पानी बचाने वाला फरिश्ता


 

आबिद सुरती। यह नाम लेते ही हमें पिछली सदी में 70 और 80 के दशक में छपने वाली हिंदी की विख्यात पत्रिका ‘धर्मयुग’ के पिछले पन्ने में छपने वाला ढब्बू जी का किरदार याद आ जाता है। जिसके रचयिता आबिद सुरती थे। आबिद सुरती को फादर ऑफ  इंडियन कॉमिक्स कहा जाता है। कॉमिक्स की दुनिया में उन्होंने पिछली सदी के 70 के दशक में अपने किरदारों की बदौलत धूम मचा दी थी। उन्होंने बेहतरीन कार्टून किरदार रचने के साथ-साथ कहानियां, नाटक और फीचर फिल्में भी लिखी हैं। वह शायर भी हैं। लेकिन मुंबई के बाहर के लोगों को शायद कम ही पता हो कि वह इन सबके अलावा एक बेहद सक्रिय एक्टिविस्ट भी हैं। जी, हां! वह पानी बचाने वाले किसी फरिश्ते के माफिक हैं। 
आबिद को आप मुंबई की गलियों में यह संदेश देते देख सकते हैं, ‘पानी की बूंद-बूंद बचाओ या मारे जाओ’। उन्हें मुंबई के मीरा रोड इलाके में इतवार के दिन अकसर एक प्लंबर के साथ सोसायटियों में घूमते देखा जा सकता है, जहां वह लोगों के नल ठीक करने जाते हैं। पानी बचाने के अपने इस अभियान के जुनून के बारे में वह बताते हैं, ‘उन्होंने अपने बचपन में मुंबई वासियों को पानी की एक-एक बूंद के लिए परेशान होते देखा है।’ वह आजकल मीरा रोड के जिस छोटे से फ्लैट में रहते हैं, वहां भी पानी दस मिनट के लिए ही आता है। लेकिन फर्क बस यह है कि बचपन में पानी भरने के लिए वह बाल्टी लेकर एक लंबी कतार में खड़े होते थे, लेकिन अब अपने घर में उन्हें पानी मुहैय्या हो जाता है। 
पानी की कमी से बचपन में जूझने के कारण वह जब भी किसी के घर जाते हैं और वहां किसी नल से अनावश्यक रूप से पानी को टपकते देखते हैं तो उनके दिलो-दिमाग में खलबली मच जाती है। दरअसल वह पानी की इस तरह की बर्बादी देख नहीं सकते। आखिर वह पानी को लेकर इतने संवेदनशील क्यों हैं? इस सवाल पर वह कहते हैं, ‘पानी की किल्लत बचपन में तो देखी ही थी, लेकिन एक दिन जब  अखबार में पढ़ा कि बूंद-बूंद टपकने वाले नल से एक महीने में लगभग एक हजार लीटर पानी बर्बाद हो जाता है तो मन बैचेन हो गया। तभी से ठान लिया कि कैसे भी हो, जहां तक भी संभव हो, पानी की एक-एक बूंद बचानी है।’ 
उनके इस विचार को व्यवहारिक रूप देने में उन्हें एक प्लंबर और अपनी एक ग्राफिक डिजाइनर दोस्त तेजल का सहयोग मिला। दरअसल एक टीम के चलते ही वह सोसायटियों में लोगों के घर तक आसानी से पहुंच जाते हैं और उनके टपकते नलों को सही कर पाते हैं। अगर साथ में कोई महिला और एक प्लंबर न हो तो लोग पता नहीं उनके आने का क्या प्रयोजन समझें? बहरहाल आबिद लोगों के नल बिल्कुल मुफ्त में सही करते हैं। इसके लिए वह इतवार के एक दिन पहले ही किसी सोसायटी को चुन लेते हैं और वहां जाकर सोसायटी कमेटी के मुखिया से मिलते हैं। वह उन्हें प्रस्ताव देते हैं कि वह उनकी सोसायटी के किसी भी घर में टपकते हुए नल को बिल्कुल मुफ्त में सही करना चाहते हैं। भला हिंदुस्तान में मुफ्त में कोई सेवा लेने से क्यों इंकार करेगा? फिर भी उनके मुताबिक, ‘ शुरु में कुछ सोसायटी वालों को इस तरह के  प्रस्ताव से बड़ी असहजता होती थी, शायद उनके दिल-दिमाग में कुछ आशंकाएं होती थीं, उन्हें लगता था कि शायद इसके पीछे मेरा कोई बड़ा स्वार्थ छिपा है। कई बार तो लोग मना भी कर देते थे। लेकिन तब मैं हिंदू सोसायटी हुई तो वेद पुराणों का सहारा लेता था और मुस्लिम हुई तो कुरआन का। मैं लोगों से कहता उनके धर्म ग्रंथ में पानी को बचाना बहुत बड़ा पुण्य का काम लिखा है। इससे लोग नल सही करा लेते।’ 
तो इस तरह से लोग उनकी सहायता करने के लिए आगे बढ़कर आते हैं। आबिद ने अपने इस अभियान की शुरुआत सन 2007 में अंतर्राष्ट्रीय जल वर्ष के मौके पर की। यह भी संयोग ही था कि इसी साल उन्हें उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा हिंदी साहित्य संस्थान के पुरस्कार के लिए चुना गया था। इससे प्राप्त एक लाख रुपये की पुरस्कार राशि को भी उन्होंने अपने इस अभियान में खर्च कर दिया। इस पैसे को उन्होंने अपनी वन मैन एनजीओ का लोगो बनवाने, परचे छपवाने, टी शर्ट बनवाने और प्लम्बर की सैलरी में खर्च किया। यह करना इसलिए भी जरूरी था ताकि उनकी एनजीओ ‘ड्रॉपडेड’ को लोग आसानी से पहचान सकें। 
शुरु में उन्हें इस काम में थोड़ी कठिनाई हुई थी लेकिन बाद में उन्हें लोगों का भरपूर स्नेह और प्यार मिलने लगा। जिसमें उन्होंने काम को निरंतर जारी रखने की ऊर्जा को आज भी बरकरार रखा है। 2007 में जब उन्होंने अपने इस अभियान की शुरुआत की थी, मीरा रोड में उन्होंने 1533 घरों का निरीक्षण किया। 384 बहते नल ठीक किए और लगभग 3.84 लाख लीटर पानी बचाया। 
लेकिन पानी वाले फरिश्ते से पहले वह एक पेंटर के साथ-साथ साहित्यकार हैं। उन्होंने काली किताब जैसी एक अद्वितीय रचना लिखी है तो दूसरी ओर दलदल जैसे लोकप्रिय मडर्र मिस्ट्री भी। बड़े घर की बहू जैसा उपन्यास 72 साल का बच्चा जैसी कॉमेडी भी उन्होंने ही लिखी है। आबिद में लेखन की अद्भुत क्षमता है। आबिद ने आदमखोर, बहता पानी, चमत्कारी लड़की जैसे उपन्यास भी लिखें हैं। इस सबके बीच उनका रचा गया ढब्बू जी का किरदार, एक ऐसा किरदार है जिसने उन्हें  कॉमिक्स की दुनिया का शहंशाह बनाया। वह बताते हैं, ‘ढब्बू जी का मूल नाम बटुक भाई था जिसे मैंने चेत मछिंदर नाम की एक गुजराती पत्रिका के लिए बनाया था। यह अलग बात है कि बटुक भाई का किरदार गुजराती भाईयों को पसंद नहीं आया। इसलिए उस पत्रिका ने कुछ दिनों के बाद इसे छापना बंद कर दिया।’