..ताकि हिरासत में कोई अस्वाभाविक मौत न हो !


.सर्वोच्च न्यायालय ने हिरासत में हिंसा और अप्राकृतिक मौताें पर अपनी चिंता जताते हुए हाल ही में यह स्पष्ट कर दिया है कि जेलों में भी कैदियों को अनुच्छेद 21 के तहत जीने के अधिकार को सुनिश्चित किया जाए। अपना फैसला सुनाते हुए अदालत ने पुलिस को यह हिदायत दी कि अपना काम करते हुए उसे यह बात याद रखने की ज़रूरत है कि किसी नागरिक के हिरासत में रहने के बावजूद संविधान की धारा-21 के तहत उसको कुछ मौलिक अधिकार हासिल हैं और उसके साथ पुलिस को बदसलूकी से पेश आने का कोई हक नहीं है। अदालत का इस बारे में साफ  कहना था कि सूचना हासिल करने के लिए हिरासत में थर्ड डिग्री का इस्तेमाल मनोवैज्ञानिक हिंसा का रूप है। इससे निपटने के लिए जेल सुधार की ज़रूरत है। अदालत ने इस संबंध में केंद्रीय गृह मंत्रालय को 31 अक्तूबर तक मॉडल जेल मैन्युअल, जेलों में आत्महत्याएं रोकने पर एनएचआरसी की रिपोर्ट, सरकार की विभिन्न एडवायजरी जारी करने का भी आदेश दिया है। अदालत यहीं नहीं रुक गई, बल्कि उसने तमाम राज्यों के पुलिस महानिदेशकों को जेल में नेल्सन मंडेला रूल्स और हिरासत में मौतों की जांच के बारे में इंटरनेशनल रैड क्रॉस कमेटी की ओर से जारी दिशा-निर्देशों का कड़ाई से पालन करने का निर्देश दिया। ताकि जेल में कोई अस्वाभाविक मौत न हो। हिरासत में हुई अप्राकृतिक मौतों पर अदालत इस कदर खफ ा थी कि उसने देश के सभी हाईकोर्टों को निर्देश दिया कि वे स्वत: संज्ञान लेकर उन कैदियों के नज़दीकी रिश्तेदारों का पता करें, जिनकी मौत नेशनल क्राईम रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक साल 2012 से लेकर 2015 के बीच अस्वाभाविक रूप से हुई है। पीड़ितों का सिर्फ  पता ही नहीं किया जाए, बल्कि उन्हें उचित मुआवजा भी दिलाया जाए। जाहिर है कि अदालत का यह आदेश कैदियों के मानवाधिकारों के पक्ष में है। अपने इस आदेश में अदालत ने सरकारों को याद दिलाया है कि कैदी भी आखिर इंसान हैं और उनके भी मानवाधिकार हैं। जिनकी कोई अवहेलना नहीं कर सकता। 
जस्टिस मदन बी. लोकुर और जस्टिस दीपक गुप्ता की पीठ, देश की 1382 जेलों में अमानवीय स्थिति मामले की सुनवाई कर रही थी। सर्वोच्च न्यायालय में इस मामले की सुनवाई पूर्व प्रधान न्यायाधीश आरसी लाहोटी की ओर से जेलों में अमानवीय स्थिति पर प्रधान न्यायाधीश को भेजे गए पत्र पर शुरू हुई थी। पत्र में जस्टिस लाहोटी ने जेलों में ज़रूरत से ज्यादा कैदी, कैदियों की अस्वभाविक मौतों, स्टाफ  की कमी और उपलब्ध स्टाफ के अप्रशिक्षित या कम प्रशिक्षित होने का मुद्दा उठाया था। बहरहाल मामले की सुनवाई के बाद अदालत ने जेल सुधारों के बारे में विस्तृत दिशा-निर्देश जारी करते हुए सभी राज्य सरकारों को कैदियों, खास तौर पर पहली बार अपराध करने वालों की काऊंसलिंग के लिए काऊंसलर और सहायक व्यक्तियों की नियुक्त का आदेश दिया। गरीब, विचाराधीन और सज़ायाफ्ता कैदियों के लिए वकीलों की नियुक्ति हो। कैदियों को सभी जरूरी चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराई जाए। चिकित्सा का अधिकार जो कि मानवाधिकार है, इसे कैदियों के साथ-साथ सभी के लिए हकीकत बनाया जाए। अदालत ने कर्नाटक, पश्चिम बंगाल और दिल्ली की जेलों में कैदियों को मिलने वाली चिकित्सा सुविधा पर चिंता जताते हुए कहा कि चिकित्सा सुविधा नहीं मिल पाना, कैदियों की अस्वाभाविक मौत की एक वजह है। जेलों में कैदियों को रिश्तेदारों से ज्यादा देर तक मिलने के साथ-साथ फ ोन और वीडियो कांफ्रें सिंग के जरिए बात करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। कैदियों को उनके वकीलों से भी बात करने का पर्याप्त मौका देना चाहिए। अदालत ने इसके साथ ही महिला और बाल विकास मंत्रालय से जवाब तलब करते हुए कहा कि बाल संरक्षण संस्थानों में हिरासत में या संरक्षण और देखभाल की ज़रूरत की खातिर रखे गए बच्चों की अस्वाभाविक मौत क्यों हो रही है ? क्या बच्चों की अस्वाभाविक मौत उनकी देख-रेख में कमी या दूसरी वजहों से हो रही है ? यदि किसी की अस्वाभाविक मौत हुई हो, तो राज्यों से परामर्श करके इस बारे में आंकड़े और ब्योरा रखने की प्रक्रिया 
तय करें। 
देश में अक्सर ऐसे मामले सामने आते रहते हैं, जिनमें किसी आरोप में पकड़े गए व्यक्ति को सच उगलवाने के नाम पर इतनी यातनाएं दी गईं कि उसकी जान तक चली गई। जो लोग पुलिस की भयानक यंत्रणाओं के बावजूद किसी तरह बच जाते हैं, वे भी उम्र भर के लिए शारीरिक तौर पर अक्षम हो जाते हैं, या फि र उनका मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है। यातना का शिकार व्यक्ति सामान्य ज़िंदगी जी पाने के काबिल नहीं रहता। हिरासत में यातना पर रोक लगाने के लिए कहने को हमारे देश ने आज से करीब डेढ़ दशक पहले संयुक्त राष्ट्र के ‘यातना उन्मूलन’ समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। लेकिन दीगर वचनबद्धताओं की तरह, यह अभी तक कागजी रजामंदी से ज्यादा कुछ नहीं है। हिरासत में होने वाली मौतों की समस्या से निपटने के लिए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और सुप्रीम कोर्ट के पर्याप्त दिशा-निर्देश मौजूद हैं। इन दिशा-निर्देशों के आधार पर दोषी पुलिसकर्मियों पर तत्काल कार्रवाई की जाती है। सीआरपीसी की धारा 176 में संशोधन करके यह व्यवस्था की गई है कि पुलिस हिरासत के दौरान किसी व्यक्ति की मौत, लापता होने या किसी महिला के साथ दुष्कर्म की स्थिति में मामले की न्यायिक जांच अनिवार्य होगी। मौत के मामले में लाश का पोस्टमार्टम 24 घंटे के अंदर करवाना होगा। बावजूद इसके पुलिस हिरासत में अपमानित करना, यातनाएं देना और उसके चलते होने वाली मौतों का सिलसिला थमा नहीं है, बल्कि यह और भी ज्यादा बढ़ा है। देश के अलग-अलग हिस्सों से आए दिन इस तरह की खबरें आती ही रहती हैं। 
जब भी हिरासत में कहीं कोई मौत होती है, तो कुछ दिन ये बात मीडिया में उठती है। मानवाधिकार आयोग इसे अपने संज्ञान में लेता है। लेकिन दोषियों पर कोई ठोस कार्यवाही हुए बिना मामला जल्द ही ठंडा पड़ जाता है। जाहिर है कि जेलों में कैदियों की दुर्दशा का मसला अकेले सिर्फ  जेल सुधार और न्यायिक सुधार से ही जुड़ा हुआ नहीं है, बल्कि इसके लिए सरकार को भी बड़े पैमाने पर पुलिस सुधार करने होंगे। बिना पुलिस सुधार के, इस तरह की आपराधिक प्रवृतियों में कोई कमी नहीं आएगी। पुलिस सुधार के लिए उच्चतम न्यायालय के निर्देशों को आए कई साल हो गए, मगर इस बाबत कुछ भी नहीं हुआ है। 
सोराबजी समिति ने अपनी रिपोर्ट में, भारतीय पुलिस के अंदर आधारभूत सुधार के लिए कई महत्वपूर्ण सिफारिशें सुझाई थीं, लेकिन अफ सोस ! सत्ता में बैठे लोगों की दिलचस्पी इस बात में जरा सी भी नहीं दिखलाई देती कि कैसे पुलिस को संवेदनशील और जवाबदेह बनाया जाए? इस मामले में सरकारों का रवैया हमेशा टालमटोल का रहा है। पुलिस अपने अधिकारों का दुरुपयोग कर रही है, इस निष्कर्ष के बार-बार रेखांकित होने के बावजूद न तो राज्य सरकारें पुलिस सुधारों के लिए इच्छुक हैं और न ही केंद्र सरकार। सर्वोच्च न्यायालय के हालिया फैसले के बाद उम्मीद बंधी है कि न सिर्फ  अब देश में जेल सुधारों की दिशा में तेज़ी से काम होगा, बल्कि हिरासत में होने वाली मौतों में भी कमी आएगी। 

-महल कॉलोनी, शिवपुरी (म.प्र.)
मो.  94254 89944