मन की शांति का उपाय


किसी नगर में रहने वाले एक सज्जन गृहस्थ होकर भी साधुओं की तरह जीवन जीते थे। सभी लोग उनकी बड़ी प्रशंसा करते और संत की तरह सम्मान देते थे। एक दिन उन सज्जन ने अपने गुरु के पास जाकर कहा-‘गुरुजी, अब मैं इस दुनियादारी से पूरी तरह विरक्त होना चाहता हूं। मेरे मन में संन्यास लेने की इच्छा है।’ उन सज्जन के बेटे का नाम विवेक था। बेटी का नाम शांति और पत्नी का नाम था प्रेमा। उनकी बात सुनकर गुरुजी ने कहा-‘जब सब कुछ ठीक चल रहा है, जब व्यवहार में संन्यास है, तो वस्त्र संन्यास का आग्रह क्यों?’ सज्जन ने जवाब दिया-‘मैं शांति की तलाश में हूं। संन्यास से मेरे मन को शांति मिलेगी। घर-परिवार के बीच रहते हुए कभी-कभी सब कुछ गड़बड़ा जाता है।’ गुरुजी ने कहा-‘चलो, मैं तुम्हें संन्यास दिला दूंगा पर मेरी कुछ शर्तें हैं। भीतर झाड़ू लगाकर आना। शांति कहां मिलती है, इसको समझना। विवेक को अपने साथ लाना और प्रेम को सदैव बनाए रखना। क्या तुम ऐसा कर सकोगे?’ गुरुजी के मुख से इशारों-इशारों में अपने घर के तीनों सदस्यों के नाम सुनकर वह सज्जन चौंक गए। उन्होंने ध्यान से गुरुजी की बात का चिंतन किया तो उनकी समझ में आ गया कि यदि चित्त का भटकना बंद नहीं हुआ तो चाहे घर में रहो या संन्यासी बनकर किसी आश्रम में, मन में अशांति बनी ही रहेगी। मूल कारण भीतर है। बाहर से सिर्फ सहायता मिलती है। यह सोचने के बाद सज्जन जैसे थे, वैसे ही वापस अपने घर की ओर चल दिए। किसी ने सच ही कहा है कि मन की शांति के लिए इन्सान कहां-कहां नहीं भटकता। लेकिन यदि हम अपने मन को ही नियंत्रित नहीं कर सके, तो फिर हमारी शांति की तलाश व्यर्थ है। मन को वश में रखकर दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ पूर्ण निष्ठा व एकाग्रचित्त से हम शांति पाने का प्रयास करेंगे, तो अवश्य हमें इसमें सफलता मिलेगी।

—धर्मपाल डोगरा ‘मिंटू’