शैक्षणिक अवसान पर अंकुश लगाने के लिए  ठोस योजना की ज़रूरत


पंजाब की नई सरकार के लिए अनेक मोर्चों पर बहुत बड़ी चुनौतियां दरपेश हैं। इन पर काबू पाना अत्याधिक कठिन ही नहीं अपितु जोखिम भरा कार्य है। नई सरकार के पास लगभग खाली खज़ाना है। इसलिए उसे अपनी आर्थिकता को मजबूत करने एवं प्रदेश के लोगों को मूलभूत सेवाएं संतोषजनक ढंग से उपलब्ध कराने के लिए अत्याधिक कठिन दौर से गुज़रना पड़ेगा। मूलभूत सेवाओं में शिक्षा का क्षेत्र बहुत अहम माना जाता है। नई सरकार के लिए यह आवश्यक है कि शिक्षा के आधारभूत ढांचे को विशेष योजना के साथ मजबूत बनाया जाए। 
आज सरकारी स्कूलों की स्थिति कई पक्षों से बहुत दयनीय दिखाई देती है। स्कूलों में अध्यापकों की कमी खटकती है। प्रदेश में सैकड़ों ऐसे प्राइमरी स्कूल हैं जिनमें एक ही अध्यापक  सम्पूर्ण कार्य चला रहा है जबकि किसी एक स्कूल में पढ़ाये जाने वाले विषय न्यूनतम 6 होते हैं। इनमें पंजाबी, हिन्दी, अंग्रेज़ी, गणित एवं सामाजिक शिक्षा आदि शामिल होते हैं। केन्द्र सरकार की मदद से जो सर्व शिक्षा अभियान शुरू किया गया था, उसमें भी अवसान उभरते दिखाई दे रहा है। वर्ष 2011-12 में विद्यार्थियों की संख्या 20 लाख से अधिक थी जो वर्ष 2015-16 में 18 लाख से भी कम हो गई। इसकी अपेक्षा प्रदेश के दूसरे गैर-सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या बढ़ती जा रही है। अधिकतर अभिभावक आर्थिक विवशताओं के बावजूद अपने बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ाने हेतु अधिमान दे रहे हैं। आज पंजाब के सरकारी स्कूलों में मिडल श्रेणियों की स्थिति यह है कि सैकड़ों स्कूल ऐसे हैं जहां तीन अध्यापक सम्पूर्ण कार्य चलाते हैं। कई स्कूलों में अपनी इमारतें ही नहीं। सैकड़ों प्राइमरी स्कूलों में सिर्फ एक ही कमरा है। बहुत से स्कूलों में पीने वाले पानी एवं शौचालय की कमी है। अनेक स्कूलों में खेल के मैदान नहीं हैं। बच्चों के बैठने के लिए फर्नीचर की कमी है। केन्द्र सरकार की ओर से स्कूलों में आठवीं तक के बच्चों को फेल न करने की अपनाई गई नीति के कारण बड़ी श्रेणियों में बिना परीक्षा दिए जाने वाले बच्चों की पढ़ाई का स्तर बहुत निम्न रह जाता है। चाहे केन्द्र सरकार ने स्कूलों में मिड-डे-मील की प्रथा को जारी रखा है, बच्चों को मुफ्त पुस्तकें भी प्रदान की जाती हैं, परन्तु बहुत से अध्यापकों की आसामियां न भरे जाने के कारण तथा महीनों तक पाठ्य पुस्तकों की कमी रहने के कारण इन बच्चों की पढ़ाई पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा है। कई प्राइमरी स्कूल बच्चों की कमी के कारण बंद हो रहे हैं। इन स्कूलों का विलय अन्य निकटवर्ती स्कूलों में कर दिया जाता है जो किसी भी दृष्टिकोण से स्वस्थ परम्परा नहीं कही जा सकती। विगत समय में पंजाब स्कूल शिक्षा बोर्ड की ओर से दसवीं एवं बाहरवीं के घोषित किए गए परिणामों ने काफी सीमा तक निराशा पैदा की है। ऐसी अवस्था में शिक्षा संबंधी नीति को पुन: बनाये जाने तथा इसके लिए वित्तीय साधन अधिक मात्रा में जुटाये जाने की बहुत आवश्यकता महसूस होती है। उच्च शिक्षा का हाल भी स्कूली शिक्षा की भांति ही प्रतीत होता है। विगत 20 सालों में कालेजों में अध्यापकों की स्थायी भर्ती नहीं की गई। ऐसे सैकड़ों कालेजों में अध्यापकों की हज़ारों आसामियां खाली पड़ी हैं। जो विद्यार्थी उच्च शिक्षा पूर्ण कर भी लेते हैं, उनमें से अधिकतर बेरोज़गारी की चक्की में पिसना शुरू कर देते हैं। इसी प्रकार की स्थिति में से बेरोज़गार कालेज अध्यापक गुज़र रहे हैं, परन्तु इस प्रकार के अहम पग उठाने के स्थान पर नई सरकार ने प्राइमरी स्कूलों में ‘अंग्रेज़ी माध्यम’ लागू करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इस संबंध में प्राइमरी एवं मिडल स्कूलों में अंग्रेज़ी माध्यम शुरू करने के लिए विवरण भी मांगे जा रहे हैं। हम सरकार की इस नीति के साथ सहमत नहीं हैं क्योंकि मूल रूप में न्यूनतम प्राइमरी तक पंजाबी को ही माध्यम बनाया जाना चाहिए। हिन्दी एवं अंग्रेज़ी विषयों को क्रमिक रूप से पढ़ाया जाना चाहिए। हम नई सरकार से यह अपील करते हैं कि वह शिक्षा के आधारभूत ढांचे को दुरुस्त एवं तंदुरुस्त करने के लिए अधिकाधिक ध्यान दे तथा इसके लिए वित्तीय साधन जुटाने के पूरे यत्न करे।
-बरजिन्दर सिंह हमदर्द