प्रीतलड़ी और प्रीतनगर की बात


इन दिनों हम गुरबख्श सिंह प्रीतलड़ी की जन्म शताब्दी के 125वें वर्ष से गुज़र रहे हैं। पंजाब, पंजाबी और पंजाबियत में दिलचस्पी रखने वाले उनको सहजप्रीत और सपनों के सृजक के तौर पर स्मरण करते हैं। यह घटनाक्रम अप्रैल के महीने में शुरू हुआ था और आगामी अप्रैल तक जारी रहेगा। गुरबख्श सिंह का जन्म पश्चिमी पंजाब के सियालकोट ज़िले में हुआ और उन्होंने अमरीका से इंजीनियरिंग की डिग्री प्राप्त करके कुछ वर्ष इंडियन रेलवे में नौकरी भी की। अपने जन्म वाले पंजाब में थोड़ी देर मशीनी खेती पर हाथ आज़मा कर पूर्वी पंजाब की सीमा के निकट प्रीत नगर नामक कस्बा बसा कर नई और निरोल ज़िन्दगी का सपना साकार करने वाले भी वही थे। गुरबख्श सिंह की 125वीं जन्म शताब्दी के कार्यक्रम जारी हैं। लेख का उद्देश्य उनके मित्र-प्यारों और प्रशंसकों द्वारा अब तक की गई बातों को पेश करना है। प्रीतनगर संयुक्त पंजाब की राजधानी लाहौर और अविभाजित पंजाब की व्यापारिक राजधानी अमृतसर से लगभग इतनी ही दूरी पर होने के कारण इसको पंजाबी प्रेमियों ने अपने निवास के लिए उत्साहित होकर अपनाया। इनमें नानक सिंह नावलकार जैसे श्रेष्ठ साहित्यकार ही नहीं, सोभा सिंह चित्रकार, अभिनेता-निर्देशक बलराज साहनी जैसी अन्य शख्सीयतें भी थी। इस नगरी की महिमा मानने वालों में फैज़ अहमद, साहिर लुधियानवी, उपेन्द्रनाथ अश्क और अमृता प्रीतम जैसे ऊंचे-लम्बे साहित्यकार ही नहीं, पंडित जवाहर लाल नेहरू जैसे राजनीतिज्ञ तथा नोरा रिचर्ड और रबीन्द्रनाथ टैगोर जैसे नाटक रसिये भी किसी न किसी रूप में जुड़े रहे। नोरा रिचर्ड ने 1941 वाली यात्रा के समय प्रीतनगर की विज़ीटर बुक में यहां के एक्टिविटी स्कूल को बहु-भांतीय नख्लीस्तान (मारुस्थल में हरियावल) लिखा और पंडित नेहरू ने प्रीतनगर को संतुलन की रोशनी। टैगोर के सहयोगी गुरुदयाल मलिक ने अपनी यात्रा के समय इस नगरी को शांति निकेतन की बहन लिखा। इस नगरी में शांति निकेतन जैसी रोशनी बांटने में गुरबख्श सिंह प्रीतलड़ी का विशेष योगदान है, जो देश के विभाजन से पूर्व और बाद में फारसी तथा देवनागरी लिपि में भी प्रकाशित होती रही है। एक का सम्पादन साहिर लुधियानवी देखते थे और दूसरे का उपेन्द्रनाथ अश्क। 
1947 के देश विभाजन ने अखंड पंजाब के सभ्याचारक और आर्थिक मूल्यों को ही टुकड़े-टुकड़े नहीं किया है, प्रीतों की पहरेदार के तौर पर बसाई इस नगरी को भी खंडहर बना दिया। पंजाब के टुकड़े करने वाली सीमा रेखा प्रीतनगर की शाहरग से गुज़रती थी। इसके निर्माता गुरबख्श सिंह को अपना साजो-सामान लेकर कुतुबमीनार वाली महरौली में शरण लेनी पड़ी और प्रीतलड़ी का छापाखाना भी लाल किले और गुरुद्वारा सीस गंज के मध्य नये सिरे से चालू करना पड़ा। सौभाग्यवश देश के विभाजन के बाद दिल्ली के नये डिप्टी कमिश्नर, प्रसिद्ध प्रकाशक महिन्द्र सिंह रंधावा नियुक्त हुए, जो गुरबख्श सिंह की करनी, कथनी और लेखनी के प्रशंसक थे। उनकी दरियादिली और धड़ल्ले ने विरोधी लहरों की शिकार प्रीतलड़ी को मरने से बचा लिया, जो आज भी सांस ले रही है। इसके बाद इस नगरी को एक झटका पंजाब में जन्मे आतंकवाद ने भी दिया, जिसमें गुरबख्श सिंह के पौत्र सुमीत सिंह की जान भी चली गई। प्रीतलड़ी को बनते श्वास देने में गुरबख्श सिंह की पौत्र-बहू पूनम का बहुत बड़ा योगदान है, जिन्होंने सुमीत के भाई रतीकांत से विवाह ही नहीं किया, प्रीतलड़ी को जारी रखने में तन-मन लगा दिया है। चाहे प्रीतनगर को त्याग कर महरौली बसने वाले प्रीतों के अधिकतर पहरेदार इस नगरी नहीं लौटे, इसके निर्माता गुरबख्श सिंह और उनके छोटे बेटे हृदयपाल सिंह लगभग दो वर्ष के अंतराल के बाद प्रीत नगर लौट आये।  हृदयपाल आज तक वहीं रह रहे हैं। खुशी की बात है कि उनकी जीवन साथी प्रवीणपाल समय-समय पर इस नगरी की यादें लिख कर इसकी मशाल को बुझने नहीं दे रही। हाल ही में चंडीगढ़ साहित्य अकादमी ने इस संबंध में सैमीनार करवाया, तो इसमें शामिल होकर उन्होंने प्रीतलड़ी, प्रीतनगर और गुरबख्श सिंह के समूचे परिवार से मिले प्यार की बात करके श्रोताओं के सामने पौनी सदी पूर्व जली मशाल की रोशनी भी बिखेरी। इस अवसर पर पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला से आये डा. सुरजीत सिंह और सृजना के सम्पादक रघबीर सिंह ने भी उस समय के नक्श खूब बताये। एक श्रोता ने बातें करते हुए प्रीतनगर में बिताये अपने बचपन की बात करके प्रीतलड़ी का प्रमुख सन्देश भी दोहराया, जो गुरबख्श सिंह ने स्वयं रचा था :
किसे दिल सांझे दी धड़कण
किसे प्रीत गीत दी लै आ
पन्ने प्रीतलड़ी दे दसण 
इस विच परौती सभे शै
यदि मैंने अपनी बात करनी हो तो मुझे यह बताने में खुशी मिलती है कि मेरी जीवनशैली को ढालने में गुरबख्श सिंह की रचनाओं का मेरे अभिभावकों से भी अधिक हाथ था, जिसको आगे जाकर पं. जवाहर लाल नेहरू की कथनी और करनी ने दृष्टि प्रदान की तथा और बाद में कामरेड ई.एम.एस. नम्बूदरीपाद की सोच ने आगे बढ़ाया। 

अंतिका
(एस.एस. मीशा)
है उवें तिरंजणा दी रौणक
है उवें पिपलां दी छां
पर तेरे बाझों एह
बस्ती जापदी वीरान है।