नहीं निभाते अपितु एक वर्ग किलोमीटर घना जंगल 50 लाख लीटर वर्षा जल धरती में भेज देता है। बात यहां समाप्त होती है कि लोयर शिवालिक में भूमि और जल सम्भाल कार्य, पंजाब के गिरते जल स्तर, जंगल, बाढ़ की रोकथाम और वातावरण के लिए राम बाण साबित होंगे। यदि पंजाब और पड़ोसियों को बचाना है तो शिवालिक में गिरती प्रत्येक वर्षा की बूंद को सम्भालना-समेटना पड़ेगा।
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