शिरोमणि कमेटी का गलत फैसला


पिछले दिनों प्रसिद्ध पत्रकार श्री कुलदीप नैय्यर की ओर से गुरमीत राम रहीम के संबंध में एक लेख लिखा गया था। उनकी ओर से इसमें संत जरनैल सिंह भिंडरावालों का ज़िक्र किया गया एवं उस समय की राजनीति के साथ उनका संबंध जोड़ने का यत्न भी किया गया तथा एक प्रकार से सैद्धांतिक रूप में उनके अमलों एवं विचारों से मतभेद व्यक्त किए गए। एक बड़े एवं परिपक्व पत्रकार के अपने विचार होते हैं, उनसे सहमति अथवा असहमति व्यक्त की जा सकती है, यदि किसी की सैद्धांतिक विचारधारा भिन्न हो तो उनकी ओर से  ऐसे लेख अथवा बयान की आलोचना भी की जा सकती है।  कुछ समाचार पत्रों में इस लेख के प्रकाशित होने के बाद ऐसी प्रतिक्रिया प्रकट भी की गई एवं कुछ लोगों और संस्थाओं की ओर से एक प्रकार से उनके प्रति धमकीपूर्ण लहज़ा भी अपनाया गया। फिर भी असहमति प्रकट करने वालों की ऐसी प्रतिक्रिया को हम ़गैर-वाजिब नहीं समझते परन्तु इस लेख को लेकर जिस प्रकार की प्रतिक्रिया शिरोमणि  गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी  की ओर से व्यक्त की गई है तथा जिस प्रकार का स्टैंड सिखों की इस धार्मिक संस्था ने लिया है, वह न तो वाजिब है तथा न ही एक महान संस्था से ऐसी प्रतिक्रिया की उम्मीद की जा सकती है। यदि कमेटी के प्रधान स. किरपाल सिंह बडूंगर एवं उनके कुछ साथियों को श्री कुलदीप नैय्यर के लेख पर आपत्ति है तो वे अपनी आपत्ति श्री कुलदीप नैय्यर को पहुंचा सकते थे। यदि पंजाब में आठवें एवं नौवें दशक के दौरान घटित घटनाक्रम की बात की जाए तो इस संदर्भ में किसी को भी बरी नहीं किया जा सकता। उस समय के दौरान बहुत दुखद एवं गलत क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं के क्रम में घटित होता रहा है। श्रीमती इन्दिरा गांधी की ओर से दरबार साहिब पर सैनिक हमला किसी भी सूरत में जायज़ नहीं ठहराया जा सकता। हम सदैव इस कार्रवाई के बड़े विरोधी रहे हैं परन्तु इसके अतीत को देखते हुए जो कुछ, जितना कुछ एवं जिस प्रकार का घटना-क्रम घटित होता रहा है, उसके लिए किसी भी एक पक्ष को बरी नहीं किया जा सकता तथा इतिहास के इस कटघरे में सभी पक्ष खड़े हैं, परन्तु हम यह अवश्य समझते हैं कि घटित हुए इस दुखांत ने जहां सिख भाईचारे का बड़ा नुक्सान किया है, वहीं सिखी सिद्धांतों का भी बहुत ह्रास हुआ है। अतीत में इस समूचे घटनाक्रम को देखते हुए शिरोमणि कमेटी जैसी संस्था की ओर से ़गैर-ज़रूरी प्रतिक्रिया प्रकट करना शोभा नहीं देता। शिरोमणि कमेटी सिखों की एक निर्वाचित संस्था है, जिसका कार्य ऐतिहासिक गुरुद्वारों की सेवा-सम्भाल करना, सिखी सिद्धांतों का प्रचार करना, समूचे समाज को ज्ञान की रोशनी देने का यत्न करना एवं उसको उच्च कद्रों-कीमतों के पथ पर अग्रसर करना तो  हो सकता है परन्तु ऐसे विवादों को तूल देना कदापि उसका कार्य नहीं 
हो सकता। 
शिरोमणि कमेटी के प्रधान एक सुलझे हुए व्यक्ति हैं। उन्हें सिख इतिहास का अच्छा ज्ञान है। वह सिख कद्रों-कीमतों के लिए सदैव वचनबद्ध रहे हैं। इसलिए उनके नेतृत्व में कार्य कर रही इस संस्था की ओर से ऐसी प्रतिक्रिया प्रकट करने की आशा नहीं की जा सकती। हमारा श्री कुलदीप नैय्यर  के लेख के साथ सहमत होना ज़रूरी नहीं। हम इसे ठीक भी नहीं ठहराना चाहते परन्तु जहां तक इस परिपक्व एवं प्रमुख पत्रकार का संबंध है, इसने सदैव पंजाबियत एवं सिखी सिद्धांतों की बात की है। जब भी पंजाब एवं सिख समाज को कोई चुनौती मिली है, तो श्री नैय्यर ने डट कर सिख समाज का साथ दिया है। श्री नैय्यर ने पंजाबी सूबा के संघर्ष में भी सदैव अतिरिक्त सकारात्मक भूमिका अदा की एवं सिख पंथ के मामलों को सदैव दिल्ली में सत्तारूढ़ क्षेत्रों में दृढ़ता के साथ पेश किया। उन्होंने इन्दिरा गांधी की ओर से दरबार साहिब पर किये गये हमले का भी डटकर विरोध किया था तथा इस संबंध में एक पुस्तक भी लिखी थी। 1984 में जब सिखों को देश की राजधानी एवं अन्य स्थानों पर चुन-चुन कर मारा गया था, तो श्री नैय्यर तथा उनके अनेक साथियों ने इसके लिए हाअ का नारा ही नहीं मारा, अपितु मैदान में उतर कर कांग्रेस की ओर से करवाये गये इस भयानक कृत्य को नंगा किया एवं डटकर इसकी आलोचना की। उस समय बहुत से सिख एवं गैर-सिख बुद्धिजीवियों की ओर से सिख नर-संहार की जांच के लिए सिटीजन्स फॉर जस्टिस कमेटी, पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़, पीपल्स यूनियन फॉर डैमोक्रेटिक राईट्स आदि संगठन बनाये गए थे। इन संगठनों में श्री कुलदीप नैय्यर तथा राजेन्द्र सच्चर की भूमिका अत्यधिक अहम रही थी। उक्त संगठनों ने दिल्ली में हुए सिखों के नरसंहार के संबंध में बड़े परिश्रम एवं लगन के साथ सभी तथ्य इकट्ठे करके ‘दोषी कौन हैं?’ तथा कई अन्य रिपोर्टें प्रकाशित की थीं। इनमें नर-संहार करवाने वाले अधिकतर कांग्रेसी नेताओं के नाम नशर किये गये थे। इन रिपोर्टों का बाद में निरन्तर बनाये गए कमिशनों एवं अदालतों में भी हवाला दिया जाता रहा है। इसके बाद पंजाब को न्याय दिलाने एवं समय की कांग्रेस सरकार की ओर से पंजाब में की जा रही ज्यादतियों के संबंध में देश के लोगों को अवगत करवाने के लिए श्री नैय्यर के यत्नों से श्री इन्द्र कुमार गुजराल, श्री राजिन्द्र सच्चर, जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा, एयर मार्शल अर्जन सिंह, जस्टिस नरूला एवं अन्य अनेक सिख एवं ़गैर-सिख बुद्धिजीवियों को साथ लेकर पंजाब ग्रुप कायम किया गया था, जिसने निरन्तर पंजाब के हकों एवं हितों की रक्षा के लिए आवाज़ उठाई। उस समय दिल्ली में पंजाब ग्रुप का एक विशेष प्रभाव था। देश के विभाजन के समय मारे गए लाखों पंजाबियों का दर्द भी कुलदीप नैय्यर के सीने में सदैव बना रहा है। इसी कारण वह इस क्षेत्र में सदैव अमन एवं सद्भावना के लिए यत्नशील रहे हैं। अपनी ज़िंदगी के बड़े हिस्से को सिख समाज एवं पंजाबियत हेतु प्रतिबद्ध बनाये रखने वाले इस विश्व प्रसिद्ध पत्रकार के साथ शिरोमणि कमेटी जैसी संस्था का ऐसा व्यवहार शोभा नहीं देता। श्री नैय्यर को अपनी ज़िंदगी में अनेक मान-सम्मान मिले हैं। उन्हें ये सम्मान उनकी लेखनी एवं सदैव उनकी ओर से कायम रखी गई अच्छी सक्रियता के लिए दिए गए हैं। चाहे उन्होंने कभी भी ऐसे सम्मानों को अधिक महत्व नहीं दिया। यदि शिरोमणि कमेटी ने किसी समय उन्हें ऐसा मान-सम्मान दिया है, तो यह उनकी ज़िंदगी की उपलब्धियों के दृष्टिगत दिया गया है। इसे वापिस लेने की घोषणा करके शिरोमणि कमेटी ने अपनी प्रतिबद्धता एवं कद-बुत को कम किया है, क्योंकि कुलदीप नैय्यर अपने अच्छे कार्यों एवं श्रेष्ठ लेखनी के लिए सदैव याद रखे जाने वाले पत्रकारों की सूची में बने रहेंगे।

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द