कोरोना और एन.आर.आई. भाई

इस बात में कोई संदेह नहीं कि कोरोना एक महामारी के रूप  में दिन ब दिन विस्तार पाता जा रहा है और विनाश लीला की तरफ बढ़ता चला जा रहा है। कभी महामारी के रूप में प्लेग  ने गांवों के गांव साफ कर दिए थे। आज कोरोना वायरस की ब्याधि ऐसे बुरे दिनों की याद दिला सकती है। पूरी दुनिया में लाखों लोग संक्रमित हो चुके हैं, जिसमें अमीर-गरीब, ऊंचे-नीच का कोई फर्क नहीं पड़ा। साधन सम्पन्न, साधनहीन किसी को भी नहीं बख्शा गया। अकेले भारत में संक्रमित लोगों की संख्या डेढ़ लाख से पार हो चुकी है। आजकल लगभग 5 हज़ार से अधिक मरीज़ रोज संक्रमित को रूप में रिपोर्ट हो रहे हैं। जिसका मतलब है नियंत्रण जैसा कोई उपाय हमारे पास तसल्ली देने लायक नहीं है। यह ठीक है कि परेशानी, असंमजस और दहशत के दिनों हमें अफवाहें और भ्रमपूर्ण घटनाएं ज्यादा दिक्कत देती हैं परंतु ऐसे हालात में आंखें खुली रखना और विवेक बनाए रखना बहूत जरूरी होता है। नहीं तो पूर्व अपूर्व में काफी नुकसान उठाना पड़ सकता है। पंजाब में कोरोना वायरस के विस्तार के लिए एन.आर.आई. मित्रों को दोषी ठहराना और उनकी बाबत निंदनीय प्रचार इसी तरह का है। होता यह है कि ऐसे वक्त में हम तस्वीर का केवल एक ही रुख देख रहे होते हैं, अन्य पक्ष नज़रों से ओझल रहते हैं। मीडिया में मार्च (2020) के तीसरे सप्ताह में यह खबर काफी जोरशोर से उठाई गई कि पंजाब में एक ही महीने में सत्तर-अस्सी हज़ार एन.आर.आई. विभिन्न देशों से पंजाब आए हैं। वे आम तौर पर इधर-उधर छिप रहे हैं और टैस्ट करवाने के लिए खुद को प्रस्तुत नहीं कर रहे। इससे इस महामारी के विस्तार का खतरा बढ़ गया है। फिर पंजाब की पुलिस को श्रेय दिया गया कि पुलिस उनमें से इतने-इतनों को खोज पाने में सफर रही। बाकी लोगों से निवेदन है कि वे खुद सामने आयें ताकि टैस्ट होने का बाद उपचार किया जा सके। सोचा कि व्यवस्था ने एन.आर.आई. मित्रों को एक ही सांस में संवेदनहीन, अनैतिक, कानून को नहीं मानने वाले और दूसरों की जान के बारे में लापरवाह घोषित कर दिया। बगैर यह सोचे समझे कि आपका दिया गया ऐसा फतवा उन्हें कितना आहत कर सकता है। पल भर के लिए भी यह नहीं सोचा को जिन लोगों के बारे में आप यह सब कह रहे हैं, जगह-जगह इसकी चर्चा कर रहे हैं, उन्होंने शुरू से लेकर आज तक पंजाब को आर्थिक मोर्चे पर कितना लाभ पहुंचाया है। दिन-रात एक करके कड़ी मेहनत के बाद विदेशियों को भेदभाव की नीति सह कर कुछ पौंड, डालर बचा कर पंजाब भेजे हैं, जिससे हमारा विकास मार्ग प्रशस्त हुआ है। दूसरे विदेशी धरती पर रहते हुए अगर वे कुछ कमा पाए हैं तो वहां के कानून-नियमों का पालन करते ही।  वहां के कानून का पालन करते हुए ही वे नाम और दाम कमा पाये हैं तथा इस तरह पंजाब और पंजाब के साथ पूरे भारत का सम्मान बरकरार रखा और आज हम उन पर लांछन का कीचड़ फेंक रहे हैं, बिना सोचे समझे। जहां तक हाईजीन का प्रश्न है-एक  एन.आर.आई. व्यक्ति पंजाब के एक आम नागरिक से ज्यादा सजग और व्यवहार सिद्ध होगा। हमारे गिनती के फाइव स्टार होटलों को छोड़ कर अन्य आम अस्पतालों की दशा देखो, जिनमें सिविल अस्पताल भी हैं, एक सामान्य मरीज को वहीं टायलट इस्तेमाल करना होगा, जिसे पहले से ही पन्द्रह-बीस लोग इस्तेमाल कर रहे हैं, जिनका वाशबेसन पुराना और गंदा होगा। ऐसे अस्पताल में जाने और यहां स्वास्थ्य लाभ करने की जगह एक एन.आर.आई. क्यों नहीं छुप कर रहना पसंद करेगा? यहां यह नहीं कहा जा रहा कि अपने-आप को ट्रीटमैंट के लिए प्रस्तुत करना या चैकअप नहीं करवाना कोई सेहतमंद बात है। परंतु अस्पतालों की दशा और खराब परिस्थितियों में डाक्टरों, नर्सों का कार्य क्षेत्र भी परेशानी का सबब बन सकता है। कोरोना वायरस के विस्तार की वजह कई जगह एन.आर.आई. भी बने हैं। जहां उनके पूरे परिवार को यह दंड झेलना पड़ा है। पूरे का पूरा परिवार पाज़िटिव हुआ है। इसे अज्ञानता, लापरवाही या अल्पज्ञता कहा जा सकता है परन्तु इसे डगर-ए-कल्त तो नहीं कहा जा सकता। इसकी सज़ा पूरी की पूरी एन.आर.आई. बिरादरी को भी नहीं दी जा सकती। इन पंक्तियों के लेखक के पास विदेशों से फोन आए हैं कि हमें बुरी तरह बदनाम किया जा रहा है। क्या हम सचमुच अपराधी हो गए हैं? हमारी मेहनत, हमारी देन को पूरी तरह खारिज किया जा रहा है। क्या यह ठीक है? हमें इतिहास के सामने शर्मिंदा होना पड़ेगा?