सीवर की हाथ से सफाई का मामला देश में जातिगत भेदभाव अभी भी जारी : सुप्रीम कोर्ट


नई दिल्ली, 18 सितम्बर (भाषा) : देश में सीवर नालों की हाथ से सफाई के दौरान लोगों की मृत्यु होने पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए उच्चतम न्यायालय ने कहा कि दुनिया में कहीं भी लोगों को मरने के लिए गैस चैंबर में नहीं भेजा जाता है। शीर्ष अदालत ने हाथ से मैला साफ करने की परंपरा पर तल्ख टिप्पणियां करते हुए कहा कि देश को आजाद हुए 70 साल से भी अधिक समय हो गया है लेकिन हमारे यहां जाति के आधार पर अभी भी भेदभाव होता है। सरकारे उनको प्रोजैक्ट करने में विफल रही है। न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा, न्यायमूर्ति एम आर शाह और न्यायमूर्ति बी. आर. गवई की पीठ ने केन्द्र की ओर से पेश अटार्नी जनरल के के वेणुगोपाल से सवाल किया कि आखिर हाथ से मल साफ करने और सीवर के नाले या मैनहोल की सफाई करने वालों को मास्क और ऑक्सीजन सिलैंडर जैसी सुविधायें क्यों नहीं मुहैया कराई जाती हैं। पीठ ने कहा कि आप उन्हें मास्क और ऑक्सीजन सिलैंडर क्यों नहीं उपलब्ध कराते? पीठ ने कहा कि संविधान में प्रावधान है कि सभी मनुष्य समान हैं लेकिन प्राधिकारी उन्हें समान सुविधायें मुहैया नहीं कराते। पीठ ने इस स्थिति को ‘अमानवीय’ करार देते हुये कहा कि इन लोगों को सुरक्षा के लिये कोई भी सुविधा नहीं दी जाती और वे सीवर और मैनहोल की सफाई के दौरान अपनी जान गंवाते हैं। शीर्ष अदालत ने अनुसूचित जाति/जनजाति कानून के तहत गिरफ्तारी के प्रावधान को लगभग हल्का करने के न्यायालय के पिछले साल के फैसले पर पुनर्विचार के लिए केन्द्र की याचिका की सुनवाई के दौरान अनेक तल्ख टिप्पणियां कीं। वेणुगोपाल ने पीठ से कहा कि देश में नागरिकों को होने वाली क्षति और उनके लिए जिम्मेदार लोगों से निबटने के लिए अपकृत्य कानून (लॉ ऑफ टॉर्ट) विकसित नहीं हुआ है और ऐसी घटनाओं का स्वत: संज्ञान लेने का मजिस्ट्रेट को अधिकार नहीं है। उन्होंने कहा कि सड़क पर झाडू लगा रहे या मैनहोल की सफाई कर रहे व्यक्ति के खिलाफ कोई मामला दायर नहीं किया जा सकता लेकिन उस अधिकारी या प्राधिकारी, जिसके निर्देश पर यह काम हो रहा है, उसको इसके लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।