पानी की सार-संभाल की बढ़ती ज़रूरत


पंजाब में धरती के नीचे वाले पानी के स्तर को बचाने के लिए नि:संदेह रूप से विशेष यत्न किए जाने की आवश्यकता है। स्थिति यह है कि प्रदेश के शहरों एवं गांवों में जितनी मात्रा में पानी प्रतिदिन प्रयुक्त होता है, उसके मुकाबले में धरती के नीचे वाले पानी के संरक्षण और धरती के ऊपर वर्षा आदि के अकारण बह जाने वाले पानी के बचाव एवं भंडारण की कोई समुचित व्यवस्था नहीं है। गांवों में वर्षा के मौसम में जौहड़ों एवं तालाबों के ज़रिये पानी के भंडारण हेतु केन्द्र की मदद से कई बार योजनाएं बनाई जाती रही हैं, परन्तु इन पर अमल के धरातल पर कभी भी संतोषजनक परिणाम नहीं निकले। यहां तक कि इस प्रकार की केन्द्रीय योजनाओं हेतु दी गई केन्द्रीय अनुदान राशि भी कई बार प्रयुक्त नहीं की जा सकी। पंजाब के कुल 12673 गांवों में से लगभग 5000 ऐसे गांव हैं जिनमें राष्ट्रीय कृषि एवं ग्राम विकास बैंक नाबार्ड की सहायता से जल संचय एवं संरक्षण की योजनाएं बनाई गई थीं। इनमें दोआबा के 400 गांव भी शामिल थे, परन्तु इस धरातल पर भी कभी कोई शानदार उपलब्धि का पता नहीं चला। एशियाई विकास बैंक की ताज़ा चेतावनी इस स्थिति को और भयावह बनाती है। बैंक ने कहा है कि भारत, चीन, बंगलादेश और इंडोनेशिया में विकास क्रम बुरी तरह से प्रभावित हो सकता है। बैंक ने इस संदर्भ में विस्थापन की स्थिति पैदा होने का अंदेशा भी हो सकता है। प्रदेश में पेयजल और कृषि हेतु प्रयुक्त जल की बर्बादी का यह आलम है कि एक ओर शहरों में बड़ी बेतरतीबी से पानी को इस्तेमाल किए जाने से ढेरों पानी गलियों, सड़कों और नालियों में व्यर्थ बहता चला जाता है। इसका परिणाम यह सामने आता है कि प्रदेश की धरती में रेतीले अंश बढ़ते जा रहे हैं, और वैज्ञानिकों के अनुसार पंजाब में रेगिस्तानी खतरा भी निरन्तर बड़ा होता चला जा रहा है। पंजाब में अतीत की ग्रामीण संस्कृति विशेष रूप से कुंओं, जौहड़ों एवं तालाबों पर केन्द्रित रही है। अतीत में शहरों में भी तालाबों के गिर्द जीवन संस्कृति पनपती रही है, परन्तु धीरे-धीरे यह संस्कृति संकुचित होती चली गई और आज स्थिति यह हो गई है कि पंजाब के शहरों एवं गांवों में तालाब, जौहड़, कुएं आदि सूख गये हैं, अथवा इन पर मानव ने कब्ज़ा करके इनके अस्तित्व को ही खत्म कर दिया है। कृषि वैज्ञानिकों ने इस संदर्भ में कई बार अपने सर्वेक्षणों के ज़रिये चेतावनी जारी की है कि यदि पानी को संचित एवं संरक्षित करने की कोई नई वैज्ञानिक तकनीक नहीं अपनाई गई, और कि यदि पानी की बर्बादी का सिलसिला इसी प्रकार निर्बाध चलता रहा, तो नि:संदेह वो दिन दूर नहीं जब पंजाब की धरती पर मरुस्थल के चिन्ह उभरने लगेंगे। शहरों में पानी की नियोजित व्यवस्था हेतु न तो सरकार, प्रशासन अथवा स्थानीय स्व-शासन विभाग क्रियाशील है और न ही जन-साधारण इतना जागरूक हुआ है कि इस प्रकार की स्थितियों की गम्भीरता के दृष्टिगत रक्षात्मक उपाय कर सके।
सरकारों एवं राजनीतिक पक्ष की उदासीनता का आलम यह है कि पहले तो धड़ाधड़ ट्यूबवैल कनैक्शन दिये जाते रहे, और ये ट्यूबवैल निर्ममता एवं अनियोजित ढंग से धरती के नीचे से पानी खींचते रहे, परन्तु आज स्थिति यह हो गई है कि धरती के नीचे वाले पानी का स्तर और नीचा हो जाने के कारण अनेकाधिक ट्यूबवैल सूख गये हैं, और बंद पड़े हैं। धरती के नीचे वाले पानी के स्रोत सूखने का दृश्य यह है कि देश के कई हिस्सों की भांति पंजाब में भी कुछ क्षेत्रों में सूखे जैसी स्थितियां उपजने का अंदेशा है। इस अवस्था में शहरों और गांवों में पेयजल की स्थिति अधिक गम्भीर और जटिल हो जाने की आशंका है। शहरों में सरकारी पानी की सप्लाई का समय निरन्तर कम से कमतर किया जाता आ रहा है। गांवों में कुंओं की संस्कृति खत्म हो गई है। कस्बों एवं अधिकतर गांवों में भी सरकारी पानी की सप्लाई का हाल वही बेढंगा है। पंजाब के कुल 115 ब्लाकों का धरती तले वाला पानी बहुत नीचे चला गया है। गांवों में सिंचाई वाले ट्यूबवैलों का बोर भी 400 से 600 फुट नीचे तक चला गया है। दूसरी ओर ग्रामीण धरातल पर पेयजल में विषाक्त तत्वों का मिश्रण भी चौंकाता है। यह इसलिए होता है कि मशीनें जब धरती के नीचे दूर-दूर तक पानी खींचती हैं, तो खेतों में बड़ी मात्रा में मिलाई गई कीड़ेमार दवाओं के ज़हरीले अंश भी पानी के साथ खिंचे चले जाते हैं।  हम समझते हैं कि इससे पहले कि स्थितियों की डोर हाथ से छूट जाए, और पंजाब की उर्वरा एवं उपजाऊ धरती सूखे वाली आशंकाओं के भीतर घिरती चली जाए, सभी पक्षों एवं वर्गों को अपने-अपने दायित्वों एवं कर्त्तव्यों के प्रति जागरूक होकर अपनी भूमिका का ईमानदारी के साथ निर्वहन करना होगा। गांवों में जौहड़ों एवं तालाबों वाली संस्कृति को पुनर्जीवित करना होगा। केन्द्र सरकार को इस पक्ष में अपनी ज़िम्मेदारी को अधिक सजगता के साथ समझना होगा। प्रदेश सरकार को चाहिए कि वह ऐसे अवसरों एवं केन्द्रीय योजनाओं से उपलब्ध राशियों का सदुपयोग करे। प्रदेश के गांवों की पंचायतें सांझी ज़मीनों पर तालाब एवं जौहड़ संस्कृति को पैदा कर सकती हैं। शहरों में सरकारी पानी के दुरुपयोग एवं बर्बादी को रोकने के लिए नगर निगम, नगर पालिकाओं को अधिक सक्रियता से आगे आना होगा। हम समझते हैं कि आम लोगों को भी अधिक जागरूक एवं चेतन होना होगा। व्यर्थ बहते पानी को बचाने के लिए प्रत्येक सम्भव यत्न किया जाना चाहिए। इस प्रकार की सक्रियता, जागरूकता एवं ठोस योजनाबंदी से ही पानी की कमी से उपजने वाले भावी संकट को रोका जा सकता है।