देश में जनसंख्या वृद्धि को कैसे रोका जाये ?


जरा याद कीजिए कि इंदिरा गांधी के पुत्र संजय गांधी की सबसे बड़ी असफ लता क्या थी? यह थी उनकी अधकचरी सोच, मर्द होने का अहंकार, प्रधानमंत्री मां की ताकत को अपने मन्सूबे पूरे करने का हथियार बना लेना और जिस विषय की बुनियादी समझ तक नहीं थी, मतलब फैमिली प्लानिंग को बंदूक के बल पर लागू करने की अमानवीय कोशिश, जिसका नतीजा इतना दर्दनाक निकला कि उसके बाद किसी भी दल और उनके नेताओं की इस मुद्दे पर बात तक करने की हिम्मत नहीं हुई। यह बात हर किसी की जुबान पर होती है चाहे दबे स्वर में ही हो कि हमारे विकास की गति धीमी इसलिए है क्योंकि संसाधन तैयार होने की तादाद कभी भी उस संख्या से मेल नहीं खा पाती जो बेरोक-टोक आबादी बढ़ने से बन जाती है और हमारे प्रयासों को नाकामयाब बना देती है। इस बार प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से अपने भाषण में इस मुद्दे को उठाते हुए देशवासियों का आह्वान किया कि परिवार को सीमित रखना भी देशभक्ति है तो लगा कि उनके मन में इस बारे में कोई न कोई योजना अवश्य चल रही होगी और वे अन्य मामलों की तरह इसे भी सुलझाने के लिए कृतसंकल्प हैं। यह भी सोचा होगा कि इस मद में करोड़ों रुपया लगाने के बावजूद सफलता क्यों नहीं मिली? उनके भाषण से लगा कि वे सीमित परिवार रखने वालों को सम्मानित कर सकते हैं। तो समझ लीजिए कि इनकी संख्या देशभर में मुशकिल से दस प्रतिशत होगी।  इसलिए ये कभी भी शेष परिवारों के लिए रोल मॉडल नहीं हो सकते। सीमित परिवार रखने का संबंध हमारी जातिगत विभिन्नताओं, सामाजिक और धार्मिक मान्यताओं तथा व्यक्तिगत आकांक्षाओं से जुड़ा है, इसलिए अत्याधिक संवेदनशील भी हैं। इसलिए कोई बड़ा कानून बनाने या प्रतिबंध लगाने से पहले दो बार सोच लीजिएगा क्योंकि इस मामले में दांव उल्टा पड़ सकता है।
महिलाओं की भूमिका
एक घटना है जिसका जिक्र मलिंडा गेट्स ने अपनी किताब में किया है जो इस विषय को समझने की समझ पैदा करने का उदाहरण है। भारत में अपनी फाउंडेशन के कार्यक्रमों का जायजा लेने के दौरान वे गर्भवती महिलाओं और उनके परिवारों से मिलीं। एक बुजुर्ग महिला ने कहा कि उसने आठ बच्चों को घर पर ही जन्म दिया जिनमें से छ: जन्म लेने के बाद एक सप्ताह में ही मर गए। अब उसकी बहू गर्भवती है और वह चाहती है कि बहू को प्रसव के समय हर प्रकार की सुविधा मिले और नहीं चाहती कि वह दोबारा गर्भवती हो और उसका जीवन भी मेरी तरह यानी अपनी सास के जैसा हो। एक अन्य महिला जो अनेक बार मां बन चुकी थी और फिर से एक बच्चे को जन्म देने वाली थी, वह यह सोच रही थी कि वह इतनी मजबूर क्यों है कि वह यह नहीं कह पाती कि अब वह मां नहीं बनना चाहती?क्या कोई मर्द उन औरतों के दर्द को समझ सकता है जो अपने बच्चों को किसी और को देने के लिए तैयार हों, दूसरा बच्चा पैदा न करना चाहें और बच्चे का लालन-पालन करने और उसके भविष्य के बारे में कोई भी फैसला लेने का अधिकार केवल उनके पति, ससुर या किसी अन्य पुरुष के हाथ में हो और सिर झुकाकर हर निर्णय मान लेने की बेबसी हो !  संसार की हर महिला चाहती है कि उसकी संतान स्वस्थ और सुखी हो, खूब पढ़े-लिखे, अपने को योग्य बनाए, उनके अपने परिवार हों और वे अपने जीवन को खुशियों से भरते रहें और इसके साथ-साथ वे स्वयं भी शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ हों और अपने को सुरक्षित इस रूप में समझें कि उन्हें यह निर्णय करने का अधिकार हो कि उन्हें कब मां बनना है। बिना सोचे-समझे गर्भवती हो जाना महिलाओं के लिए घातक, असम्मानजनक, निराश और अंधकारपूर्ण भविष्य का कारण है और विडम्बना यह कि इसके लिए उनके पति जिम्मेदार होते हैं और वह इसके लिए पत्नी को ही दोषी मानते हैं।
सीमित परिवार और संयम
सबसे पहले जरूरी यह है कि प्रत्येक गर्भवती महिला के सुरक्षित प्रसव की व्यवस्था हो और इसके लिए पर्याप्त स्वास्थ्य केंद्र, अस्पताल, नर्सिंग होम और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की सुविधाएं उपलब्ध हों। ऐसा होने पर ही लोग सीमित परिवार की कल्पना कर पाएंगे और इसके सुखद परिणामों को समझ पाएंगे। उनकी समझ में आने लगेगा कि अधिक आबादी ही अकाल, भूख, गरीबी और परिवारों के बिखरने का मूल कारण है।  
क्या होना चाहिए ?
सब से पहले तो सरकार को सीमित परिवार की योजना बनाने का काम केवल महिलाओं की भागीदारी से पूरा करने की व्यवस्था करनी होगी और इसे स्त्रियों के अधिकार क्षेत्र में लाना होगा कि वे तय करें कि कैसे इस अभियान को सफल बनाया जा सकता है। अब तक जनसंख्या नियंत्रण के लिए पुरुष ही ज्यादातर योजनाएं बनाते आए हैं, जबकि सुखी परिवार की कल्पना को साकार करने की जिम्मेदारी महिलाओं की है। तो फि र इसके लिए पुरुष ही क्यों योजना बनायें ? प्रधानमंत्री जी एक सीमित परिवार मंत्रालय का गठन कर दीजिए, जिसमें मंत्री से लेकर संतरी तक महिलाएं हों और फिर देखिए कि जनसंख्या पर कितनी सफलता से नियंत्रण होता है। वरना डर यही है कि इतिहास अपने को फिर से न दोहरा ले, आबादी बढ़ने से रुकना तो दूर उसकी गति और अधिक तेज  हो जाए। (भारत)