भारत से घृणा कहीं पाकिस्तान को महंगी न पड़ जाए


इतिहास कभी-कभी ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देता है, जब लगता है कि पूरा समाज किसी एक मुद्दे पर एकजुट हो गया है। उसी समय कुछ विपरीत आवाज़ें भी दबी-छिपी उठती हैं। ऐसी आवाज़ें समाज कबूल नहीं करता, क्योंकि देश हित धर्म और राजनीति से बड़ा होता है। आज मुस्लिम समाज एक मामले में पाकिस्तान के रवैये के विरुद्ध खड़ा है। सऊदी अरब जहां इस्लाम धर्म का सबसे बड़ा तीर्थ मक्का और मदीना है। संयुक्त अरब अमीरात, दुबई, मस्कट, फिलिस्तीन इत्यादि सभी देश पाकिस्तान से इसलिए कट गए कि वह भारत से घृणा करते हुए यह भूल जाता है कि उसे किस हद तक जाना चाहिए। बेलगाम लफ्फाज़ी और शालीनता से कोसों दूर वाक्य आज उसे ऐसी हालत पर लाकर खड़ा कर गए हैं कि उसके जितने भी वज़ीर हैं, वो ऊट-पटांग और धमकी भरे बयान देते समय यह समझ लेते हैं कि मुस्लिम समाज उनकी बात को ध्यान से सुन रहा है, परन्तु ऐसा नहीं।  कई इस्लामिक स्कालर जो भारत में सुन्नी और शिया विचारों से ओत-प्रोत हैं, वे भी पाकिस्तान के इस बचकाना और गैर-ज़रूरी व्यवहार पर बोल रहे हैं। कश्मीर में एक अस्थायी धारा 370 को 70 वर्षों के बाद हटाया गया तो इसे भारत के अखंड होने के लिए एक शुभ शगुन माना गया, जिसकी प्रशंसा देश-विदेश में भी हुई। कोई भी देश भारत और पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता के लिए इसलिए नहीं आया क्योंकि पाकिस्तान की सोच नफरत से भरी हुई है। धारा 370 ने कश्मीर में राजनेताओं और साधारण जनता के बीच दीवार खड़ी कर दी। जब महबूबा मुफ्ती यह कहती हैं कि जो इस धारा को छेड़ेगा, वह जल जायेगा। यह कहती किस के लिए? कहा जाता है कि कश्मीर पर तीन परिवारों का राज रहता है। कभी अब्दुल्ला परिवार तो कभी मुफ्ती परिवार तो कभी गांधी परिवार। क्या इन राजनेताओं को जन-साधारण से कट जाने, मुस्लिम समुदाय में बेचैनी पैदा करने की यह कुचेष्टा लगता है सफल नहीं हो रही। फिर भी कुछ राजनेता जो मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए पहले से ही जग-जाहिर हैं, उनके  इशारों पर कुछ मुल्ला और मुस्लिम समाज के कुछ तथाकथित रहनुमां अदालतों का दरवाज़ा भी खटखटायेंगे। सड़कों पर भी कुछ लोगों को भड़काऊ और गुमराहकुन भाषण देकर ले आएंगे। कश्मीर की हालत यह है कि बेवजह खून-खराबा रोकने के लिए सरकार को कुछ ऐसे पग उठाने पड़े जो बहुत ज़रूरी माने गए। यहां एक बात हम और कह दें कि नौजवानों में विवेकशील तत्व हैं, जो हाशिये पर खड़े होने के बावजूद अमनपसंदों की भूमिका निभा रहे हैं। दूसरी तरफ पाकिस्तान के सेनापति कमर कमाल बाजवा और उनकी कठपुतली इमरान खान की नीति बल्कि बदनीति पाकिस्तान को परेशानी में डाले हुए हैं। कोई ऐसा कहने वाला इन लोगों को नहीं मिला जो समझा सके कि पाकिस्तान की हालत इतनी बिगड़ चुकी है। अब जंग और सत्याग्रह की बातें केवल आतंकवाद को ही आगे बढ़ाएंगी। यह सब जानते हैं कि आतंकवादी का जीवन बहुत थोड़ा होता है, फिर भी पाकिस्तान की आई.एस.आई., फौज और राजनेता आतंकवाद को पालते हैं और आगे बढ़ाते हैं। भारत ने साफ शब्दों में कहा कि सीमाओं पर छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं की जा सकती। इसे चेतावनी कहना जायज है, क्योंकि सीमा पर झड़पें बेकाबू होकर दोनों मुल्कों को जंग तक ले जा सकती हैं। सच तो यह है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा को नए सिरे से खींचने के मकसद से पाकिस्तान की शह पर हुई घुसपैठ से निबटने के लिए भारत को माकूल जवाब देना ही था। भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने एक बार प्रयास किया और नवाज़ शरीफ ने भी भारत की भावनाओं को आदर दिया। यह बात वहां के फौजी जरनैलों को हज़म न हुई। हालांकि जब तत्कालीन प्रधानमंत्री  अटल बिहारी वाजपेयी बस लेकर शांति प्रक्रिया का आगाज़ करने लाहौर गए तो जनरल परवेज़ मुशर्रफ ने कारगिल में घुसपैठ करवा कर शांति प्रक्रिया को पलीता लगा दिया। बाद में यही जनरल परवेज़ मुशर्रफ नवाज़ शरीफ का तख्ता पलट कर पाकिस्तान के तानाशाह बन गए।पाकिस्तान के हुक्मरान यह जानते हैं कि देश कोई भी हो, वहां कुछ लोगों में नाराज़गी तो रहती है, जिसका फायदा उठाने के लिए वे भारतीय मुसलमानों में जेहाद का नारा देकर अपनी सियासी रोटियां सेंकना चाहते हैं। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में कुछ छात्र ऐसे हैं, जो बात का बतंगड़ बनाना जानते हैं, क्योंकि सियासत यह बात अच्छी तरह जानती है कि कुछ नौजवान जज़बात में बह जाते हैं और फिर वो ऐसे पग उठा लेते हैं, जिसे कभी भी समाज और देश हित में नहीं कहा जा सकता। इसी प्रकार कुछ शिक्षित युवक आतंकवाद में शामिल हुए और अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए। दूसरी तरफ भारत कश्मीर सहित सेकुलर होने की अपनी ज़िम्मेदारी निभाता रहा और रहेगा। पाकिस्तान जब भी बातचीत की टेबल पर आया उसने कश्मीर को ‘शाह-रग’ ही कहा और एक ही एजेंडा कायम रखा कि हर हालत में बात कश्मीर पर ही होगी। अब भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा भी है कि बात तो कश्मीर पर होगी परन्तु जिस पर पाकिस्तान ने नाजायज़ कब्ज़ा कर रखा है, जो है तो गुलाम कश्मीर परन्तु उसे नाम दे रखा है आज़ाद कश्मीर। पाकिस्तान पीपल्स पार्टी के अध्यक्ष बिलावल भुट्टो ज़रदारी ने यह बात मीडिया के सामने खुल कर कही कि पाकिस्तान पहले कहता रहा कि श्रीनगर को लेना है, परन्तु अब कह रहा है मुज़फराबाद को बचाना है, जो पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की राजधानी है। हम यही तो कहते हैं कि पाकिस्तान अकलमंदी के नाखून ले और अपने लोगों की हालत सुधारने के लिए विकास की ओर कदम बढ़ाए। कश्मीर सड़क पर पड़ा झुनझुना नहीं जिसे वो लेकर अपने लोगों को दिखा सकेगा। यदि जंग हुई तो पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर जिस पर भारत अपना दावा करता है वह भी छिन सकता है। यह बात दूसरे मुस्लिम देशों को समझ में आ गई, परन्तु इमरान और उसकी हां में हां मिलाने वाले वज़ीरों को समझ नहीं आ रही, तभी तो हम कहते हैं कि कहीं भारत से घृणा पाकिस्तान को महंगी न पड़ जाए।