तूफान की वापसी 


बहुत पुरानी बात है। गोलू, राजू, समीर और दीपक के घर रेलवे कॉलोनी में थे। इसलिए चारों दोस्तों को घर से स्कूल और स्कूल से घर आने-जाने के लिए रेलवे लाइनों को पार करना पड़ता था। रेलवे लाइनों को पार करने के लिए एक पुल बना था लेकिन वह उनकी कॉलोनी से लगभग दो फलाग दूर था। फिर भी वे अक्सर उस पुल का प्रयोग करते थे मगर जब कभी उन्हें जल्दी होती, वे सीधे लाइनों को पार कर स्कूल चले जाते थे। एक दिन उन्हें स्कूल के लिए देर हो रही थी। वे लाइनों के बीच तेजी से पांव रखते हुए चले जा रहे थे। सुबह के सात बज चुके थे। चारों तरफ खामोशी थी। केवल उन चारों के कदमों की आहट सुनाई दे रही थी। अचानक एक भयानक चीख उठी। गोलू, राजू और समीर एकाएक चौंक पड़े। उन्होंने घबरा कर देखा कि दीपक का दायां पैर लाइनों के उन जोड़ों के बीच फंस गया था, जहां से दाईं ओर एक और नई लाइन निकलती थी। घबराहट के मारे सबके पसीने छूट गए। लाइन बदलने से दीपक का पैर लाइन में फंसा था। इसका मतलब यह था कि थोड़ी ही देर में कोई रेलगाड़ी उस लाइन पर से गुजरने वाली है। इस ख्याल के आते ही उनमें दहशत फैल गई। एकाएक समीर चिल्लाया, ‘राजू, फौरन लाइनमैन के केबिन की ओर दौड़ो। मैं उस तरफ जाता हूं जिधर से गाड़ी आने वाली है।’ राजू समीर की बात सुनते ही लाइनमैन के केबिन की ओर दौड़ा, जहां से सभी लाइनों को जोड़ा और अलग किया जाता था लेकिन जहां दीपक का पैर फंसा था, उस जगह से लाइनमैन के केबिन का फासला लगभग तीन फलांग था। उधर समीर उस दिशा की ओर दौड़ रहा था जिधर से रेलगाड़ी आने वाली थी। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह रेलगाड़ी को किस तरह से रोकेगा पर वह दौड़ता चला जा रहा था। तभी दूर से इंजन की सीटी की आवाज सुनाई दी। समीर कांप उठा। दौड़ता-दौड़ता वह पुल के नीचे पहुंच चुका था। दूर से रेलगाड़ी का इंजन तूफान की तरह चला आ रहा था। समीर को लगा कि वह दीपक को नहीं बचा पाएगा। तभी उसकी नजर पुल पर पड़ी, जिसके ऊपर खड़े हो कर वह कई बार नीचे से रेलगाड़ी का गुजरना देख चुका था। पुल के ऊपरी तल से रेलगाड़ी करीब दो फुट नीचे होकर गुजरती थी। कुछ सोच कर वह पुल की बाईं सीढ़ीयों की ओर भागा और कुछ ही देर में पुल के एक किनारे की लोहे की सीखचों के बीच में से निकल कर नीचे कूदने के लिए तैयार हो गया। उधर दीपक दर्द के मारे चिल्ला रहा था। उसका पैर लहू-लुहान हो चुका था। गोलू दीपक को तसल्ली देने की कोशिश कर रहा था पर अब उसके चेहरे का भी रंग उड़ गया था। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे। समीर का हृदय कांप रहा था। रेलगाड़ी की आवाज तेजी से निकट आती जा रही थी। जब वह पुल के नीचे से गुजरने लगी तो वह झट से इंजन के पिछले हिस्से में कोयले के ढेर पर कूद गया और लुढ़कता हुआ कोने में जा टिका। वह जल्दी से कोयले के ढेर से उठा और इंजन के अगले भाग में जाने के लिए बने छोटे से दरवाजे में प्रवेश कर गया। इंजन ड्राइवर ने समीर को इस हालत में देखा तो वह चौंका। समीर ने जल्दी से सारी बात ड्राइवर को बता दी। ड्राइवर ने तत्काल इंजन को ब्रेक लगा दिया। तेज आवाज करती हुई रेलगाड़ी दीपक से तीन गज के फासले पर रूक गई। दीपक डर के मारे बेहोश हो गया था। ड्राइवर और समीर दोनों नीचे उतरे और दीपक की ओर बढ़े। उधर हांफता-हांफता राजू लाइनमैन के केबिन में जा पहुंचा। लाइनमैन ने राजू की बात सुन कर फौरन उस लाइन के हैंडिल को एक बार ऊपर करके फिर नीचे कर दिया। दीपक का पैर निकालने के लिए इतना समय बहुत था। उसका पैर बुरी तरह से जख्मी हो गया था लेकिन सबको संतोष था कि एक भयानक दुर्घटना टल गई थी। समीर ने ड्राइवर को धन्यवाद दिया। कुछ ही देर में रेलगाड़ी रेंगती हुई आगे बढ़ने लगी और धीरे-धीरे आंखों से ओझल हो गई।