श्री कृष्ण के रूप हैं अनेक


कन्हैया, कृष्ण, पीताम्बर, देवकी-नंदन, वासुदेव, यशोदानंदन, जो मर्जी कहिये पर कृष्ण सिर्फ कृष्ण हैं। सारी दुनिया के लिए एक कभी भी खत्म न होने वाला आकर्षण। ऐसा आकर्षण, जो हर पल हर रूप में पूरा-पूरा सुख देता है। कृष्ण कभी कर्मयोगी लगते हैं तो कभी छलिया, कभी उनमें भगवान के दर्शन होते हैं तो कभी वह एक साधारण से मानव नज़र आने लगते हैं। कृष्ण को समझने में बड़े-बड़े तपस्वी त्रिलोकदर्शी ज्ञानी जहां ‘नैति नैति’ करने को मजबूर हो जाते हैं, वहीं अनपढ़ और गंवार समझे जाने वाले ग्वाले, गोपियां उन्हें पा जाते हैं। यदि सच कहा जाये तो कृष्ण कभी भी समझ में न वाले ऐसे तत्त्व हैं जिन्हें समझने के लिये सारे पोथे, पुस्तकें, ग्रंथ अपर्याप्त  रह जाते हैं, और प्रेम के ढाई अक्षर से वह वश में हो जाते हैं। जगत में चराचर के स्वामी दुनिया को कर्म, अकर्म का पाठ पढ़ाने वाले, गोपियों से लेकर ज्ञानियों तक सबको मंत्रमुग्ध और अपने वश में कर लेने वाले, तीनों लोगों में एकछत्र राज्य करने वाले दुष्टों के भय और भक्तों के बल, कृष्ण का नाम स्मरण मात्र ही जन्म मरण के बंधन से मुक्त कर देता है। कृष्ण सचमुच कृष्ण हैं, और सारी दुनिया को अपने आकर्षण में ऐसा बांधते हैं कि बंधन में बंधने वाला स्वयं ही उनके बांधे बंधन में बंधा रहना चाहता है। कृष्ण मानव के रूप में भी  उतना ही लुभाते हैं जितना कि ईश्वर के रूप में। उनका एक-एक कार्य मन में घर कर जाता है। उनका यशोदा को रिझाना, गोपियों को तड़पाना, सुदामा की मदद करना, विदुर के घर दुर्योधन के पकवान ठुकरा कर साग रोटी खाना, अर्जुन और दुर्योधन दोनों को ही संतुष्ट करते हुए कूटनीतिक तरीके से एक तरफ खुद को, तो दूसरी तरफ अपनी सेना को दे देना कृष्ण का दोनों हाथों में लड्डू रखने की रणनीति को दर्शाता है। कृष्ण युद्ध में साम, दाम, दंड, भेद सब को ही अपने प्रिय पांडवों की जीत के लिए आजमाते हैं। वहां वह न उचित देखते हैं, और न अनुचित। बस एक ही लक्ष्य साधते हैं, जीत का लक्ष्य। और अंततोगत्वा उसमें सफल भी होते हैं। सच कहा जाये तो कृष्ण सफलता का ही दूसरा नाम हैं। कृष्ण जिस तरह का आचरण करते हैं, उसे देखकर शायद ही उन्हें कोई भगवान का दर्जा दे पाये, पर फिर भी मज़ेदार बात यह है कि कृष्ण आज भी अपने भक्तों के बीच भगवान का दर्जा पाये हुए हैं और उन्हें इस दर्जे से शायद ही कभी कोई हटा पाये। कृष्ण अपने जन्म से ही दिव्य लगते हैं।  कृष्ण बंधन भी हैं और मुक्ति भी। वे बांधते भी हैं और बंधते भी हैं। कृष्ण जहां अपने भक्तों को अपने आकर्षण में बांधते हैं, वहीं वह उन्हें माया मोह के बंधन से मुक्त भी करते हैं। कृष्ण ही अपने चाहने वालों को जन्म और मृत्यु के झंझटों से मुक्ति दिलाने वाले परम प्रभु हैं।