आओ, चलें मोक्ष की नगरी कांचीपुरम



आसमान में बादल छा रहे थे और दूर क्षितिज पर ताड़ के पत्ते हवाओं में लहरा रहे थे। जल्द ही हाइवे को छोड़ते हुए हम दूसरी सड़क पर हो गए जहां गुलमोहर खिले हुए थे। यह सड़क हमें कांची ले जायेगी, जिसे दक्षिण काशी कहा जाता है। हमें पहले कामाकाशी अम्बा मंदिर पर रुकना था और फि र वहां से कैलाशनाथ मंदिर जाना था और अगर समय रहा तो एक अम्बरेश्वर मंदिर जाएंगे, लेकिन विष्णु कांची के लिए अगली यात्रा की जरूरत पड़ेगी। कैलाशनाथ मंदिर में प्रवेश करने के लिए हम कुछ ही सीढ़ी चढ़े थे कि पुजारी ने समझाया कि इस मंदिर का निर्माण महेन्द्रावरम तृतीय ने कराया था जो पल्लव राजा राजसिम्हा के बेटे थे। अंदर अंधेरा और घुटन थी। पतले हॉल की दक्षिण दीवार पर बहुत ही प्रभावशाली शिव की मूर्ति है भिक्षतना के रूप में, जो कि 8 फुट से अधिक ऊंची है। उत्तरी दीवार पर शिव समर्थ तांडव कर रहे हैं यानी नष्ट करने का नृत्य गर्भगृह के केंद्र में शिव की स्थापना बांसुरीलिंगम के रूप में है, आठ चेहरों के साथ। पिछली दीवार पर सोमस्कंद की धुंधली सी तस्वीर दिखाई देती है।  जैसे ही हम मंदिर के अगले हिस्से से परिक्रमा में आए तो पुजारी ने हमें मंदिर में इस्तेमाल पत्थरों के बारे में बताना शुरू किया। नींव में और निचली दीवारों के अन्य हिस्सों में ग्रेनाइट का प्रयोग किया गया था, मजबूती प्रदान करने के लिए। लेकिन बाकी जगह ग्रेनाइट का नहीं प्रयोग किया गया क्योंकि महापाषाण युग में ग्रेनाइट का प्रयोग आमतौर से स्मारकों के निर्माण में किया जाता था। इसलिए उसे मंदिरों में प्रयोग के लिए शुभ नहीं समझा जाता था। इसकी जगह सैंडस्टोन का प्रयोग किया जाता था, जिसपर आसानी से नक्काशी भी हो जाती है। 
हम जब कुछ मूर्तियों को पहचानने की कोशिश कर रहे थे तो मंदिर का पुजारी हमारे साथ ही था। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि वह जानता बहुत कुछ है। गर्भगृह में प्रवेश से पहले उसने कुछ मूर्तियों की तरफ  इशारा किया जो वास्तव में जीवन से भरी हुई प्रतीत हो रही थीं। नरसिम्हा अवतार की मूर्ति न केवल मांसपेशियों से भरी प्रतीत हुई बल्कि उसका मुंह इस तरह खुला हुआ है जैसे दहाड़ रही हो और हिरणाकश्यप को नष्ट करने ही वाली हो।  इन मूर्तियों के विपरीत एक मूर्ति ध्यान या तपस्या में लगी देवी की है। शिव और पार्वती की मूर्तियां शांति, सौन्दर्य और स्थिरता की प्रतीक हैं। सोमास्कंद मूर्ति घरेलू प्रसन्नता का प्रतीक है। विशाल काले ग्रेनाइट लिंग के पीछे जो दीवार है, वह पीतल के दीयों की रोशनी से और कृत्रिम रोशनी से जगमगा रही है और ठीक गर्भगृह से पहले शिव और पार्वती की पत्थर की मूर्तियां हैं। गर्भगृह में प्रवेश के लिए एक पतले मार्ग से होकर जाना पड़ता है। ‘भजगोविंदम’ के अनुसार इस जगह आने जाने का बहुत अधिक आध्यात्मिक महत्व है। ‘हम जीवन और मृत्यु के चक्त्र में फं से हुए हैं। हमारा बार बार जन्म होता है और फि र हम एक बार मां के गर्भ में प्रवेश करते हैं कि एक बार फि र जन्म ले सकें। इस समुद्र से निकलना बहुत कठिन है। ओ मुरारी, ओ कृष्ण हम पर दया कर और हमें मुक्ति प्रदान कर।’ इस प्रकार इस पतले मार्ग में प्रवेश करने का अर्थ है कि मां के गर्भ में मृत्यु के बाद फि र से प्रवेश करना। इसमें से सफ लतापूर्वक वापिस आ जाने का अर्थ है नया जीवन प्राप्त कर लेना। यही मोक्ष है यानी जन्म व मृत्यु के अनंत चक्त्र से मुक्ति पा जाना। इस पतले मार्ग में प्रवेश दीवार के एक पतले से छेद के जरिए किया जाता है और मुश्किल से ही इसमें से निकला जाता है। 
कांचीपुरम हजारों मंदिरों का शहर माना जाता है। हिंदू इसे भारत की सात सबसे पवित्र पुरियों में शुमार करते हैं। यह सक्त्रिय शक्ति का क्षेत्र है और वह जगह जहां मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है। गरुड़प्राण में मोक्ष प्राप्ति की ये सात पुरियां हैं-अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, वाराणसी, अवंतिका (उज्जैन), द्वारिका और कांचीपुरम। कैलाशनाथ मंदिर शहर का सबसे पुराना मंदिर है जिसका निर्माण आठवीं शताब्दी में किया गया था।  कांचीपुरम में बौद्ध धर्म ने भी पहली शताब्दी ई.पू. में अपनी गहरी जड़ें जमाई थीं। ह्वेन सांग की यात्रा के दौरान यहां सैंकड़ों संघ, हॉस्टिल और दस हजार थेरा पुजारी थे। तीन नामवर बौद्ध भिक्षु दिग्नांगा, बौद्धीधर्मा और धर्मपाला का संबंध कांचीपुरम से ही था। लेकिन पल्लव, चोल व विजयनगर राजाओं के दौर में बौद्ध धर्म को यहां शाही संरक्षण न मिल सका और उसकी ख्याति काफी कम हो गई।  -इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 
—समीर चौधरी