किसान और मज़दूर


बहुत समय पहले की बात है, भारत के पहाड़ी क्षेत्र में एक किसान रहता था। उसे अपने खेत में काम करने वालों की बड़ी ज़रूरत रहती थी, लेकिन ऐसी खतरनाक जगह, जहां आये दिन आंधी-तूफान आते रहते हों, कोई काम करने को तैयार नहीं होता था। किसान ने एक दिन शहर के अखबार में इश्तिहार दिया कि उसे खेत में काम करने वाले एक मजदूर की ज़रूरत है। किसान से मिलने कई लोग आये, लेकिन जो भी उस जगह के बारे में सुनता, वो काम करने से मना कर देता। अंतत: एक सामान्य कद का पतला-दुबला अधेड़ व्यक्ति किसान के पास पहुंचा। किसान ने उससे पूछा, क्या तुम इन परिस्थितियों में काम कर सकते हो? व्यक्ति ने उत्तर दिया। बस जब हवा चलती है तब मैं सोता हूं, किसान को उसका उत्तर थोड़ा अजीब लगा लेकिन चूंकि उसे कोई और काम करने वाला नहीं मिल रहा था, इसलिए उसने व्यक्ति को काम पर रख लिया। मजदूर मेहनती निकला, वह सुबह से शाम तक खेतों में काम करता, किसान भी उससे काफी संतुष्ट था। कुछ ही दिन बीते थे कि एक रात अचानक ही जोर-जोर से हवा बहने लगी, किसान अपने अनुभव से समझ गया कि अब तूफान आने वाला है। वह तेज़ी से उठा, हाथ में लालटेन ली और मजदूर के झोंपड़े की तरफ दौड़ा। जल्दी उठो, देखते नहीं तूफान आने वाला है, इससे पहले कि सब कुछ तबाह हो जाए कटी फसलों को बांध कर ढक दो और बाड़े के गेट को भी रस्सियों से कास दो। किसान चीखा। मजदूर बड़े आराम से पलटा और बोला, नहीं जनाब, मैंने आपसे पहले ही कहा था कि जब हवा चलती है तो मैं सोता हूं। यह सुन किसान का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया, जी में आया कि उस मजदूर को गोली मार दे, पर अभी वो आने वाले तूफान से चीज़ों को बचाने के लिए भागा।
किसान खेत में पहुंचा और उसकी आंखें आश्चर्य से खुली रह गई, फसल की गांठें अच्छी से बंधी हुई थीं और तिरपाल से ढकी भी थी, उसके गाय-बैल सुरक्षित बंधे हुए थे और मुर्गियां भी अपने दड़बों में थीं, बाड़े का दरवाज़ा भी मज़बूती से बंधा हुआ था। सारी चीज़ें बिल्कुल व्यवस्थित थी...नुक्सान होने की कोई सम्भावना नहीं बची थी। किसान अब मजदूर की ये बात कि ‘जब हवा चलती है तब मैं सोता हूं समझ चुका था, और अब वो भी चैन से सो सकता था।

—मनीशा देवी