भारतीय साधुओं के श्रद्धालुओं को वैज्ञानिक चेतना की ज़रूरत


मनुष्य अपना अधिकतर जीवन आकलनों में व्यतीत करता है। जनसमूह में से प्राप्त ज्ञान, निजी ज़रूरतें तथा पर्यावरण द्वारा मनुष्य के विचार बनते हैं। यह विचार सच्चे या झूठे हो सकते हैं। यह विचार आपसी मेल-मिलाप द्वारा जन-विश्वास बनाते हैं, जिससे मनुष्य अपने कार्य व्यवहार करता है। जीवन में मनुष्य को अनेक अनापेक्षित संकटों का सामना करना पड़ता है। ऐसे अनापेक्षित संकटों तथा अज्ञानता के कारण भारतीय लोगों का रुझान डेरों की ओर बढ़ा है। इससे हर किस्म के डेरों में उभार आया है। श्रद्धालुओं की चेतना पर काबू पाने के लिए साधुओं द्वारा आधुनिक योजनाएं इस्तेमाल की जा रही हैं। साधु स्वयं को दयावान, कोमल चित्त तथा भगवान के सेवक के तौर पर उभारते हैं। इन योजनाओं से श्रद्धालुओं के मन में अंध श्रद्धा का बीज बो दिया जाता है। यह अंध श्रद्धा ही श्रद्धालुओं की शारीरिक, आर्थिक और सामाजिक लूट का कारण बनती है। भारत में डेरों द्वारा होती लूट की घटनाओं का बढ़ना चिन्ता का विषय है। डेरों के देहधारी साधु अपनी लालसाओं, वासनाओं तथा सुख-साधनों की पूर्ति कर रहे हैं। डेरों द्वारा होती लूट को समझने और रोकने के लिए श्रद्धालुओं को वैज्ञानिक चेतना की ज़रूरत है। 
श्रद्धालुओं को विशिष्ट धर्म, डेरावाद और लोक धर्म के संकल्पों के बारे में समझने की ज़रूरत है। विशिष्ट धर्म का अपना ग्रंथ होता है, जिसकी दृष्टियों के सहारे व्यक्ति अपना जीवन निर्माण करते हैं। विशिष्ट धर्म मनुष्य के सकारात्मक निर्माण के साथ-साथ समाज के सामूहिक हितों के प्रति भी वचनबद्ध होता है। मौजूदा दौर में धार्मिक ग्रंथों के बहु-पक्षीय अध्ययन और प्रवचन को सम्भव बनाया जा रहा है। इसके प्रसार के लिए संचार तकनीकें सहायक हो रही हैं। 
डेरावाद का मुख्य रुझान व्यक्ति केन्द्रित होता है, इसलिए यह इन्कलाबी प्रवचन का हिस्सा बनता दिखाई नहीं देता। डेरों के साधु अधिकतर सिर्फ समाज की आम बुराइयों की ओर ही केन्द्रित होते हैं। साधु और श्रद्धालु अमानवीय घटनाओं और अत्याचार के विरुद्ध आवाज़ उठाने से असमर्थ दिखाई देते हैं। इस तरह डेरों की चेतना क्रांतिकारी चेहरे से दूर रहती हुई स्टेट का पक्ष पोषण करती है। वैज्ञानिक चेतना का नाश किये जाने के कारण ज्यादातर श्रद्धालु सामाजिक इन्कलाब को समझने से वंचित रह जाते हैं। 
लोग धर्म के प्रसंग में कुछ गांवों या शहरों के निकट करनीवाला देहधारी साधु होता है। लोगों की समस्याओं को सुलझाने के कारण लोग धर्मों के साधु अपनी हस्ती कायम करते हैं। आधुनिक डेरों के उभार से पहले ऐसे साधुओं का पूरा सिक्का चलता था। वर्ष 1961 (प्रथम संस्करण) में प्रकाशित पुस्तक ‘मेरा पिंड’ के लेखक ज्ञानी गुरदित्त सिंह के अनुसार ‘कई श्रद्धालुओं ने संतों को लड़कियां चढ़ानी शुरू कर दीं। ... चढ़ाने वालों को संत फरमा देते हैं—यहां छोड़ जाओ भाई! स्वयं लंगर में साध-संगत की सेवा करके गुजारा करती रहेंगी।’ अब यह घटनाक्रम आधुनिक डेरों की ओर तबदील हो गया है। 
अनेक महिलाओं या लड़कियों को अनापेक्षित कारणों या मजबूरियों के कारण देहधारी साधुओं के आधुनिक डेरों में रहना पड़ रहा है। इसके बाद क्या-क्या सम्भावनाएं बनती हैं, इसके बारे में श्रद्धालु अब भी अज्ञानी हैं। पहले लोग धर्मों के देहधारी साधुओं ने नपुंसक या दैवीय कसर वाली महिलाओं के इलाज के लिए विशेष गुफा बनाई होती थी, जहां उनका शारीरिक शोषण होता था। आधुनिक डेरों में भारतीय महिला के होते शारीरिक शोषण के कारण हर संवेदनशील व्यक्ति चिंतित है। पहले लोग-धर्म के साधुओं का भूगौलिक क्षेत्र छोटा होता था। आधुनिक दौर में संचार और तकनीक के विकास के कारण इनका दायरा फैलता जा रहा है। इससे डेरावाद का जन्म हुआ है। विशिष्ट धर्मों की चेतना के साथ-साथ डेरों के साधु अपनी निजी विचारधारा भी शामिल करते हैं। डेरों में किसी भी विशिष्ट धर्म के लोग शामिल हो सकते हैं। विशिष्ट धर्मों के लोगों या मौजूदा नेताओं के आपसी विरोध भी डेरावाद के उभार के लिए सहयोगीकारक बने हैं। भारतीय देहधारी साधुओं के डेरे और श्रद्धालु विदेशों में भी बन गये हैं। विदेशों में भी इनके समारोह चलते हैं। भारतीय साधु और श्रद्धालु विदेशी डेरों के उदाहरणों द्वारा आम लोगों को अपने पीछे लगाने में सफल हो रहे हैं। 
मनोविज्ञान के अनुसार डेरों में श्रद्धा के बीज को ‘नाम’ के संकल्प से बीजा जाता है। साधु स्वयं को भगवान के दूत के तौर पर पेश करते हैं। डेरों के साधु विशिष्ट और लोक धर्मों के चिन्हों, टुकों तथा संकल्पों को ज़रूरत के अनुसार इस्तेमाल करते हैं। भगवान दिखाने की आड़ में बहुत सारी निंदनीय कार्रवाइयां लोगों में चर्चा का विषय बन रही हैं। एक बार जब किसी परिवार का सदस्य डेरे से जुड़ता है तो फिर पूरा परिवार भेड़ों की तरह पीछे चल पड़ता है या धक्के से लगा लिया जाता है। बच्चों की मानसिक चेतना का नाश कर दिया जाता है। इससे श्रद्धा को अंध-श्रद्धा में तबदील कर दिया जाता है। बच्चे अपने वास्तविक इतिहास और विरासत से टूटकर डेरों का इतिहास रटने लगते हैं। साधुओं द्वारा बच्चों की चेतना को मिथ्यों से नाश करना चिन्ता का विषय है। लेवी स्ट्रॉस के अनुसार ‘मिथ्य एक तर्कपूर्ण मॉडल होता है, जो वास्तविक विरोधों के सामने असफल हो जाता है।’ वैज्ञानिक चेतना से मिथ्यों को समझा जा सकता है। वैज्ञानिक चेतना मनुष्य को संकीर्ण सोच से मुक्त करती है। 
धीरे-धीरे डेरों में हर वर्ग के श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ी है। बड़ी संख्या से साधुओं ने डेरों के भीतर अपना अलग साम्राज्य कायम कर लिया है। डेरों के आन्तरिक प्रबंध को चलाने के लिए विचारधारक और अत्याचार के औज़ार इस्तेमाल किये जाते हैं। श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या से लोकतंत्र प्रभावित होता है। यह आधुनिक साधु अपने श्रद्धालुओं के सहारे नेताओं के साथ वोटों का सौदा करते हैं। श्रद्धालुओं को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर खासतौर पर राजनीतिक पार्टी को वोट डालने के लिए तैयार किया जाता है। इस ढंग से राज्य पर अपना प्रभुत्व कायम करने में साधु सफल हो जाते हैं। राज्य पर प्रभुत्व स्थापित करने द्वारा अनेक निजी हितों को साधा जाता है। लोकतंत्र को हाशिये पर करने से न्याय व्यवस्था को ठेस पहुंचती है। श्रद्धालुओं को साधुओं तथा नेताओं के गठबंधन को समझने की ज़रूरत है। 
विश्व स्तर पर नकली विज्ञान लोगों को लूट रहा है। अंग्रेज़ी पत्रिका फ्रंट लाईन के लेख ‘ऑफ काओपैथी एण्ड इट्स मिरकल्स’ के लेखक आर.चंद्रन के अनुसार गौ-वैज्ञानिकों द्वारा ‘पंच गव्या’ को सर्व रोग दवाई के तौर पर प्रचारित किया जा रहा है। भारत की प्रमुख वैज्ञानिक संस्थाओं आई.सी.ए.आर. (इंडियन कौंसिल फॉर एग्रीकल्चरल रिसर्च) और सी.एस.आई.आर. (कौंसिल ऑफ साइंटिफिक एण्ड इंडस्ट्रियल रिसर्च) भी ऐसी गैर-वैज्ञानिक खोजों के बारे में सकारात्मक समर्थन भर रही हैं। आर. रामाचंद्रन ऐसी गैर-वैज्ञानिक योजनाओं को नकली विज्ञान के तौर पर पहचानते हैं। भारत के कई डेरों के साधु नकली-विज्ञान का इस्तेमाल करते हुए दवाइयां तथा अन्य सामान बेचकर श्रद्धालुओं को लूट रहे हैं। इस लूटने वाले नकली विज्ञान को समझने के लिए वैज्ञानिक चेतना की ज़रूरत निरन्तर बढ़ रही है।
समाज में वैज्ञानिक चेतना का विकास धीरे-धीरे होता है, क्योंकि लोगों की पहले ही विकसित हुई समझ रुकावट बनी रहती है। अपने दृढ़ विश्वासों को छोड़ना श्रद्धालुओं के लिए एकदम सम्भव नहीं होता। मार्क्स के अनुसार ‘जहां आंकलन समाप्त होते हैं, वहीं वास्तविक जीवन में सकारात्मक विज्ञान की शुरुआत होती है।’ मनुष्य की मेहनत और अभ्यास से विज्ञान अपना अस्तित्व बनाता है। विज्ञान हर भौतिक और प्राकृतिक घटनाक्रम को अपना विषय बनाकर विज्ञानिक विधियों से वास्तविक परिणाम निकालता है। विज्ञान द्वारा खोजे गए संकल्प, नियम और सिद्धांत जब जन-समूह का हिस्सा बनते हैं, तो समाज में वैज्ञानिक चेतना का जन्म होता है। समाज में प्रचलित अंध-विश्वासों, भ्रमों और लूटने वाली  योजनाओं द्वारा भौतिक, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से मनुष्य को बचाने के लिए वैज्ञानिक चेतना सार्थक साधन है। समय और समझ के उचित प्रयोग द्वारा वैज्ञानिक चेतना से मनुष्य का जीवन समृद्ध बनता है। 
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